छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
६०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| आत्मोपदेशोऽप्युपचरित इति चेद्यथा ममात्मा भद्रसेन इति सर्वार्थकारिण्यनात्मन्यात्मोपचारस्तद्वत् । | शङ्का— यदि 'भद्रसेन मेरा आत्मा है' इस वाक्यमें जिस प्रकार आत्माके सम्पूर्ण कार्य करनेवाले अनात्मामें आत्माका उपचार किया गया है उसी प्रकार यह आत्मोपदेश भी उपचारसे ही है ऐसा मानें तो ? |
| न; तदस्मीति सत्सत्याभिसंधस्य 'तस्य तावदेव चिरम्' इति मोक्षोपदेशात् । | समाधान— ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि 'वह सत् मैं हूँ' इस प्रकार सत्में दृढ़ अभिनिवेश करनेवालेके लिये 'उसके मोक्षमें अभीतक देरी है [ जबतक कि शरीरपात नहीं होता ]' इस प्रकार मोक्षका उपदेश किया गया है। |
| सोऽप्युपचार इति चेत्, प्रधानात्माभिसंधस्य मोक्षसामीप्यं वर्तत इति मोक्षोपदेशोऽप्युपचरित एव; यथा लोके ग्रामं गन्तुं प्रस्थितः प्राप्तवानहं ग्राममिति ब्रूयात्त्वरापेक्षया तद्वत् । | शङ्का— यदि यह भी उपचार ही हो तो ? जिस प्रकार लोकमें गाँवकी ओर जानेवाला पुरुष अपनी शीघ्रताकी अपेक्षासे कह देता है कि 'मैं तो गाँवमें पहुँच गया' उसी प्रकार प्रधानमें आत्मबुद्धि करनेवालेके लिये मोक्षकी समीपता होनेके कारण यह मोक्षका उपदेश भी उपचारसे ही हो तो ? |
| न; येन विज्ञातेनाविज्ञातं विज्ञातं भवतीत्युपक्रमात् । सत्येकस्मिन्विज्ञाते सर्वं विज्ञातं भवति तदनन्यत्वात्सर्वस्याद्वितीयवचनाच्च । न चान्यद्विज्ञा- | समाधान— नहीं, क्योंकि जिसे जान लेनेपर बिना जाना हुआ भी जान लिया जाता है--ऐसा उपक्रम किया गया है। एक सत्के जान लेनेपर ही सब कुछ जान लिया जाता है, क्योंकि सब उससे अभिन्न है और उसे अद्वितीय भी बतलाया |
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६०३
| तन्यमवशिष्टं श्रावितं श्रुत्यानुमेयं वा लिङ्गतोऽस्ति येन मोक्षोपदेश उपचारितः स्यात् । सर्वस्य च प्रपाठकार्थस्योपचरितत्वपरिकल्पनायां वृथा श्रमः परिकल्पयितुः स्यात्पुरुषार्थसाधनविज्ञानस्य तर्केणैवाधिगतत्वात्तस्य । तस्माद्वेदप्रामाण्यान्न युक्तः श्रुतार्थपरित्यागः । अचश्वेतनावत्कारणं जगत इति सिद्धम् ॥ ४ ॥ | गया है । उसके सिवा कोई और विज्ञातव्य न तो श्रुतिसे सुना गया है और न किसी लिङ्गसे ही अनुमान किया जा सकता है, जिसके कारण इस मोक्षोपदेशको उपचरित माना जाय । तथा सारे प्रपाठकका उपचरितत्व माननेमें तो इस प्रकारकी कल्पना करनेवालेका श्रम व्यर्थ ही होगा, क्योंकि उसके सिद्धान्तानुसार पुरुषार्थका साधनभूत विज्ञान तो तर्कसे ही सिद्ध हो जाता है । अतः वेदकी प्रमाणता होनेके कारण इस श्रुत (प्रसिद्ध) अर्थका त्याग करना उचित नहीं है । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि संसारका चेतन कारण है ॥ ४ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये द्वितीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २ ॥
तृतीय खण्ड
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सृष्टिका क्रम
तेषां खल्वेषां भूतानां त्रीण्येव बीजानि भव-
न्त्याण्डजं जीवजमुद्भिज्जमिति ॥ १ ॥
उन इन [ पक्षी आदि ] प्रसिद्ध प्राणियोंके तीन ही बीज होते हैं—आण्डज, जीवज और उद्भिज्ज ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| तेषां जीवाविष्टानां खल्वेषां पक्ष्यादीनां भूतानाम्, एषामिति प्रत्यक्षनिर्देशान्न तु तेजःप्रभृतीनां तेषां त्रिवृत्करणस्य वक्ष्यमाणत्वादसति त्रिवृत्करणे प्रत्यक्षनिर्देशानुपपत्तिः । देवताशब्दप्रयोगाच्च तेजःप्रभृतिष्विमास्तिस्रो देवता इति । तस्मात्तेषां खल्वेषां भूतानां पक्षिपशुस्थावरादीनां त्रीण्येव नातिरिक्तानि बीजानि कारणानि भवन्ति । | जीवोंद्वारा आविष्ट उन इन पक्षी आदि प्राणियोंके—यहाँ 'एषाम्' ऐसा प्रत्यक्ष निर्देश होनेके कारण [ 'इन पक्षी आदि भूतोंके' ऐसा अर्थ करना चाहिये ] 'उन तेजःप्रभृति भूतोंके' ऐसा अर्थ करना ठीक नहीं, क्योंकि आगे त्रिवृत्करणका वर्णन किया जानेवाला है और त्रिवृत्करणके हुए बिना ही प्रत्यक्ष निर्देश बन नहीं सकता । इसके सिवा तेजःप्रभृतिके लिये 'इमाः तिस्रो देवताः' इस प्रकार 'देवता' शब्दका प्रयोग होनेसे भी [ यहाँ 'भूत' शब्दसे पक्षी आदि ही विवक्षित हैं ]—अतः उन इन पक्षी, पशु एवं स्थावर आदि प्रसिद्ध भूतोंके तीन ही बीज हैं, इससे अधिक बीज-कारण नहीं हैं । |
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६०५
| कानि तानि ? इत्युच्यन्ते, आण्डजमण्डाज्जातमण्डजम् , अण्डजमेवाण्डजं पक्ष्यादि । पक्षिसर्पादिभ्यो हि पक्षिसर्पादयो जायमाना दृश्यन्ते । तेन पक्षी पक्षिणां बीजं सर्पः सर्पाणां तथान्यदप्यण्डाज्जातं तज्जातीयानां बीजमित्यर्थः । | वे कौन-से हैं ? सो बतलाये जाते हैं—आण्डज—अण्डसे उत्पन्न हुएको अण्डज कहते हैं, अण्डज ही आण्डज हैं, अर्थात् पक्षी आदि; क्योंकि पक्षी एवं सर्पादिसे पक्षी और सर्पादि उत्पन्न होते देखे गये हैं; अतः पक्षियोंके बीज पक्षी हैं और सर्पोंके सर्प । इसी प्रकार अण्डेसे उत्पन्न हुए अन्य जीव भी अपनी-अपनी जातिके बीज हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है । |
| नन्वण्डाज्जातमण्डजमुच्यतेऽतोऽण्डमेव बीजमिति युक्तं कथमण्डजं बीजमुच्यते । | शङ्का—किंतु अण्डेसे उत्पन्न हुएको अण्डज कहते हैं; इसलिये अण्डा ही बीज है—ऐसा कहना उचित है; फिर अण्डजको बीज क्यों कहा जाता है ? |
| सत्यमेवं स्यात्, यदि त्वदिच्छास्तन्त्रा श्रुतिः स्यात्; स्वतन्त्रा तु श्रुतिः, यत आहाण्डजाद्येव बीजं नाण्डादीति । दृश्यते चाण्डजाद्यभावे तज्जातीयसन्तत्यभावो नाण्डाद्यभावे । अतोऽण्डजादीन्येव बीजान्यण्डजादीनाम् । | समाधान—यदि श्रुति तुम्हारी इच्छाके अधीन होती तो सचमुच ऐसा ही होता; किंतु श्रुति स्वतन्त्र है, क्योंकि उसने अण्डज आदिको बीज बतलाया है, अण्डे आदिको नहीं बतलाया। यही बात देखी भी जाती है कि अण्डज आदिका अभाव होनेपर ही उस जातिकी संततिका अभाव होता है, अण्डे आदिका अभाव होनेपर नहीं । अतः अण्डजादिके बीज अण्डजादि ही हैं । |
३०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ३०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| तथा जीवाज्जातं जीवजं जरायुजमित्येतत्पुरुषपश्वादि । उद्भिज्जमुद्भिनत्तीत्युद्भिदुत्स्थावरं ततो जातमुद्भिज्जं धाना वोद्भिद्ततो जायत इत्युद्भिज्जं स्थावरबीजं स्थावराणां बीजमित्यर्थः । स्वेदजसंशोकजयोरण्डजोद्भिज्जयोरेव यथासंभवमन्तर्भावः । एवं ह्यवधारणं त्रीण्येव बीजानीत्युपपन्नं भवति ॥ १ ॥ | इसी प्रकार जीवसे उत्पन्न हुआ जीवज यानी जरायुज पुरुष एवं पशु आदि तथा उद्भिज्ज—जो पृथिवीको ऊपरकी ओर भेदन करता है उसे उद्भिद् यानी स्थावर कहते हैं, उससे उत्पन्न हुएका नाम उद्भिज्ज है; अथवा धाना (बीज) उद्भिद् है उससे उत्पन्न हुआ उद्भिज्ज स्थावरबीज अर्थात् स्थावरोंका बीज है। स्वेदज और संशोकज (ऊष्मासे उत्पन्न होनेवाले) जीवोंका यथासम्भव अण्डज और उद्भिज्जोंमें ही अन्तर्भाव होगा, क्योंकि ऐसा माननेपर ही 'तीन ही बीज हैं' यह निश्चय उत्पन्न हो सकता है ॥ १ ॥ |
सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति ॥२॥
उस इस [ 'सत्' नामक ] देवताने ईक्षण किया, 'मैं इस जीवात्म-रूपसे' इन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेश कर नाम और रूपकी अभिव्यक्ति करूँ' ॥ २ ॥
| सेयं प्रकृता सदाख्या तेजोऽबन्नयोनिर्देवतैक्षतैक्षितवती यथापूर्वं बहु स्यामिति । तदेव | उस इस सत् नामक तेज, जल और अन्नके योनिभूत उपर्युक्त देवताने, जैसा कि पहले ईक्षण किया था कि 'मैं बहुत हो जाऊँ' उसी प्रकार, ईक्षण किया। वह |
| खण्ड ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०७ | | :--- | :--- |
| बहुभवनं प्रयोजनं नाद्यापि निर्वृत्तमित्यत ईक्षां पुनः कृतवती बहुभवनमेव प्रयोजनमुररीकृत्य । | बहुत होनारूप प्रयोजन अभीतक समाप्त नहीं हुआ था, इसलिये बहुत होनारूप प्रयोजनको ही मनमें रखकर उसने फिर ईक्षण किया । | | कथम् ? हन्तेदानीमहमिमा यथोक्तास्तेजआद्यास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनेति स्वबुद्धिस्थं पूर्वसृष्ट्यनुभूतप्राणाधारणमात्मानमेव स्मरन्त्याहानेन जीवेनात्मनेति । प्राणधारणकर्त्रात्मनेति वचनात्स्वात्मनोऽव्यतिरिक्तेन चैतन्यस्वरूपतया विशिष्टेनेत्येतद्दर्शयति । अनुप्रविश्य तेजोऽबन्नभूतमात्रासंसर्गेण लब्धविशेषविज्ञाना सती नाम च रूपं च नामरूपे व्याकरवाणि विस्पष्टमाकरवाण्यसौ नामायमिदरूप इति व्याकुर्यामित्यर्थः । | किस प्रकार ईक्षण किया ? 'अब मैं इन उपर्युक्त तेज आदि तीन देवताओंमें इस जीवरूपसे—ऐसा कहकर श्रुति पूर्वसृष्टिमें अनुभूत प्राणधारी आत्माका स्मरण करती हुई ही कहती है कि इस जीवात्मरूपसे—प्राण धारण करनेवाले आत्माके द्वारा—इस कथनसे श्रुति यह दिखलाती है कि अपने आत्मासे अभिन्न अर्थात् चैतन्यस्वरूपतया आत्मासे अविशिष्ट जीवरूपसे अनुप्रवेश कर अर्थात् तेज, अप् और अन्न इन भूतमात्राओंके संसर्गसे, जिसने विशेष विज्ञान प्राप्त किया है, ऐसा होकर मैं नामरूप–नाम और रूपोंका व्याकरण–व्यक्तीकरण करूँ; अर्थात् यह इस नामवाला है और इस रूपका है—ऐसा अभिव्यक्त करूँ ।' | | ननु न युक्तमिदमसंसारिण्याः सर्वज्ञाया देवताया बुद्धिपूर्वकमनेकशतसहस्रानर्थाश्रयं | शङ्का—किंतु स्वतन्त्रता रहते हुए भी असंसारी सर्वज्ञ देवताका बुद्धिपूर्वक ऐसा संकल्प करना कि, सैकड़ों-हजारों अनर्थोंके |
| ६०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
| ६०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| देहमनुप्रविश्य दुःखमनुभविष्यामीति संकल्पनमनुप्रवेशश्च स्वातन्त्र्ये सति । | आश्रयभूत शरीरमें अनुप्रवेश करके दुःखका अनुभव करूँ, और फिर उसमें अनुप्रवेश करना सम्भव नहीं है । | | सत्यमेवं न युक्तं स्याद्यदि स्वेनैवाविकृतेन रूपेणानुप्रविशेयं दुःखमनुभवेयमिति च संकल्पितवती, न त्वेनम्; कथं तर्हि ? अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्येति वचनात् । | समाधान - ठीक है, यदि वह ऐसा संकल्प करता कि अपने अविकृतरूपसे ही अनुप्रवेश करूँ और दुःखका अनुभव करूँ तब तो ऐसा करना ठीक नहीं था, किंतु ऐसी बात है नहीं । तो फिर क्या है ?— 'इस जीवात्मारूपसे अनुप्रवेश करूँ' ऐसा वचन होनेके कारण [ उसका साक्षात् प्रवेश सिद्ध नहीं होता ] । | | जीवो हि नाम देवताया आभासमात्रम् । बुद्ध्यादिभूतमात्रासंसर्गजनित आदर्श इव प्रविष्टः पुरुषप्रतिबिम्बो जलादिष्विव च सूर्यादीनाम् । अचिन्त्यानन्तशक्तिमत्या देवताया बुद्ध्यादिसंबन्धश्चैतन्याभासो देवतास्वरूपविवेकाग्रहणनिमित्तः सुखी दुःखी मूढ इत्याद्यनेकविकल्पप्रत्ययहेतुः । | जीव तो उस देवताका आभासमात्र है, जो दर्पणमें प्रविष्ट हुए पुरुषके प्रतिबिम्बके समान तथा जल आदिमें प्रविष्ट हुए सूर्यके आभासके समान बुद्धि आदि भूतमात्राओंके संसर्गसे उत्पन्न हुआ है । अचिन्त्य एवं अनन्त शक्तिसे युक्त उस देवताका बुद्धि आदिसे सम्बन्ध रूप जो चैतन्याभास है वही उस देवताके स्वरूपका विवेक ग्रहण न करनेके कारण सुखी, दुःखी, मूढ इत्यादि अनेकों विकल्पोंकी प्रतीतिका कारण होता है । |
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६०९
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| छायामात्रेण जीवरूपेणानुप्रविष्टत्वाद्देवता न दैहिकैः स्वतः सुखदुःखादिभिः संबध्यते । यथा पुरुषादित्यादय आदर्शोदकादिषुच्छायामात्रेणानुप्रविष्टा आदर्शोदकादिदोषैर्न संबध्यन्ते तद्वद्देवतापि । "सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः" (क० उ० २।२।१२) । "आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः" इति हि काठके । "ध्यायतीव लेलायतीव" (बृह० उ० ४।३।७) इति च वाजसनेयके । | छायामात्र जीवरूपसे अनुप्रविष्ट होनेके कारण वह देवता स्वयं देहके सुख-दुःखादिसे सम्बद्ध नहीं होता । जिस प्रकार दर्पण और जल आदिमें छायामात्रसे अनुप्रविष्ट हुए मनुष्य और सूर्य आदि दर्पण और जल आदिके दोषोंसे लिप्त नहीं होते उसी प्रकार वह देवता भी निर्लिप्त रहता है । "जिस प्रकार सम्पूर्ण लोकका चक्षुरूप सूर्य चक्षुसम्बन्धी बाह्य दोषोंसे लिप्त नहीं होता उसी प्रकार समस्त प्राणियोंका एक ही अन्तरात्मा लौकिक दुःखोंसे लिप्त नहीं होता बल्कि उनसे बाहर रहता है" "तथा वह आकाशके समान सर्वत्र व्याप्त एवं नित्य है", इस प्रकार कठोपनिषद्में तथा "मानो ध्यान करता है, मानो चेष्टा करता है", इस प्रकार बृहदारण्यकोपनिषद्में भी कहा है । |
| ननुच्छायामात्रश्चेज्जीवो मृषैव प्राप्तस्तथा परलोकेहलोकादि च तस्य । | **शङ्का—**यदि जीव छायामात्र ही है तो वह मिथ्या ही सिद्ध होता है तथा उसके परलोक, इहलोक आदि भी मिथ्या ही ठहरते हैं ? |
| नैष दोषः; सदात्मना सत्यत्वाभ्युपगमात् । सर्वं च नाम- | **समाधान—**ऐसा दोष नहीं है, क्योंकि सत्स्वरूपसे उसका सत्यत्व स्वीकार किया गया है । सारा |
६१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| रूपादि सदात्मनैव सत्यं विकाराजातं स्वतस्त्वनृतमेव । 'वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्' इत्युक्तत्वात् । तथा जीवोऽपीति । यक्षानुरूपो हि बलिरिति न्यायप्रसिद्धिः । अतः सदात्मना सर्वव्यवहाराणां सर्वविकाराणां च सत्यत्वं सतोऽन्यत्वे चानृतत्वमिति न कश्चिद्दोषस्तार्किकैरिहानुषङ्क्तुं शक्यः । यथेतेरेतरविरुद्धद्वैतवादाः स्वबुद्धिविकल्पमात्रा अतत्त्वनिष्ठा इति शक्यं वक्तुम् ॥ २ ॥ | नाम-रूपादि विकारजात सत्स्वरूपसे ही सत्य है, स्वयं तो वह मिथ्या ही है, क्योंकि 'विकार तो केवल कहनेके लिये नाममात्र है' ऐसा कहा जा चुका है ऐसा ही जीव भी है । 'जैसा यक्ष वैसी ही बलि' यह न्याय प्रसिद्ध ही है । अतः सत्स्वरूपसे सम्पूर्ण व्यवहार और सारे विकारोंकी सत्यता है तथा सत्से पृथक् माननेपर उनका मिथ्यात्व है—इस प्रकार तार्किकोंद्वारा इस विषयमें किसी दोषका प्रसङ्ग नहीं उपस्थित किया जा सकता, जैसा कि हम कह सकते हैं कि एक दूसरेसे विरुद्ध द्वैतवाद अपनी ही बुद्धिके विकल्पमात्र और अतत्त्वनिष्ठ हैं ॥ २ ॥ |
| सैवं तिस्रो देवता अनुप्रविश्य स्वात्मावस्थे बीजभूते अव्याकृते नामरूपे व्याकरवाणीतीक्षित्वा— | इस प्रकार उसने उन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेश कर और इस प्रकार ईक्षण कर कि ‘मैं अपने स्वरूपमें स्थित अव्याकृत नाम रूपोंका व्याकरण करूँ’— |
तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् ॥ ३ ॥
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६११
‘और उनमेंसे एक-एक देवताको त्रिवृत्-त्रिवृत् करूँ’ ऐसा विचार कर उस इस देवताने इस जीवात्मरूपसे ही उन तीन देवताओंमें अनुप्रवेश कर नामरूपका व्याकरण किया ॥ ३ ॥
| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तासां च तिसृणां देवताना-<br><br>मेकैकां त्रिवृतं त्रिवृतं करवाणि । एकैकस्याः प्राधान्यं द्वयोर्द्वयो-<br><br>र्गुणभावोऽन्यथा हि रज्ज्वा इवैकमेव त्रिवृत्करणं स्यात्, न<br><br>तु तिसृणां पृथक्पृथक्त्रिवृत्करण-<br><br>मिति । एवं हि तेजोऽबन्नानां<br><br>पृथङ्नामप्रत्ययलाभः स्यात्तेज<br><br>इदमीमा आपोऽन्नमिदमिति च<br><br>सति च पृथङ्नामप्रत्ययलाभे<br><br>देवतानां—सम्यग्व्यवहारस्य<br><br>प्रसिद्धिः प्रयोजनं स्यात् । | ‘और उन तीनों देवताओंमेंसे एक-एकको त्रिवृत्-त्रिवृत् करूँ ।’ एक-एक देवताके त्रिवृत्करणमें एक-एककी प्रधानता और दो-दोकी गौणता रहती है, नहीं तो तीन [लड़वाली] रस्सीके समान एक ही त्रिवृत्करण होता । तीनों देवताओं-का पृथक्-पृथक् त्रिवृत्करण नहीं होता । इस प्रकार ही तेज, अप् और अन्नको ‘यह तेज है, यह जल है, यह अन्न है’ ऐसे पृथक् पृथक् नाम और प्रतीतिकी प्राप्ति हो सकती है, और पृथक्-पृथक् नाम तथा प्रतीतिकी प्राप्ति होनेपर ही देवताओंके सम्यक् व्यवहारकी सिद्धिरूप प्रयोजनकी पूर्ति हो सकती है । |
| एवमीक्षित्वा सेयं देवतेमा-<br><br>स्तिस्रो देवता अनेनैव यथोक्ते-<br><br>नैव जीवेन सूर्यबिम्बवदन्तः-<br><br>प्रविश्य वैराजं पिण्डं प्रथमं<br><br>देवादीनां च पिण्डाननुप्रविश्य | इस प्रकार ईक्षण कर उस देवता-ने इन तीनों देवताओंमें इस उपर्युक्त जीवरूपसे ही सूर्यबिम्बके समान भीतर प्रवेश कर अर्थात् पहले विराट् पिण्डमें और उसके पश्चात् देवादि पिण्डोंमें अनुप्रवेश कर अपने संकल्प-के अनुसार ही नाम-रूपोंका |
छा० उ० २०—
११२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ११२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| यथासंकल्पमेव नामरूपे व्याकरोदसौ नामायमिदंरूप इति ॥ ३ ॥ | व्याकरण किया । अर्थात् यह पदार्थ इस नामवाला और इस रूपवाला है—इस प्रकार पदार्थोंका व्यक्तीकरण किया ॥ ३ ॥ |
तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोद्यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवतास्त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ४ ॥
उस देवताने उनमेंसे प्रत्येकको त्रिवृत्-त्रिवृत् किया । हे सोम्य ! जिस प्रकार ये तीनों देवता एक-एक करके प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् हैं वह मेरेद्वारा जान ॥ ४ ॥
| तासां च देवतानां गुणप्रधानभावेन त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोत्कृतवती देवता । तिष्ठतु तावद्देवतापिण्डानां नामरूपाभ्यां व्याकृतानां तेजोऽबन्नमयत्वेन त्रिधात्वं यथा तु बहिरिमाः पिण्डेभ्यस्तिस्रो देवतास्त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे मम निगदतो विजानीहि विस्पष्टमवधारयोदाहरतः ॥ ४ ॥ | उस देवताने उन देवताओंमेंसे एक-एकको गुण-प्रधानभावसे त्रिवृत्-त्रिवृत किया । अभी, नामरूपसे व्यक्त हुए देवता आदि पिण्डोंके तेज, अप् और अन्नरूपसे त्रिविधत्वकी बात अलग रहे, इन पिण्डोंसे बाहर भी ये तीनों देवता एक-एक करके किस प्रकार त्रिवृत्-त्रिवृत हैं सो मेरे कथनद्वारा जान अर्थात् उदाहरणद्वारा अच्छी तरह समझ ले ॥ ४ ॥ |
<div align="center">-: ❀ :-
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥
चतुर्थ खण्ड
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एकके ज्ञानसे सबका ज्ञान
| यत्तद्देवतानां त्रिवृत्करणमुक्तं तस्यैवोदाहरणमुच्यते, उदाहरणं नामैकदेशप्रसिद्ध्याशेषप्रसिद्धयर्थमुदाह्रियत इति । तदेतदाह— | उन देवताओंका जो त्रिवृत्करण कहा गया है, उसका उदाहरण दिया जाता है । उदाहरण उसे कहते हैं, जो एक देशकी प्रसिद्धि-द्वारा सम्पूर्ण देशकी प्रसिद्धिके लिये कहा जाता है । श्रुति वही उदाहरण देती है— |
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यदग्ने रोहितꣳरूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागादग्नेरग्नित्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ १ ॥
अग्निका जो रोहित ( लाल ) रूप है वह तेजका ही रूप है, जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कृष्ण है वह अन्नका है । इस प्रकार अग्निसे अग्नित्व निवृत्त हो गया, क्योंकि [ अग्निरूप ] विकार वाणीसे कहनेके लिये नाममात्र है; केवल तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है ॥१॥
| यदग्नेस्त्रिवृत्कृतस्य रोहितं रूपं प्रसिद्धं लोके तदत्रिवृत्कृतस्य तेजसो रूपमिति विद्धि । तथा यच्छुक्लं रूपमग्नेरेव तदपामत्रिवृत्कृतानां यत्कृष्णं तस्यैवाग्ने रूपं तदन्नस्य पृथिव्या अत्रिवृत्कृताया इति विद्धि । | लोकमें त्रिवृत्कृत ( तीन तत्त्वोंसे मिश्रित ) अग्निका जो रोहित रूप प्रसिद्ध है वह अत्रिवृत्कृत ( केवल ) तेजका रूप है—ऐसा जानो । तथा उस अग्निका ही जो शुक्ल रूप है वह तीन तत्त्वोंके सम्मिश्रणसे रहित केवल जलका है और उसीका जो कृष्ण रूप है वह अन्नका—अत्रिवृत्कृत पृथिवीका रूप है—ऐसा जानो । |
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६१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| तत्रैवं सति रूपत्रयव्यतिरेकेणाग्निरिति यन्मन्यसे त्वं तस्याग्नेरग्नित्वमिदानीमपागादपगतम्। प्राग्रूपत्रयविवेकविज्ञानाद्यग्निबुद्धिरासीत्ते साग्निबुद्धिरपगताग्निशब्दश्चेत्यर्थः। यथा दृश्यमानरक्तोपधानसंयुक्तः स्फटिको गृह्यमाणः पद्मरागोऽयमितिशब्दबुद्धयोः प्रयोजको भवति प्रागुपधानस्फटिकयोर्विवेकविज्ञानात्तद्विवेकविज्ञाने तु पद्मरागशब्दबुद्धी निवर्तेते तद्विवेकविज्ञातुस्तद्वत्। | ऐसा होनेपर, तू जो समझता था कि अग्नि इन तीनों रूपोंसे अलग भी कोई वस्तु है सो उस अग्निका अग्नित्व अब चला गया। तात्पर्य यह है कि इन तीनों रूपोंका विशेष ज्ञान होनेसे पूर्व तेरी जो अग्निबुद्धि थी वह अग्निबुद्धि और 'अग्नि' शब्द अब निवृत्त हो गये। जिस प्रकार दिखायी देते हुए लाल रंगके उपधान (समीपवर्ती पदार्थ) से मिला हुआ स्फटिक प्राप्त होनेपर उपधान और स्फटिकका पार्थक्य ज्ञात होनेसे पूर्व 'यह पद्मराग है' इस प्रकारके शब्द और बुद्धिका प्रयोजक होता है, किंतु उनका पार्थक्य ज्ञात होनेपर उसमें उस पार्थक्यज्ञानीके पद्मराग शब्द और पद्मराग-बुद्धि दोनों निवृत्त हो जाते हैं उसी प्रकार [ रूपत्रयका विवेक होनेपर अग्निका अग्नित्व निवृत्त हो जाता है ]। | | ननु किमत्र बुद्धिशब्दकल्पनया क्रियते प्राग्रूपत्रयविवेककरणादग्निरेवासीत्तदग्नेरग्नित्वं | शङ्का—किंतु यहाँ (इस अग्निके सम्बन्धमें) अग्निबुद्धि और अग्निशब्द ऐसी अधिक कल्पना करके क्या लेना है? रूपत्रयका विवेक करनेसे पूर्व अग्नि ही था। वह |
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१५
| रोहितादिरूपविवेककरणादपागादिति युक्तम्; यथा तन्त्वपकर्षणे पटाभावः । <br><br> नैवं बुद्धिशब्दमात्रमेव ह्यग्नियत आह वाचारम्भणमग्निर्नाम विकारो नामधेयं नाममात्रमित्यर्थः । अतोऽग्निबुद्धिरपि मृषैव किंतर्हि तत्र सत्यम् ! त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्, नाणुमात्रमपि रूपत्रयव्यतिरेकेण सत्यमस्तीत्यवधारणार्थः ॥ १ ॥ | अग्निका अग्नित्व रोहितादि रूपोंका विवेक करनेसे निवृत्त हो गया—इतना ही कहना उचित है, जिस प्रकार कि तन्तुओंको निकाल लेनेपर पटका अभाव हो जाता है । <br><br> समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि अग्नि तो अग्निबुद्धि और अग्निशब्दमात्र ही है, कारण श्रुति कहती है 'अग्निरूप जो विकार है वह वाणीपर अवलम्बित नामधेय अर्थात् नाममात्र ही है।' इसलिये अग्निबुद्धि भी मिथ्या ही है । तो फिर उसमें सत्य क्या है ? बस, तीन रूप ही सत्य है—यह कथन इस बातको निश्चित करनेके लिये है कि तीन रूपोंके अतिरिक्त और कुछ अणुमात्र भी सत्य नहीं है ॥ १॥ | | तथा— | इसी प्रकार— |
—:०:—
यदादित्यस्य रोहितँ रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागादादित्यादित्यत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥२॥ यच्चन्द्रमसो रोहितँ रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागाच्चन्द्राच्चन्द्रत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥३॥
६१६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
६१६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
यद्विद्युतो रोहितँरूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागाद्विद्युतो विद्युत्त्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥
आदित्यका जो रोहित रूप है वह तेजका रूप है, जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कृष्णरूप है वह अन्नका है। इस प्रकार आदित्य से आदित्यत्व निवृत्त हो गया, क्योंकि [ आदित्यरूप ] विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है ॥ २ ॥ चन्द्रमाका जो रोहित रूप है वह तेजका रूप है, जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कृष्ण रूप है वह अन्नका है। इस प्रकार चन्द्रमासे चन्द्रत्व निवृत्त हो गया, क्योंकि [ चन्द्रमारूप ] विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है ॥ ३ ॥ विद्युतका जो रोहित रूप है वह तेजका रूप है, जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कृष्ण रूप है वह अन्नका है। इस प्रकार विद्युत्से विद्युत्त्वकी निवृत्ति हो गयी, क्योंकि [ विद्युत्रूप ] विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है ॥ ४ ॥
| संस्कृत (भाष्य) | हिन्दी अनुवाद |
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| यदादित्यस्य यच्चन्द्रमसो यद्विद्युत इत्यादि समानम् । | जो आदित्यका, जो चन्द्रमाका, जो विद्युत्का इत्यादि अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये। |
| ननु यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवतास्त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीत्युक्त्वा तेजस एव चतुर्भिरप्युदाहरणैरग्न्यादिभिस्त्रिवृत्करणं दर्शितं नावन्नयोरुदाहरणं दर्शितं त्रिवृत्करणे । | शङ्का—किंतु 'हे सोम्य ! जिस प्रकार ये तीनों देवता एक-एक करके प्रत्येक त्रिवृत-त्रिवृत् हैं वह मेरेद्वारा जान' ऐसा कहकर अग्नि आदि चारों उदाहरणोंसे तेजका ही त्रिवृत्करण दिखलाया गया है, त्रिवृत्करणमें जल और अन्नका तो उदाहरण प्रदर्शित किया ही नहीं गया। |
| खण्ड ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थं | ६१७ |
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| संस्कृत (मूल भाष्य) | हिन्दी (भाष्यार्थ) |
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| नैष दोषः; अबन्नविषयान्यप्युदाहरणान्येवमेव च द्रष्टव्यानीति मन्यते श्रुतिः, तेजस उदाहरणमुपलक्षणार्थम्। रूपवत्त्वात्स्पष्टार्थत्वोपपत्तेश्च। गन्धरसयोरनुदाहरणं त्रयाणामसंभवात्; न हि गन्धरसौ तेजसि स्तः। स्पर्शशब्दयोरनुदाहरणं विभागेन दर्शयितुमशक्यत्वात्। | **समाधान—**यह कोई दोष नहीं है। श्रुति ऐसा मानती है कि जल और अन्नविषयक उदाहरणोंको भी इसी प्रकार जानना चाहिये। तेजका उदाहरण उनका उपलक्षण करानेके लिये है। इसके सिवा, रूपवान् होनेके कारण उसके द्वारा स्पष्टार्थता भी सम्भव है। गन्ध और रसका उदाहरण इसलिये नहीं दिया गया कि इन तीनोंमें उनका होना असम्भव है; तेजमें गन्ध और रस हैं ही नहीं। तथा [त्रिविध] स्पर्श और [त्रिविध] शब्दको अलग करके नहीं दिखाया जा सकता इसलिये उनका भी उदाहरण नहीं दिया। |
| यदि सर्वं जगत्त्रिवृत्कृतमित्यग्न्यादिवत्त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यमग्नेरग्नित्ववदपागाज्जगतो जगत्त्वम्। तथाऽन्नस्याप्यप्शुङ्गत्वादाप इत्येव सत्यं वाचारम्भणमात्रमन्नम्। तथापामपि तेजःशुङ्गत्वाद्वाचारम्भणत्वं तेज इत्येव सत्यम्। तेजसोऽपि सच्छुङ्गत्वाद्वाचारम्भणत्वं सदित्येव सत्यमित्येषोऽर्थ विवक्षितः। | यदि सारा ही जगत् त्रिवृत्कृत है और अग्नि आदिके समान केवल तीन ही रूप सत्य हैं तो अग्निके अग्नित्वके समान संसारका संसारत्व भी निवृत्त हो गया। तथा अन्न जलका कार्य है, इसलिये जल ही सत्य है, अन्न केवल वाचारम्भणमात्र है; तथा तेजका कार्य होनेके कारण जल भी वाचारम्भणमात्र ही है, तेज ही सत्य है और तेज भी सत्का कार्य है इसलिये वह भी वाचारम्भण ही है, केवल सत् ही सत्य है। इस प्रकार इससे यही अर्थ बतलाना अभीष्ट है। |
६१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| ननु वाय्वन्तरिक्षे त्वत्रिवृत्कृते तेजःप्रभृतिष्वनन्तर्भूतत्वादवशिष्येते । एवं गन्धरसशब्दस्पर्शाश्चावशिष्टा इति कथं सता विज्ञातेन सर्वमन्यद्विज्ञातं विज्ञातं भवेत् ? तद्विज्ञाने वा प्रकारान्तरं वाच्यम् ।<br><br>नैष दोषः; रूपवद्द्रव्ये सर्वस्य दर्शनात् । कथम् ? तेजसि तावद्रूपवति शब्दस्पर्शयोरप्युपलम्भाद्वाय्वन्तरिक्षयोस्तत्र स्पर्शशब्दगुणवतोः सद्भावोऽनुमीयते । तथाबन्नयो रूपवतो रसगन्धान्तर्भाव इति । रूपवतां त्रयाणां तेजोऽबन्नानां त्रिवृत्करणप्रदर्शनेन सर्वं तदन्तर्भूतं सद्विकारत्वात्त्रीण्येव रूपाणि विज्ञातं मन्यते श्रुतिः । न हि | **शङ्का—**किंतु वायु और अन्तरिक्ष तो तेज आदिके अन्तर्गत न होनेके कारण अत्रिवृत्कृत ही रह जाते हैं । इसी प्रकार गन्ध, रस, शब्द और स्पर्श भी बच रहते हैं; फिर एकमात्र सत्को जान लेनेपर ही और सब अज्ञात पदार्थोंका ज्ञान किस प्रकार हो सकता है । अथवा उनका ज्ञान होनेके लिये श्रुतिको कोई दूसरा प्रकार बतलाना चाहिये ।<br><br>**समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि रूपवान् द्रव्यमें सब गुण देखे जा सकते हैं । किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] रूपवान् तेजमें शब्द और स्पर्शकी भी उपलब्धि होनेके कारण उसमें स्पर्श और शब्द गुणवाले वायु और आकाशके सद्भावका भी अनुमान किया जाता है । तथा रूपवान् जल और अन्नमें रस एवं गन्धका अन्तर्भाव हो जाता है । इस प्रकार तेज, जल और अन्न—इन तीन रूपवानोंका त्रिवृत्करण प्रदर्शित करनेसे श्रुति ऐसा मानती है कि उनके अन्तर्गत साराका सारा सत्का ही कार्य होनेके कारण तीन रूप ही सत्य जाने गये हैं; |
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१९
| मूर्तं रूपवद्द्रव्यं प्रत्याख्याय वाय्वाकाशयोस्तद्गुणयोर्गन्धरसयोर्वा ग्रहणमस्ति ।<br><br>अथवा रूपवतामपि त्रिवृत्करणं प्रदर्शनार्थमेव मन्यते श्रुतिः । यथा तु त्रिवृत्कृते त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्, तथा पञ्चीकरणेऽपि समानो न्याय इत्यतः सर्वस्य सद्विकारत्वात्सता विज्ञातेन सर्वमिदं विज्ञातं स्यात्सदेकमेवाद्वितीयं सत्यमिति सिद्धमेव भवति । तदेकस्मिन्सति विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति सूक्तम् ॥ २-४ ॥ | क्योंकि रूपवान् मूर्त्त पदार्थोंको छोड़कर वायु और आकाशका तथा उनके गुण एवं गन्ध और रसका ग्रहण ही नहीं हो सकता ।<br><br>अथवा इन रूपवान् पदार्थोंके त्रिवृत्करणको भी श्रुति प्रदर्शनके ही लिये मानती है। जिस प्रकार त्रिवृत्करणमें तीन रूप ही सत्य हैं उसी प्रकार पञ्चीकरणमें भी समान नियम ही समझना चाहिये। इस प्रकार सब कुछ सत्का ही विकार होनेके कारण सत्के ज्ञानसे यह साराका सारा जान लिया जाता है। अतः एकमात्र अद्वितीय सत् ही सत्य है—यह सिद्ध ही है। इसलिये यह ठीक ही कहा है कि उस एकको जान लेनेपर यह सब जान लिया जाता है ॥ २-४ ॥ |
एतद्ध स्म वै तद्विद्वाꣳस आहुः पूर्वे महाशाला महाश्रोत्रिया न नोऽद्य कश्चनाश्रुतममतमविज्ञातमुदाहरिष्यतीति ह्येभ्यो विदाञ्चक्रुः ॥ ५ ॥
इस (त्रिवृत्करण) को जाननेवाले पूर्ववर्ती महागृहस्थ और महाश्रोत्रियोंने यह कहा था कि इस समय हमारे कुलमें कोई बात अश्रुत, अमत अथवा अविज्ञात है—ऐसा कोई नहीं कह सकेगा, क्योंकि इन अग्नि आदिके दृष्टान्तद्वारा वे सब कुछ जानते थे ॥ ५ ॥
६२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| एतद्धिद्वांसो विदितवन्तः पूर्वेऽतिक्रान्ता महाशाला महाश्रोत्रिया आहुर्ह स्म वै किल। किमुक्तवन्तः? इत्याह—न नोऽस्माकं कुलेऽद्येदानीं यथोक्तविज्ञानवतां कश्चन कश्चिदप्यश्रुतममतमविज्ञातमुदाहरिष्यति नोदाहरिष्यति, सर्वं विज्ञातमेवास्मत्कुलीनानां सद्विज्ञानवत्त्वादित्यभिप्रायः।<br><br>ते पुनः कथं सर्वं विज्ञातवन्तः? इत्याह—एभ्यस्त्रिभ्यो रोहितादिरूपेभ्यस्त्रिवृत्कृतेभ्यो विज्ञातेभ्यः सर्वमप्यन्यच्छिष्टमेवमेवेति विदाञ्चक्रुर्विज्ञातवन्तो यस्मात्तस्मात्सर्वज्ञा एव सद्विज्ञानात्त आसुरित्यर्थः। अथवैभ्यो विदाञ्चक्रुरित्यग्न्यादिभ्यो दृष्टान्तेभ्यो विज्ञातेभ्यः सर्वमन्यद्विदाञ्चक्रुरित्येतत् ॥ ५ ॥ | इस (त्रिवृत्करण) को जाननेवाले पूर्ववर्ती अर्थात् अतीतकालीन महागृहस्थ और महाश्रोत्रियोंने कहा था। क्या कहा था? सो बतलाते हैं—'उपर्युक्त विज्ञानको जाननेवाले हमलोगोंके कुलमें आज-इस समय कुछ भी अश्रुत, अमत अथवा अविज्ञात हो, ऐसा कोई भी नहीं बता सकेगा। तात्पर्य यह है कि सत्के विज्ञानसे युक्त होनेके कारण हमारे कुटुम्बियोंको सब कुछ ज्ञान ही है।'<br><br>किंतु उन्होंने किस प्रकार सब कुछ जाना है, सो श्रुति बतलाती है—'क्योंकि इन तीन अर्थात् [इस प्रकार] जाने हुए त्रिवृत्कृत रोहितादि रूपोंद्वारा, अन्य अवशिष्ट पदार्थ भी ऐसे ही हैं—इस प्रकार वे जानते हैं, अतः सत्के विज्ञानके कारण वे सब सर्वज्ञ ही हो गये हैं'—ऐसा इसका तात्पर्य है। अथवा 'एभ्यः विदाञ्चक्रुः' इसका यह भी तात्पर्य हो सकता है कि विज्ञात हुए इन अग्नि आदि दृष्टान्तोंद्वारा वे और सबको भी जान गये हैं ॥ ५ ॥ |
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खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२१
| कथम् ? | किस प्रकार जान गये हैं ? |
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यदु रोहितमिवाभूदिति तेजसस्तद्रूपमिति तद्विदाञ्चक्रुर्यदु शुक्लमिवाभूदित्यपाᳪरूपमिति तद्विदाञ्चक्रुर्यदु कृष्णमिवाभूदित्यन्नस्य रूपमिति तद्विदाञ्चक्रुः ॥ ६ ॥
यद्विज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवतानाᳪसमास इति तद्विदाञ्चकुर्यथा नु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ७ ॥
जो कुछ रोहित-सा है वह तेजका रूप है—ऐसा उन्होंने जाना है; जो शुक्ल-सा है वह जलका रूप है—ऐसा उन्होंने जाना है तथा जो कृष्ण-सा है वह अन्नका रूप है—ऐसा उन्होंने जाना है ॥ ६ ॥
तथा जो कुछ विज्ञात-सा है वह इन देवताओंका ही समुदाय है—ऐसा उन्होंने जाना है। हे सोम्य ! अब तू मेरेद्वारा यह जान कि किस प्रकार ये तीनों देवता पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् हो जाता है ॥ ७ ॥
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| यदन्यरूपेण संदिह्यमाने कपोतादिरूपे रोहितमिव यद्गृह्यमाणमभूत्तेषां पूर्वेषां ब्रह्मविदाम्, <br><br> तत्तेजसो रूपमिति विदाञ्चक्रुः। <br><br> तथा यच्छुक्लमिवाभूद्गृह्यमाणं तदपां रूपम्, यत्कृष्णमिवगृह्यमाणं तदन्नस्येति विदाञ्चक्रुः। एवमेवा- | [अग्नि आदिकी अपेक्षा] अन्य रूपसे संदेह किये जाते हुए कपोतादिरूपमें जो उन पूर्ववर्ती ब्रह्मवेत्ताओंद्वारा रोहित-सा ग्रहण किया जाता था वह तेजका रूप है—ऐसा उन्होंने जाना। तथा जो शुक्ल-सा ग्रहण किया जाता था वह जलका रूप है और जो कृष्ण-सा ग्रहण किया जाता था वह अन्नका रूप है—ऐसा उन्होंने जाना। इसी प्रकार जो अत्यन्त |