छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 707, कुल 978 में से
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खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०३
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| श्रवणाच्च विजज्ञौ । अथेेदानीं पित्रा प्रतिबोधितस्तत्त्वमसीतिदृष्टान्तैर्हेतुभिश्च तत्पितुरस्य ह किलोक्तं सदेवाहमस्मीति विजज्ञौ विज्ञातवान् । द्विर्वचनमध्यायपरिसमाप्त्यर्थम् । | अपनेको देह और इन्द्रियोंसे भिन्न सद्रूप सर्वात्मा नहीं जानता था । अब 'तू वह है' इस प्रकार दृष्टान्त और हेतुपूर्वक पिताद्वारा समझाये जानेपर वह पिताके इस कथनको कि 'मैं सत ही हूँ' समझ गया है । 'विजज्ञौ इति' इस पदकी द्विरुक्ति अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है । |
| किं पुनरत्र षष्ठे वाक्यप्रमाणे- | पूर्वं०—किंतु इस छठे अध्यायमें वाक्यप्रमाणसे आत्मामें क्या फल हुआ ? |
| न जनितं फलमात्मनि ? | |
| [षष्ठाध्यायवाक्यप्रमाणजन्यफलदर्शनम्]<br><br>कर्तृत्वभोक्तृत्वयोरधिकृतत्वविज्ञाननिवृत्तिस्तस्यफलं यमवोचाम त्वंशब्दवाच्यमर्थं श्रोतुं मन्तुं चाधिकृतत्वमविज्ञातविज्ञानफलार्थम् । प्राक्चैतस्माद्विज्ञानादहमेवं करिष्याम्यग्निहोत्रादीनि कर्माण्यहमत्राधिकृतः, एषां च कर्मणां फलमिहामुत्र च भोक्ष्ये कृतेषु वा कर्मसु कृतकर्तव्यः स्यामित्येवं कर्तृत्वभोक्तृत्वयोरधिकृ- | सिद्धान्ती—हमने अविज्ञातके विज्ञानरूप फलके लिये श्रवण और मनन करनेमें अधिकृत जिस 'त्वम्' शब्दवाच्य अर्थका वर्णन किया है उसके अपनेमें (आरोपित) कर्तृत्व भोक्तृत्वके अधिकृतत्व-विज्ञानकी निवृत्ति ही इसका फल है । इस विज्ञानसे पूर्व 'मैं इस प्रकार अग्निहोत्रादि कर्म करूँगा, मैं इसका अधिकारी हूँ, तथा इन कर्मोंका फल मैं इस लोक और परलोकमें भोगूँगा और इन कर्मोंके करनेपर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा' इस प्रकार मैं कर्तृत्व और भोक्तृत्वका अधिकारी हूँ—ऐसा जो उसे आत्मामें विज्ञान |