भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 617, कुल 978 में से

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पृष्ठ 617

चतुर्थ खण्ड

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एकके ज्ञानसे सबका ज्ञान

यत्तद्देवतानां त्रिवृत्करणमुक्तं तस्यैवोदाहरणमुच्यते, उदाहरणं नामैकदेशप्रसिद्ध्याशेषप्रसिद्धयर्थमुदाह्रियत इति । तदेतदाह—उन देवताओंका जो त्रिवृत्करण कहा गया है, उसका उदाहरण दिया जाता है । उदाहरण उसे कहते हैं, जो एक देशकी प्रसिद्धि-द्वारा सम्पूर्ण देशकी प्रसिद्धिके लिये कहा जाता है । श्रुति वही उदाहरण देती है—

यदग्ने रोहितꣳरूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागादग्नेरग्नित्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ १ ॥

अग्निका जो रोहित ( लाल ) रूप है वह तेजका ही रूप है, जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कृष्ण है वह अन्नका है । इस प्रकार अग्निसे अग्नित्व निवृत्त हो गया, क्योंकि [ अग्निरूप ] विकार वाणीसे कहनेके लिये नाममात्र है; केवल तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है ॥१॥

यदग्नेस्त्रिवृत्कृतस्य रोहितं रूपं प्रसिद्धं लोके तदत्रिवृत्कृतस्य तेजसो रूपमिति विद्धि । तथा यच्छुक्लं रूपमग्नेरेव तदपामत्रिवृत्कृतानां यत्कृष्णं तस्यैवाग्ने रूपं तदन्नस्य पृथिव्या अत्रिवृत्कृताया इति विद्धि ।लोकमें त्रिवृत्कृत ( तीन तत्त्वोंसे मिश्रित ) अग्निका जो रोहित रूप प्रसिद्ध है वह अत्रिवृत्कृत ( केवल ) तेजका रूप है—ऐसा जानो । तथा उस अग्निका ही जो शुक्ल रूप है वह तीन तत्त्वोंके सम्मिश्रणसे रहित केवल जलका है और उसीका जो कृष्ण रूप है वह अन्नका—अत्रिवृत्कृत पृथिवीका रूप है—ऐसा जानो ।