छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 614, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| रूपादि सदात्मनैव सत्यं विकाराजातं स्वतस्त्वनृतमेव । 'वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्' इत्युक्तत्वात् । तथा जीवोऽपीति । यक्षानुरूपो हि बलिरिति न्यायप्रसिद्धिः । अतः सदात्मना सर्वव्यवहाराणां सर्वविकाराणां च सत्यत्वं सतोऽन्यत्वे चानृतत्वमिति न कश्चिद्दोषस्तार्किकैरिहानुषङ्क्तुं शक्यः । यथेतेरेतरविरुद्धद्वैतवादाः स्वबुद्धिविकल्पमात्रा अतत्त्वनिष्ठा इति शक्यं वक्तुम् ॥ २ ॥ | नाम-रूपादि विकारजात सत्स्वरूपसे ही सत्य है, स्वयं तो वह मिथ्या ही है, क्योंकि 'विकार तो केवल कहनेके लिये नाममात्र है' ऐसा कहा जा चुका है ऐसा ही जीव भी है । 'जैसा यक्ष वैसी ही बलि' यह न्याय प्रसिद्ध ही है । अतः सत्स्वरूपसे सम्पूर्ण व्यवहार और सारे विकारोंकी सत्यता है तथा सत्से पृथक् माननेपर उनका मिथ्यात्व है—इस प्रकार तार्किकोंद्वारा इस विषयमें किसी दोषका प्रसङ्ग नहीं उपस्थित किया जा सकता, जैसा कि हम कह सकते हैं कि एक दूसरेसे विरुद्ध द्वैतवाद अपनी ही बुद्धिके विकल्पमात्र और अतत्त्वनिष्ठ हैं ॥ २ ॥ |
| सैवं तिस्रो देवता अनुप्रविश्य स्वात्मावस्थे बीजभूते अव्याकृते नामरूपे व्याकरवाणीतीक्षित्वा— | इस प्रकार उसने उन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेश कर और इस प्रकार ईक्षण कर कि ‘मैं अपने स्वरूपमें स्थित अव्याकृत नाम रूपोंका व्याकरण करूँ’— |
तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् ॥ ३ ॥