भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 611, कुल 978 में से

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| खण्ड ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०७ | | :--- | :--- |


| बहुभवनं प्रयोजनं नाद्यापि निर्वृत्तमित्यत ईक्षां पुनः कृतवती बहुभवनमेव प्रयोजनमुररीकृत्य । | बहुत होनारूप प्रयोजन अभीतक समाप्त नहीं हुआ था, इसलिये बहुत होनारूप प्रयोजनको ही मनमें रखकर उसने फिर ईक्षण किया । | | कथम् ? हन्तेदानीमहमिमा यथोक्तास्तेजआद्यास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनेति स्वबुद्धिस्थं पूर्वसृष्ट्यनुभूतप्राणाधारणमात्मानमेव स्मरन्त्याहानेन जीवेनात्मनेति । प्राणधारणकर्त्रात्मनेति वचनात्स्वात्मनोऽव्यतिरिक्तेन चैतन्यस्वरूपतया विशिष्टेनेत्येतद्दर्शयति । अनुप्रविश्य तेजोऽबन्नभूतमात्रासंसर्गेण लब्धविशेषविज्ञाना सती नाम च रूपं च नामरूपे व्याकरवाणि विस्पष्टमाकरवाण्यसौ नामायमिदरूप इति व्याकुर्यामित्यर्थः । | किस प्रकार ईक्षण किया ? 'अब मैं इन उपर्युक्त तेज आदि तीन देवताओंमें इस जीवरूपसे—ऐसा कहकर श्रुति पूर्वसृष्टिमें अनुभूत प्राणधारी आत्माका स्मरण करती हुई ही कहती है कि इस जीवात्मरूपसे—प्राण धारण करनेवाले आत्माके द्वारा—इस कथनसे श्रुति यह दिखलाती है कि अपने आत्मासे अभिन्न अर्थात् चैतन्यस्वरूपतया आत्मासे अविशिष्ट जीवरूपसे अनुप्रवेश कर अर्थात् तेज, अप् और अन्न इन भूतमात्राओंके संसर्गसे, जिसने विशेष विज्ञान प्राप्त किया है, ऐसा होकर मैं नामरूप–नाम और रूपोंका व्याकरण–व्यक्तीकरण करूँ; अर्थात् यह इस नामवाला है और इस रूपका है—ऐसा अभिव्यक्त करूँ ।' | | ननु न युक्तमिदमसंसारिण्याः सर्वज्ञाया देवताया बुद्धिपूर्वकमनेकशतसहस्रानर्थाश्रयं | शङ्का—किंतु स्वतन्त्रता रहते हुए भी असंसारी सर्वज्ञ देवताका बुद्धिपूर्वक ऐसा संकल्प करना कि, सैकड़ों-हजारों अनर्थोंके |

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