भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 661

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५७


देहशुङ्गस्य वाचारम्भणमात्रस्यान्नादिपरम्परया परमार्थसत्यं सन्मूलमभयमसंत्रासं निरायासं सन्मूलमन्विच्छेति पुत्रं गमयित्वाऽशिशिषति पिपासतीति नामप्रसिद्धिद्वारेण यदन्यदिहास्मिन्प्रकरणे तेजोऽबन्नानां पुरुषेणोपयुज्यमानानां कार्यकारणसंघातस्य देहशुङ्गस्य स्वजात्यसाङ्कर्येणोपचयकरत्वं वक्तव्यं प्राप्तं तदिहोक्तमेव द्रष्टव्यमिति पूर्वोक्तं व्यपदिशति ।विकार वाचारम्भणमात्र देहरूप कार्यके परमार्थ सत्य निर्भय निस्त्रास और निरायास सद्‌रूप मूलको अन्नादि परम्परासे जान—ऐसा पुत्रको समझाकर और इसके सिवा ‘अशिशिषति’ और ‘पिपासति’ इन नामोंकी प्रसिद्धिके द्वारा इस प्रकरणमें जो पुरुषद्वारा उपभोगमें लाये जानेवाले तेज, जल और अन्नका अपनी जातिका सांकर्य न करते हुए भूत और इन्द्रियोंके संघातभूत इस शरीरका पोषकत्व बतलाना प्राप्त होता था वह भी ऊपर बतला ही दिया गया है—ऐसा जानना चाहिये—यह बतलानेके लिये आरुणि पहले कहे हुए प्रसंगका ही निर्देश करता है।
यथा नु खलु येन प्रकारेणेमास्तेजोऽबन्नाख्यास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यन्नमशितं त्रेधा विधीयत इत्यादि तत्रैवोक्तम् । अन्नादीनामशितानां ये मध्यमा धातवस्ते सप्तधातुकंहे सोम्य ! जिस प्रकार ये तेज, जल और अन्नसंज्ञक तीनों देवता पुरुषको प्राप्त होकर इनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत-त्रिवृत् हो जाता है वह पहले ही कहा जा चुका है। ‘खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका हो जाता है’ यह बात वहीं कही गयी है। वहीं यह भी बतलाया गया है कि भक्षण किये हुए अन्नादिका जो