भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 615, कुल 978 में से

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पृष्ठ 615

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६११


‘और उनमेंसे एक-एक देवताको त्रिवृत्-त्रिवृत् करूँ’ ऐसा विचार कर उस इस देवताने इस जीवात्मरूपसे ही उन तीन देवताओंमें अनुप्रवेश कर नामरूपका व्याकरण किया ॥ ३ ॥

संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी अनुवाद
तासां च तिसृणां देवताना-<br><br>मेकैकां त्रिवृतं त्रिवृतं करवाणि । एकैकस्याः प्राधान्यं द्वयोर्द्वयो-<br><br>र्गुणभावोऽन्यथा हि रज्ज्वा इवैकमेव त्रिवृत्करणं स्यात्, न<br><br>तु तिसृणां पृथक्पृथक्त्रिवृत्करण-<br><br>मिति । एवं हि तेजोऽबन्नानां<br><br>पृथङ्नामप्रत्ययलाभः स्यात्तेज<br><br>इदमीमा आपोऽन्नमिदमिति च<br><br>सति च पृथङ्नामप्रत्ययलाभे<br><br>देवतानां—सम्यग्व्यवहारस्य<br><br>प्रसिद्धिः प्रयोजनं स्यात् ।‘और उन तीनों देवताओंमेंसे एक-एकको त्रिवृत्-त्रिवृत् करूँ ।’ एक-एक देवताके त्रिवृत्करणमें एक-एककी प्रधानता और दो-दोकी गौणता रहती है, नहीं तो तीन [लड़वाली] रस्सीके समान एक ही त्रिवृत्करण होता । तीनों देवताओं-का पृथक्-पृथक् त्रिवृत्करण नहीं होता । इस प्रकार ही तेज, अप् और अन्नको ‘यह तेज है, यह जल है, यह अन्न है’ ऐसे पृथक् पृथक् नाम और प्रतीतिकी प्राप्ति हो सकती है, और पृथक्-पृथक् नाम तथा प्रतीतिकी प्राप्ति होनेपर ही देवताओंके सम्यक् व्यवहारकी सिद्धिरूप प्रयोजनकी पूर्ति हो सकती है ।
एवमीक्षित्वा सेयं देवतेमा-<br><br>स्तिस्रो देवता अनेनैव यथोक्ते-<br><br>नैव जीवेन सूर्यबिम्बवदन्तः-<br><br>प्रविश्य वैराजं पिण्डं प्रथमं<br><br>देवादीनां च पिण्डाननुप्रविश्यइस प्रकार ईक्षण कर उस देवता-ने इन तीनों देवताओंमें इस उपर्युक्त जीवरूपसे ही सूर्यबिम्बके समान भीतर प्रवेश कर अर्थात् पहले विराट् पिण्डमें और उसके पश्चात् देवादि पिण्डोंमें अनुप्रवेश कर अपने संकल्प-के अनुसार ही नाम-रूपोंका

छा० उ० २०—