BharatKosha
Back to the archive

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

६९६ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ६

Page 700Permalink
६९६छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय ६
निमित्तफलाभिसंधानेन गमनदर्शनात् । न हि सदात्मैकत्वदर्शिनः सत्याभिसन्धस्य देशकालनिमित्तफलाद्यनृताभिसंधिरुपपद्यते, विरोधात्। अविद्याकामकर्मणां च गमननिमित्तानां सद्विज्ञानहुताशनविप्लुष्टत्वादगमनानुपपत्तिरेव, "पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्त्विहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः" इत्याद्याथर्वणे। नदीसमुद्रदृष्टान्तश्रुतेश्च ॥ २ ॥पूर्वक देखा जाता है और सदात्माका एकत्व देखनेवाले सत्यनिष्ठ विद्वान्‌को देश, काल, निमित्त और फल आदि असद्वस्तुओंका अभिनिवेश होना सम्भव नहीं है, क्योंकि इसका उस (सत्यनिष्ठा) से विरोध है। गमनके निमित्तभूत अविद्या, कामना और कर्मोंके सद्विज्ञानरूप अग्निसे भस्म हो जानेके कारण उसके गमनकी अनुपपत्ति ही है। "पूर्णकाम कृतकृत्य पुरुषकी सम्पूर्ण कामनाएँ यहीं लीन हो जाती हैं" ऐसा अथर्वण श्रुतिमें कहा है; और इसके सिवा नदी-समुद्र-दृष्टान्तकी श्रुति भी है * ॥ २ ॥
<div align="center">

---: ॐ :---

</div>

स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳ सर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥

वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला--] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [तब आरुणिने] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥


* देखिये मुण्डक० ३।२।८

Page 701Permalink

खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्य ६९७


| स य इत्यादि समानम् ।<br><br>यदि मरिष्यतो मुमुक्षतश्च तुल्या सत्सम्पत्तिस्तत्र विद्वान्सत्सम्पन्नो नावर्तत आवर्तते त्वविद्वानित्यत्र कारणं दृष्टान्तेन भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति। तथा सोम्येति होवाच॥ ३ । | ‘स यः’ इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत् है। ‘यदि मरनेवाले और मुमुक्षुकी सत्सम्पत्ति एक-जैसी है तो विद्वान् तो सत्‌को प्राप्त होकर नहीं लौटता और अविद्वान् लौटता है—इसमें जो कारण है उसे हे भगवन् ! दृष्टान्तद्वारा मुझे फिर समझाइये’ [ —ऐसा श्वेतकेतुने कहा ] । तब आरुणिने कहा—‘सौम्य ! अच्छा’ ॥ ३ ॥ |

--: ❀ :--

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥

Page 702Permalink

षोडश खण्ड

—: ० :—

चोरके तप्त परशुग्रहणके दृष्टान्तद्वारा उपदेश

| शृणु यथा— | सुन, जिस प्रकार— |

पुरुषँ सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहार्षीत्स्तेय-
मकार्षीत्परशुमस्मै तपतेति स यदि तस्य कर्ता भवति
तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोऽनृताभिसन्धोऽनृते-
नात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ
हन्यते ॥ १ ॥

हे सोम्य ! [ राजकर्मचारी ] किसी पुरुषको हाथ बाँधकर लाते हैं [ और कहते हैं— ] 'इसने धनका अपहरण किया है, चोरी की है इसके लिये परशु तपाओ।' वह यदि उसका (चोरीका) करनेवाला होता है तो अपनेको मिथ्यावादी प्रमाणित करता है। वह मिथ्याभिनिवेशवाला पुरुष अपनेको मिथ्यासे छिपाता हुआ तपे हुए परशुको ग्रहण करता है; किंतु वह उससे दग्ध होता है और मारा जाता है ॥ १ ॥

| सोम्य पुरुषं चौर्यकर्मणि संदिह्यमानं निग्रहाय परीक्षणाय वोतापि हस्तगृहीतं बद्धहस्तमानयन्ति राजपुरुषाः । किं कृतवानयमिति पृष्टाश्चाहुरपहार्षीद्धनमस्यायम् । ते चाहुः किमपहरणमात्रेण बन्धनमर्हति ? | हे सोम्य ! जिस पुरुषके विषयमें चोरी करनेका संदेह होता है उसे राजकर्मचारी दण्ड देने अथवा उसकी परीक्षा करनेके लिये 'हस्त-गृहीत'—हाथ बाँधकर लाते हैं। 'इसने क्या किया है ?' इस प्रकार पूछे जानेपर वे कहते हैं कि 'इसने इस पुरुषका धन लिया है।' तब वे (न्यायाधीश) कहते हैं 'क्या धन लेनेमात्रसे यह बन्धनके योग्य हो गया; तब तो अन्य किसी प्रकार |

Page 703Permalink

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६९९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अन्यथा दत्तेऽपि धने बन्धनप्रसङ्गात्; इत्युक्ताः पुनराहुः-स्तेयमकार्षीच्चौर्येण धनमपहार्षीदिति। <br><br> तेष्वेवं वदत्स्वितरोऽपह्नुते नाहं तत्कर्तेति ।धन देनेपर भी उसे लेनेवालेको बन्धनका प्रसंग उपस्थित होता है।' इस प्रकार कहे जानेपर वे फिर कहते हैं—'इसने चोरी की है अर्थात् चोरीसे धन लिया है।' <br><br> उनके इस प्रकार कहनेपर वह पुरुष 'मैं चोरी करनेवाला नहीं हूँ' ऐसा कहकर अपने कर्मको छिपाता है।
ते चाहुः संदिह्यमानं स्तेयमकार्षीस्त्वमस्य धनस्येति । <br><br> तस्मिंश्चापह्नुवान् आहुः परशुमस्मै तपतेति शोधयत्वात्मानमिति । स यदि तस्य स्तैन्यस्य कर्ता भवति बहिश्चापह्नुते स एवं भूतस्तत एवानृतमन्यथाभूतं सन्तमन्यथात्मानं कुरुते ।तब वे संदेह किये जानेवाले पुरुषसे कहते हैं—'तूने इसके धनकी चोरी अवश्य की है।' <br><br> फिर भी उसके छिपानेपर वे कहते हैं—'इसके लिये परशु तपाओ—इस प्रकार यह अपनेको निर्दोष सिद्ध करे।' यदि वह उस चोरीका करनेवाला होता है और ऊपरसे छिपाता है तो ऐसा होनेपर वह अपनेको अनृत अर्थात् अन्यथा (चोर) होनेपर अपनेको अन्यथा (साहु) प्रदर्शित करता है।
स तथानृताभिसन्धोऽनृतेनात्मानमन्तर्धाय व्यवहितं कृत्वा परशुं तप्तं मोहात्प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ हन्यते राजपुरुषैः स्वकृतेनानृताभिसन्धिदोषेण ॥१॥इस प्रकार मिथ्याभिनिवेशवाला होकर वह अपनेको मिथ्यासे अन्तर्हित करता—छिपाता हुआ मोहवश तपे हुए परशुको ग्रहण करता और जल जाता है। तब अपने किये हुए मिथ्याभिनिवेशरूप दोषसे वह राजपुरुषोंद्वारा मारा जाता है ॥ १ ॥

७०० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

Page 704Permalink
७००छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

अथ यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते स सत्याभिसन्धः सत्येनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽथ मुच्यते ॥२॥

और यदि वह उस (चोरी) का करनेवाला नहीं होता तो उसीसे वह अपनेको सत्य प्रमाणित करता है। वह सत्याभिसन्ध अपनेको सत्यसे आवृत कर उस तपे हुए परशुको पकड़ लेता है। वह उससे नहीं जलता और तत्काल छोड़ दिया जाता है ॥ २ ॥

अथ यदि तस्य कर्मणोऽकर्ता भवति, तत एव सत्यमात्मानं कुरुते। स सत्येन तया स्तैन्याकर्तृतयात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति। स सत्याभिसन्धः सन्न दह्यते सत्यव्यवधानात्, अथ मुच्यते च मृषाभियोक्तृभ्यः। तप्तपरशुहस्ततलसंयोगस्य तुल्यत्वेऽपि स्तेयकर्तृकर्त्रोरनृताभिसन्धो दह्यते न तु सत्याभिसन्धः ॥ २ ॥और यदि वह उस कर्मका करनेवाला नहीं होता तो उस (चोरीके अकर्तृत्व) के ही द्वारा वह अपनेको सत्य प्रमाणित करता है। वह उस चोरीकी अकर्तृतारूप सत्यसे अपनेको अन्तर्हित कर उस तपे हुए परशुको ग्रहण करता है और सत्याभिसन्ध होनेके कारण सत्यका व्यवधान हो जानेसे वह उससे नहीं जलता। तब मिथ्या अभियोग लगानेवाले उसे तत्काल छोड़ देते हैं। इस प्रकार तप्त परशु और हथेलीके संयोगमें समानता होनेपर भी चोरी करने और न करनेवालोंमें मिथ्याभिसन्ध करनेवाला जल जाता है और सत्याभिसन्ध नहीं जलता ॥ २ ॥

Page 705Permalink

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्य ७०१


स यथा तत्र नादाह्यैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ ३ ॥

वह जिस प्रकार उस [परीक्षाके] समय नहीं जलता [उसी प्रकार विद्वान्‌का पुनरावर्तन नहीं होता और अविद्वान्‌का होता है]। यह सब एतद्रूप ही है, वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो! वही तू है। तब वह (श्वेतकेतु) उसे जान गया—उसे जान गया ॥३॥

स यथा सत्याभिसन्धस्तप्तपरशुग्रहणकर्मणि सत्यव्यवहितहस्ततलत्वान्नादाह्येत न दह्येतेत्येतदेवं सद्ब्रह्मसत्याभिसन्धीतरयोः शरीरपातकाले च तुल्यायां सत्सम्पत्तौ विद्वान्सत्सम्पद्य न पुनर्व्याघ्रदेवादिदेहग्रहणायोवर्तते। अविद्वांस्तु विकारानृताभिसन्धः पुनर्व्याघ्रादिभावं देवतादिभावं वा यथाकर्म यथाश्रुतं प्रतिपद्यते।<br><br>यदात्माभिसन्ध्यनभिसन्धिकृते मोक्षबन्धने यच्च मूलं जगतोवह सत्याभिसन्ध पुरुष जिस प्रकार उस तप्त परशुको ग्रहण करनेके कर्ममें हथेलीके सत्यसे व्यवहित रहनेके कारण नहीं जलता उसी प्रकार देहपातके समय सद्ब्रह्म-रूप सत्यमें निष्ठा रखनेवाले और उससे भिन्न असन्निविष्ट पुरुषकी सत्सम्पत्तिमें समानता होनेपर भी जो विद्वान् है वह व्याघ्र अथवा देवादि शरीरोंको ग्रहण करनेके लिये नहीं लौटता, किंतु अविद्वान् विकाररूप अनृतमें अभिनिविष्ट होनेके कारण अपने कर्म और ज्ञानके अनुसार पुनः व्याघ्रादिभाव अथवा देवादिभावको प्राप्त हो जाता है।<br><br>जिस आत्माकी अभिसन्धि और अनभिसन्धिके कारण मोक्ष और बन्धन होते हैं, जो संसारका मूल

७०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

Page 706Permalink
७०२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| यदायतना यत्प्रतिष्ठाश्च सर्वाः प्रजा यदात्मकं च सर्वं यच्चाजममृतमभयं शिवमद्वितीयं तत्सत्यं स आत्मा तवातस्तत्त्वमसि हे श्वेतकेतो इत्युक्तार्थमसकृद्वाक्यम् । <br><br> कः पुनरसौ श्वेतकेतुस्त्वंशब्दार्थः । योऽहं श्वेतकेतुरुद्दालकस्य पुत्र इति वेदात्मानमादेशं श्रुत्वा मत्वा विज्ञाय चाश्रुतममतमविज्ञातं विज्ञातुं पितरं पप्रच्छ कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति । स एषोऽधिकृतः श्रोता मन्ता विज्ञाता तेजोऽबन्नमयं कार्यकरणसङ्घातं प्रविष्टा परैव देवता नामरूपव्याकरणायादर्श इव पुरुषः सूर्यादिरिव जलादौ प्रतिबिम्बरूपेण स आत्मानं कार्यकारणेभ्यः प्रविभक्तं सद्रूपं सर्वात्मानं प्राक् पितुः | है, सम्पूर्ण प्रजा जिसके आश्रित और जिसमें प्रतिष्ठित है, सारा संसार जिस स्वरूपवाला है तथा जो अजन्मा, अमृत, अभय, शिव और अद्वितीय है वही सत्य है और वही तेरा आत्मा है; अतः हे श्वेतकेतो ! तू वह है। इस प्रकार इस वाक्यका अर्थ कई बार कहा जा चुका है। <br><br> [ अब यहाँ प्रश्न होता है कि ] त्वं शब्दका वाच्य यह श्वेतकेतु कौन है ? [ उत्तर— ] जो 'मैं श्वेतकेतु उद्दालकका पुत्र हूँ' ऐसा अपनेको जानता था तथा जिसने [अपने पिताके] उस आदेशका श्रवण, मनन और ज्ञान प्राप्त करके अश्रुत, अमत और अविज्ञातको जाननेके लिये पितासे पूछा था कि 'भगवन् ! वह आदेश किस प्रकार है ?' वह यह अधिकारी श्रोता, मन्ता और विज्ञाता दर्पणमें प्रतिफलित हुए पुरुष और जलादिमें प्रतिबिम्ब-रूपसे प्रविष्ट हुए सूर्यादिके समान तेज-जल अन्नमय देहेन्द्रियसङ्घातमें नाम-रूपकी अभिव्यक्ति करनेके लिये प्रविष्ट हुई परदेवता ही है। वह पिताका उपदेश सुननेसे पूर्व |

Page 707Permalink

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०३


संस्कृतहिन्दी
श्रवणाच्च विजज्ञौ । अथेेदानीं पित्रा प्रतिबोधितस्तत्त्वमसीतिदृष्टान्तैर्हेतुभिश्च तत्पितुरस्य ह किलोक्तं सदेवाहमस्मीति विजज्ञौ विज्ञातवान् । द्विर्वचनमध्यायपरिसमाप्त्यर्थम् ।अपनेको देह और इन्द्रियोंसे भिन्न सद्रूप सर्वात्मा नहीं जानता था । अब 'तू वह है' इस प्रकार दृष्टान्त और हेतुपूर्वक पिताद्वारा समझाये जानेपर वह पिताके इस कथनको कि 'मैं सत ही हूँ' समझ गया है । 'विजज्ञौ इति' इस पदकी द्विरुक्ति अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ।
किं पुनरत्र षष्ठे वाक्यप्रमाणे-पूर्वं०—किंतु इस छठे अध्यायमें वाक्यप्रमाणसे आत्मामें क्या फल हुआ ?
न जनितं फलमात्मनि ?
[षष्ठाध्यायवाक्यप्रमाणजन्यफलदर्शनम्]<br><br>कर्तृत्वभोक्तृत्वयोरधिकृतत्वविज्ञाननिवृत्तिस्तस्यफलं यमवोचाम त्वंशब्दवाच्यमर्थं श्रोतुं मन्तुं चाधिकृतत्वमविज्ञातविज्ञानफलार्थम् । प्राक्चैतस्माद्विज्ञानादहमेवं करिष्याम्यग्निहोत्रादीनि कर्माण्यहमत्राधिकृतः, एषां च कर्मणां फलमिहामुत्र च भोक्ष्ये कृतेषु वा कर्मसु कृतकर्तव्यः स्यामित्येवं कर्तृत्वभोक्तृत्वयोरधिकृ-सिद्धान्ती—हमने अविज्ञातके विज्ञानरूप फलके लिये श्रवण और मनन करनेमें अधिकृत जिस 'त्वम्' शब्दवाच्य अर्थका वर्णन किया है उसके अपनेमें (आरोपित) कर्तृत्व भोक्तृत्वके अधिकृतत्व-विज्ञानकी निवृत्ति ही इसका फल है । इस विज्ञानसे पूर्व 'मैं इस प्रकार अग्निहोत्रादि कर्म करूँगा, मैं इसका अधिकारी हूँ, तथा इन कर्मोंका फल मैं इस लोक और परलोकमें भोगूँगा और इन कर्मोंके करनेपर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा' इस प्रकार मैं कर्तृत्व और भोक्तृत्वका अधिकारी हूँ—ऐसा जो उसे आत्मामें विज्ञान

| ७०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |

Page 708Permalink
७०४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| तोऽस्मीत्यात्मनि यद्विज्ञानमभूतस्य, यत्सज्जगतो मूलमेकमेवाद्वितीयं तत्त्वमसीत्यनेन वाक्येन प्रतिबुद्धस्य निवर्तते, विरोधात् । न ह्येकस्मिन्नद्वितीये आत्मन्ययमहमस्मीति विज्ञाते ममेदमन्यदनेन कर्तव्यमिदं कृत्वास्य फलं भोक्ष्य इति वा भेदविज्ञानमुपपद्यते । तस्मात्सत्सत्याद्वितीयात्मविज्ञाने विकारानृतजीवात्मविज्ञानं निवर्तत इति युक्तम् ।<br><br>ननु तत्त्वमसीत्यत्र त्वंशब्दवाच्येऽर्थे सद्बुद्धिरादिश्यते यथादित्यमनआदिषु ब्रह्मादिबुद्धिः । यथा च लोके प्रतिमादिषु विष्ण्वादिबुद्धिस्तद्वन्न तु सदेव त्वमिति । यदि सदेव श्वेतकेतुः स्यात्कथमात्मानं न विजानीयाद्येन तस्मै तत्त्वमसीत्युपदिश्यते । | था, वह — जो एकमात्र अद्वितीय सत् जगत्का मूल है वही तू है— इस वाक्यद्वारा जग उठनेपर निवृत्त हो जाता है, क्योंकि [ पूर्व मिथ्या ज्ञानसे ] इसका विरोध है । कारण, एकमात्र अद्वितीय आत्माके विषयमें 'यह मैं हूँ'—ऐसा ज्ञान हो जानेपर 'मुझे अपना यह अन्य कर्तव्य इस साधनसे करना चाहिये, इसे करनेपर मैं इसका फल भोगूँगा।' इस प्रकारकी भेदबुद्धि होनी सम्भव नहीं है । अतः सद्रूप सत्य और अद्वितीय आत्माका ज्ञान होनेपर विकाररूप मिथ्या जीवात्मबुद्धिकी निवृत्ति हो जाती है—यह कथन ठीक ही है ।<br><br>पूर्व०—किंतु जिस प्रकार आदित्य और मन आदिमें ब्रह्मादिबुद्धिका तथा लोकमें प्रतिमा आदिमें विष्णुबुद्धिका आरोप किया जाता है उसी प्रकार 'तत्त्वमसि' इस वाक्यके द्वारा 'त्वम्' शब्दके वाच्यार्थमें तो सद्बुद्धिका आरोप ही किया जाता है । वस्तुतः त्वमर्थ सत् ही नहीं है। यदि श्वेतकेतु सत् ही होता तो अपनेको क्यों न जानता, जिससे कि उसे 'तू वह है' इस प्रकार उपदेश किया गया । |

Page 709Permalink

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०५


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
तत्परिहारः<br>न; आदित्यादिवाक्यवैलक्षण्यात् । आदित्यो ब्रह्मेत्यादावितिशब्दव्यवधानान्न साक्षाद्ब्रह्मत्वं गम्यते । रूपादिमत्त्वाच्चादित्यादीनामाकाशमनसोश्चेतिशब्दव्यवधानादेवाब्रह्मत्वम् । इह तु सत एवेह प्रवेशं दर्शयित्वा तत्त्वमसीति निरङ्कुशं सदात्मभावमुपदिशति ।सिद्धान्ती— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि 'आदित्यो ब्रह्मेत्युपासीत' इत्यादि वाक्योंसे इस वाक्यमें विलक्षणता है। 'आदित्यो ब्रह्मेत्युपासीत' आदि वाक्योंमें 'इति' शब्दका व्यवधान रहनेके कारण उनका साक्षात् ब्रह्मत्व ज्ञात नहीं होता। इसके सिवा आदित्यादि रूपवान् होनेके कारण तथा आकाश और मनके 'इति' शब्दसे व्यवधान होनेके कारण वे ब्रह्म नहीं हो सकते। किंतु इस प्रसङ्गमें तो [ आरुणि ] सत्‌का ही इस (तेजोऽवन्नमय-संघात) में प्रवेश दिखलाकर 'तू वह है' इस प्रकार निरंकुश सदात्मभावका उपदेश करता है।
ननु पराक्रमादिगुणः सिंहोऽसि त्वमितिवत्तत्त्वमसीति स्यात् ।पूर्व० — जिस प्रकार पराक्रमादि गुणवाला 'तू सिंह है' ऐसा कहा जाता है उसी प्रकार 'तू वह है' यह वाक्य भी तो हो सकता है ?
न; मृदादिवत्सदेकमेवाद्वितीयं सत्यमित्युपदेशात् । न चोपचारविज्ञानात्तस्य तावदेव चिरमिति सत्सम्पत्तिरुपदिश्येत ।सिद्धान्ती— नहीं, क्योंकि 'मृत्तिकादिके समान एकमात्र अद्वितीय सत् ही सत्य है' ऐसा उपदेश किया गया है। औपचारिक विज्ञानके द्वारा उसे तभीतक विलम्ब है' इस प्रकार सत्की प्राप्तिका उपदेश नहीं किया जा

७०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

Page 710Permalink
७०६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
मृषात्वादुपचारविज्ञानस्य त्वमिन्द्रो यम इतिवत् ।सकता था, क्योंकि 'तू इन्द्र है' 'तू यम है' इत्यादि विज्ञानोंके समान औपचारिक विज्ञान तो मिथ्या ही हुआ करता है ।
[उपदेशस्य स्तुत्यर्थत्वनिरासः]<br>नापि स्तुतिरनुपास्यत्वाच्छ्वेतकेतोः । नापि सच्छ्वेतकेतुत्वोपदेशेन स्तूयेत । न हि राजा दासस्त्वमिति स्तुत्यः स्यात् । नापि सतः सर्वात्मन एकदेशविरोधो युक्तस्तत्त्वमसीति देशाधिपतेरिव ग्रामाध्यक्षस्त्वमिति । न चान्या गतिरिह सदात्मत्वोपदेशार्थान्तरभूता सम्भवति ।इसके सिवा यह स्तुति भी नहीं हो सकती, क्योंकि श्वेतकेतु उपास्य नहीं है । न श्वेतकेतुरूपसे उपदेश देकर सत्‌की ही स्तुति की जा सकती है, क्योंकि 'तू दास है' ऐसा कहकर राजाकी स्तुति नहीं की जाती । इसके सिवा देशाधिपतिकी 'तू ग्रामाध्यक्ष है' ऐसा कहनेके समान सर्वात्मक सत्‌को 'तू वह है' ऐसा कहकर [ श्वेतकेतुरूप ] एक देशमें निरुद्ध करना भी उचित नहीं है । इनसे अतिरिक्त सत्‌के आत्मत्वोपदेशसे अर्थान्तरभूत कोई और गति इस वाक्यमें सम्भव ही नहीं है ।
[बुद्धिमात्रकर्तव्यतानिरासः]<br>ननु सदस्मीति बुद्धिमात्रमिह कर्तव्यतया चोद्यते न त्वज्ञातं सदसीति ज्ञाप्यत इति चेत् ।**पूर्व०—**यदि ऐसा मानें कि यहाँ 'मैं सत् हूँ' ऐसी बुद्धिका ही कर्तव्यरूपसे उपदेश किया गया है 'तू सत् है' ऐसा कहकर अज्ञातका ज्ञान नहीं कराया गया—तो ?
नन्वस्मिनपक्षेऽप्यश्रुतं श्रुतं भवतीत्याद्यनुपपन्नम् ।**सिद्धान्ती—**किंतु इस पक्षको माननेपर भी 'अश्रुत श्रुत हो जाता है' इत्यादि कथन तो अनुपपन्न ही रहेगा।
Page 711Permalink

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०७


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
न; सदस्मीतिबुद्धिविधेः स्तुत्यर्थत्वात् ।पूर्व०-- नहीं; यह कथन 'मैं सत् हूँ' इस प्रकारकी बुद्धिरूप विधिकी स्तुतिके लिये हो सकता है ।
न; आचार्यवान्पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरमित्युपदेशात् । यदि हि सदस्मीति बुद्धिमात्रं कर्तव्यतया विधीयते न तु त्वंशब्दवाच्यस्य सद्रूपत्वमेव तदा नाचार्यवान्वेदिति ज्ञानोपायोपदेशो वाच्यः स्यात् । यथाग्निहोत्रं जुहुयादित्येवमादिष्वर्थप्राप्तमेवाचार्यवत्त्वमिति तद्वत् ।सिद्धान्ती-- ऐसी बात नहीं है; क्योंकि यहाँ 'आचार्यवान् पुरुषको ज्ञान होता है; उसे तभीतक विलम्ब है' इत्यादि उपदेश किया गया है । यदि यहाँ 'मैं सत् हूँ' इस प्रकारकी बुद्धिमात्रका ही कर्तव्यरूपसे विधान किया गया होता 'त्वम्' शब्दवाच्य जीवकी सद्रूपताका उपदेश न होता तो 'आचार्यवान् पुरुषको ज्ञान होता है' इस प्रकार ज्ञानके उपायका उपदेश न किया जाता । जिस प्रकार 'अग्निहोत्र करे' इत्यादि विधियोंमें आचार्यकत्व अर्थतः प्राप्त है, उसी प्रकार यहाँ भी समझ लिया जाता ।
तस्य तावदेव चिरमिति च क्षेपकरणं न युक्तं स्यात् । सदात्मतत्त्वेऽविज्ञातेऽपि सकृद्बुद्धिमात्रकरणे मोक्षप्रसङ्गात् ।और न 'उसे तभीतक विलम्ब है' ऐसा कहकर कालक्षेप करना ही उचित हो सकता है; क्योंकि सदात्मतत्त्वका ज्ञान न होनेपर भी एक बार सद्बुद्धि करनेसे ही उसके मोक्षका प्रसंग उपस्थित हो जाता ।
न च तत्त्वमसीत्युक्ते नाहं सदितिप्रमाणवाक्यजनिता बुद्धि-इसके सिवा जिस प्रकार अग्निहोत्रादि-विधिजनित अग्नि-

छा० उ० २३—

७०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

Page 712Permalink
७०८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| निर्वर्तयितुं शक्या नोत्पन्नेति वा शक्यं वक्तुम्, सर्वोपनिषद्वाक्यानां तत्परतयैवोपक्षयात्। यथाग्निहोत्रादिविधिजनिताग्निहोत्रादिकर्तव्यताबुद्धीनामतथार्थत्वमनुत्पन्नत्वं वा न शक्यते वक्तुं तद्वत्। | होत्रादिकर्त्तव्यता बुद्धिका अतथार्थत्व (अग्निहोत्रपरक न होना) अथवा अनुत्पन्नत्व (उत्पन्न ही न होना) नहीं कहा जा सकता, उसी प्रकार 'तू वह है' इस प्रकार कहे जानेपर 'मैं सत् हूँ' ऐसी प्रमाणवाक्यजनित बुद्धि निवृत्त नहीं की जा सकती और न यही कहा जा सकता है कि वह उत्पन्न ही नहीं हुई, क्योंकि सम्पूर्ण उपनिषद्वाक्योंका पर्यवसान इसी अर्थमें हुआ है। | | देहादिष्वात्मबुद्धित्वात् न सदात्मविज्ञानम्<br>यत्तूक्तं सदात्मा सन्नात्मानं कथं न जानीयादिति, नासौ दोषः; कार्यकरणसङ्घातव्यतिरिक्तोऽहं जीवः कर्ता भोक्तेत्यपि स्वभावतः प्राणिनां विज्ञानादर्शनात्किमु तस्य सदात्मविज्ञानम्। कथमेवं सदात्मविज्ञानम् ? कथमेवं व्यतिरिक्तविज्ञानेऽसति तेषां कर्तृत्वादिविज्ञानं सम्भवति ? दृश्यते | और ऐसा जो कहा कि 'सत्स्वरूप होनेपर भी वह अपनेको [सद्रूप] क्यों न जानता' सो यह दोष भी नहीं आ सकता; क्योंकि स्वभावतः तो प्राणियोंकी ऐसी बुद्धि भी नहीं देखी जाती कि मैं देह और इन्द्रियोंके संघातसे भिन्न कर्ता-भोक्ता जीव हूँ, फिर उन्हें सदात्म-बुद्धि न हो तो आश्चर्य ही क्या है ! ऐसी अवस्थामें उन्हें सदात्म-बुद्धि होगी भी कैसे ? इस प्रकार जबतक उन्हें देहेन्द्रियादिसे व्यतिरिक्त बुद्धि न हो तबतक कर्तृत्वादिवुद्धिका होना भी कैसे |

Page 713Permalink

खण्ड १६] शाङ्करभाष्यार्थ ७०९


| च। तद्वत्तस्यापि देहादिष्वात्मबुद्धित्वान्न स्यात्सदात्मविज्ञानम्। तस्माद्विकारानृताधिकृतजीवात्मविज्ञाननिवर्तकमेवेदं वाक्यं तत्त्वमसीति सिद्धमिति ॥ ३ ॥ | सम्भव हो सकता है और यही बात देखी भी जाती है। इसी प्रकार उसे देहादिमें आत्मबुद्धि होनेके कारण सदात्मबुद्धि नहीं होती। अतः यह सिद्ध हुआ कि ‘तत्त्वमसि’ यह वाक्य विकाररूप मिथ्या देहादिमें अधिकृत जीवात्मभावकी निवृत्ति करनेवाला ही है ॥ ३ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये
षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१६॥

— : ० : —

इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीशंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्वि-
वरणे षष्ठोऽध्यायः सम्पूर्णः ॥ ६ ॥

सप्तम अध्याय

Page 714Permalink

सप्तम अध्याय

प्रथम खण्ड

नारदके प्रति सनत्कुमारका उपदेश

[वक्ष्यमाणग्रन्थारम्भप्रयोजनम्]
परमार्थतत्त्वोपदेशप्रधानपरः षष्ठोऽध्यायः सदात्मैकत्वनिर्णयपरतयैवोपयुक्तः, न सतोऽर्वाग्विकारलक्षणानि तत्त्वानि निर्दिष्टानीत्यतस्तानि नामादीनि क्रमेण निर्दिश्य तद्वारेणापि भूमाख्यं निरतिशयं तत्त्वं निर्देश्यामीति शाखाचन्द्रदर्शनवदितीमं सप्तमं प्रपाठकमारभते । अनिर्दिष्टेषु हि सतोऽर्वाक्तत्त्वेषु सन्मात्रे च निर्दिष्टेऽन्यदप्यविज्ञातं स्यादित्याशङ्का कस्यचित्स्यात्सा मा भूदिति वा तानि निर्दिदिक्षति ।प्रधानतया परमार्थतत्त्वका उपदेश करनेवाला छठा अध्याय सत् (ब्रह्म) और आत्माका एकत्व-निर्णय करनेके कारण ही उपयोगी है। उसमें सत्से निम्नतर विकाररूप तत्त्वोंका निर्देश नहीं किया गया। अतः उन नामादि तत्त्वोंका क्रमशः निरूपण कर उनके द्वारा भी शाखाचन्द्र दर्शनके समान भूमासंज्ञक निरतिशय तत्त्वका निर्देश करूँगी—इस अभिप्रायसे श्रुति यह सातवाँ प्रपाठक आरम्भ करती है। अथवा सत्से निम्नतर तत्त्वोंका निर्देश न होनेपर और केवल सन्मात्रका ही निरूपण किया जानेपर किसीको ऐसी आशङ्का हो सकती है कि अभी कुछ और भी अविज्ञात है, वह आशङ्का न हो—इस आशयसे श्रुति उनका निर्देश करना चाहती है।
Page 715Permalink

खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ७११


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अथवा सोपानारोहणवत्स्थूलादारभ्य सूक्ष्मं सूक्ष्मतरं च बुद्धिविषयं ज्ञापयित्वा तदतिरिक्ते स्वाराज्येऽभिषेक्ष्यामीति नामादीनि निर्दिदिक्षति ।<br><br>अथवा नामाद्युत्तरोत्तरविशिष्टानि तत्त्वान्यतितरां च तेषाम्युत्कृष्टतमं भूमाख्यं तत्त्वमिति तत्स्तुत्यर्थं नामादीनां क्रमेणोपन्यासः ।अथवा सीढ़ियोंपर चढ़नेके समान स्थूलसे आरम्भ करके बुद्धिके सूक्ष्म और सूक्ष्मतर विषयका ज्ञान कराकर अधिकारीको उससे अतिरिक्त स्वाराज्यपर अभिषिक्त करूँगी- इस अभिप्रायसे वह नामादिका निर्देश करना चाहती है ।<br><br>अथवा नामादि उत्तरोत्तर विशिष्ट तत्त्व हैं; उन सबकी अपेक्षा भूमासंज्ञक तत्त्व अत्यन्त उत्कृष्ट है—इस प्रकार उसकी स्तुतिके लिये नामादिका क्रमशः उल्लेख किया गया है ।
आख्यायिका तु परविद्यास्तुत्यर्था । कथम् ? नारदो देवर्षिः कृतकर्तव्यसर्वविद्योऽपि सन्नात्मज्ञत्वाच्छुशोचैव किमु वक्तव्यमन्योऽल्पविज्जन्तुरकृतपुण्यातिशयोऽकृतार्थ इति । (आख्यायिका-प्रयोजनम्)<br><br>अथवा नान्यदात्मज्ञानान्निरतिशयश्रेयःसाधनमस्तीत्येतत्प्रदर्शनार्थं सनत्कुमारनारदाख्या-यहाँ जो आख्यायिका है वह तो परा विद्याकी स्तुतिके लिये है । किस प्रकार ? जो अपने सारे कर्तव्य पूर्ण कर चुके थे और सर्वविद्यासम्पन्न थे उन देवर्षि नारदको भी अनात्मज्ञ होनेके कारण शोक हुआ ही, फिर जिसने अत्यन्त पुण्यसम्पादन नहीं किया और जो अकृतार्थ है ऐसे किसी अन्य अल्पज्ञ जीवकी तो बात ही क्या है ?<br><br>अथवा आत्मज्ञानसे बढ़कर और कोई कल्याणका साधन नहीं है—यह • प्रदर्शित करनेके लिये सनत्कुमार - नारद - आख्यायिकाका

७१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

Page 716Permalink
७१२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| यिकारभ्यते, येन सर्वविज्ञान-<br>साधनशक्तिसम्पन्नस्यापि नार-<br>दस्य देवर्षेः श्रेयो न बभूव<br>येनोत्तमाभिजनविद्यावृत्तसाधन-<br>शक्तिसम्पत्तिनिमित्ताभिमानं हि-<br>त्वा प्राकृतपुरुषवत्सनत्कुमार-<br>मुपससाद श्रेयःसाधनप्राप्तये-<br>ऽतः प्रख्यापितं भवति निर-<br>तिशयप्राप्तिसाधनत्वमात्मवि-<br>द्याया इति । | आरम्भ किया जाता है, जिससे कि<br>सम्पूर्ण विज्ञानरूप साधनोंकी<br>शक्तिसे सम्पन्न होनेपर भी देवर्षि<br>नारदका कल्याण नहीं हुआ, इसीसे<br>वे उत्तम कुल, विद्या, आचार और<br>नाना प्रकारके साधनोंकी सामर्थ्य-<br>रूप सम्पत्तिसे होनेवाले अभिमान-<br>को त्यागकर श्रेयःसाधनकी प्राप्तिके<br>लिये एक साधारण पुरुषके समान<br>सनत्कुमारजीके समीप गये। इससे<br>श्रेयःप्राप्तिमें आत्मविद्याका निरतिशय<br>साधनत्व सूचित होता है। |

ॐ अधीहि भगव इति होपससाद सनत्कुमारं नारदस्तँहोवाच यद्वेत्थ तेन नोपसीद ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामीति स होवाच ॥ १ ॥

‘हे भगवन् ! मुझे उपदेश कीजिये’ ऐसा कहते हुए नारदजी सनत्कुमारजीके पास गये। उनसे सनत्कुमारजीने कहा—‘तुम जो कुछ जानते हो उसे बतलाते हुए मेरे पास उपदेश लेनेके लिये आओ; तब मैं तुम्हें उससे आगे बतलाऊँगा’ तब नारदने कहा—॥ १ ॥

| अधीह्यधीष्व भगवो भगवन्नि-<br>ति ह किलोपससाद । अधीहि<br>भगव इति मन्त्रः । सनत्कुमारं<br>योगीश्वरं ब्रह्मिष्ठं नारद उपस-<br>न्नवान् । तं न्यायत उपसन्नं | ‘हे भगवन् ! मुझे अध्ययन<br>कराइये’ ऐसा कहते हुए नारदजी<br>ब्रह्मनिष्ठ योगीश्वर सनत्कुमारके प्रति<br>उपसन्न हुए अर्थात् [ शिष्यरूपसे ]<br>उनके समीप गये । ‘अधीहि भगवः’<br>यह उपसत्तिका मन्त्र है । अपने<br>प्रति नियमानुसार उपसन्न हुए उन |

Page 717Permalink

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१३


| होवाच यदात्मविषये किञ्चिद्वेत्थ<br><br>तेन तत्प्रख्यापनेन मामुपसीदे-<br><br>दमहं जान इति, ततोऽहं भवतो<br><br>विज्ञानात्ते तुभ्यमूर्ध्वं वक्ष्यामि, इ-<br><br>त्युक्तवति स होवाच नारदः ॥१॥ | नारदजीसे सनत्कुमारजीने कहा—<br>'तुम आत्माके विषयमें जो कुछ<br>जानते हो उसे बतलाते हुए अर्थात्<br>ऐसा प्रकट करते हुए मेरे पास<br>उपदेश लेनेके लिये आओ; मैं यह<br>जानता हूँ' तब मैं तुम्हें तुम्हारे<br>ज्ञानसे आगे उपदेश करूँगा।'<br>सनत्कुमारजीके ऐसा कहनेपर<br>नारदजी बोले ॥ १ ॥ |


ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेद १४ सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्य १४ राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्या १२ सर्पदेवजनविद्यामेतद्भगवोऽध्येमि ॥ २ ॥

'भगवन् ! मुझे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और चौथा अथर्ववेद याद है, [ इनके सिवा ] इतिहास-पुराणरूप पाँचवाँ वेद, वेदोंका वेद ( व्याकरण ), श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीति, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्पविद्या ( गरुड मन्त्र ) और देवजनविद्या—नृत्य-संगीत आदि—हे भगवन् ! यह सब मैं जानता हूँ' ॥ २ ॥

| ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि स्मरामि<br><br>यद्वेत्थेति विज्ञानस्य पृष्टत्वात् ।<br><br>तथा यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं<br><br>चतुर्थं वेदं वेदशब्दस्य प्रकृतत्वा- | हे भगवन् ! मैं ऋग्वेदका अध्ययन<br>कर चुका हूँ अर्थात् मुझे ऋग्वेद<br>स्मरण है [ यहाँ अध्ययनवाचक<br>पदका स्मरण अर्थ क्यों किया गया ?<br>उत्तर— ] क्योंकि 'यद्वेत्थ' ऐसा<br>कहकर विज्ञानके विषयमें प्रश्न<br>किया गया है । तथा यजुर्वेद |

७१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

Page 718Permalink
७१४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| दितिहासपुराणं पञ्चमं वेदं वेदानां भारतपञ्चमानां वेदं व्याकरणमित्यर्थः । व्याकरणेन हि पदादिविभागश ऋग्वेदादयो ज्ञायन्ते; पित्र्यं श्राद्धकल्पम्; राशिं गणितम्; दैवमुत्पातज्ञानम्; निधिं महाकालादिनिधिशास्त्रम्; वाकोवाक्यं तर्कशास्त्रम्; एकायनं नीतिशास्त्रम्; देवविद्यां निरुक्तम्; ब्रह्मण ऋग्यजुःसामारूख्यस्य विद्यां ब्रह्मविद्यां शिक्षाकल्पच्छन्दश्चितयः; भूतविद्यां भूततन्त्रम्; क्षत्रविद्यां धनुर्वेदम्; नक्षत्रविद्यां ज्योतिषम्; सर्पदेवजनविद्यां सर्पविद्यां गारुडं देवजनविद्यां गन्धयुक्तिनृत्यगीतवाद्यशिल्पादिविज्ञानानि । एतत्सर्वं हे भगवोऽध्येमि ॥२॥ | सामवेद और चौथा आथर्वण वेद जानता हूँ, 'वेद' शब्द प्रसंगतः प्राप्त होनेके कारण इतिहासपुराणरूप पाँचवाँ वेद, महाभारतसहित पाँचों वेदोंका वेद अर्थात् व्याकरण—क्योंकि व्याकरणके द्वारा ही पदादिके विभागपूर्वक ऋग्वेदादिका ज्ञान होता है, पित्र्य—श्राद्धकल्प, राशि—गणित, दैव—उत्पातज्ञान, निधि—महाकालादिनिधिशास्त्र, वाकोवाक्य—तर्कशास्त्र, एकायन—नीतिशास्त्र, देवविद्या—निरुक्त, ब्रह्मविद्या—ब्रह्म अर्थात् ऋग्यजुःसामसंज्ञक वेदोंकी विद्या यानी शिक्षा, कल्प, छन्द और चिति, भूतविद्या—भूतशास्त्र, क्षत्रविद्या—धनुर्वेद, नक्षत्रविद्या—ज्योतिष, सर्पदेवजनविद्या अर्थात् सर्पविद्या—गारुड और देवजनविद्या—गन्धयुक्ति तथा नृत्य, गान, वाद्य और शिल्पादि विज्ञान—ये सब हे भगवन् ! मैं जानता हूँ ॥२॥ |

— : ० : —

सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छ्रुतꣳ ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहं

Page 719Permalink

खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ७१५ XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX

भगवःशोचामि तं मा भगवान्छोकस्य पारं तारयत्विति तꣳहोवाच यद्वै किञ्चैतदध्यगीष्ठा नामैवैतत् ॥ ३ ॥

हे भगवन् ! वह मैं केवल मन्त्रवेत्ता ही हूँ, आत्मवेत्ता नहीं हूँ । मैंने आप-जैसोंसे सुना है कि आत्मवेत्ता शोकको पार कर लेता है, और हे भगवन् ! मैं शोक करता हूँ; ऐसे मुझको हे भगवन् ! शोकसे पार कर दीजिये । तब सनत्कुमारने उनसे कहा—'तुम यह जो कुछ जानते हो वह नाम ही है' ॥ ३ ॥

| सोऽहं भगव एतत्सर्वं जानन्नपि मन्त्रविदेवास्मि शब्दार्थमात्रविज्ञानवानेवास्मीत्यर्थः । सर्वो हि शब्दोऽभिधानमात्रमभिधानं च सर्वं मन्त्रेष्वन्तर्भवति । मन्त्रविदेवास्मि मन्त्रवित्कर्मविदित्यर्थः । 'मन्त्रेषु कर्माणि' इति हि वक्ष्यति; नात्मानं वेद्मि । | हे भगवन् ! वह मैं यह सब जानते हुए भी केवल मन्त्रवेत्ता ही हूँ अर्थात् केवल शब्दार्थमात्र जाननेवाला हूँ; क्योंकि सारे शब्द अभिधानमात्र हैं और सम्पूर्ण अभिधान मन्त्रोंके अन्तर्गत हैं । मैं मन्त्रवित् ही हूँ, मन्त्रवित् अर्थात् कर्मवित्, क्योंकि 'मन्त्रोंमें कर्म [ एकरूप होते हैं ]' ऐसा आगे ( खं० ४ मं० १ में ) कहेंगे । मैं आत्माको नहीं जानता । | | नन्वात्मापि मन्त्रैः प्रकाश्यत एवेति कथं मन्त्रविच्चेन्नात्मवित् । | शङ्का—किंतु आत्मा भी तो मन्त्रोंद्वारा प्रकाशित होता ही है; फिर नारदजी मन्त्रवित् होनेपर भी आत्मवेत्ता क्यों नहीं हैं ? | | न; अभिधानाभिधेयभेदस्य विकारत्वात् । न च विकार आ- | समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि नाम-नामीरूप जो भेद है, वह तो विकार है और विकार |