भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 709

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०५


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
तत्परिहारः<br>न; आदित्यादिवाक्यवैलक्षण्यात् । आदित्यो ब्रह्मेत्यादावितिशब्दव्यवधानान्न साक्षाद्ब्रह्मत्वं गम्यते । रूपादिमत्त्वाच्चादित्यादीनामाकाशमनसोश्चेतिशब्दव्यवधानादेवाब्रह्मत्वम् । इह तु सत एवेह प्रवेशं दर्शयित्वा तत्त्वमसीति निरङ्कुशं सदात्मभावमुपदिशति ।सिद्धान्ती— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि 'आदित्यो ब्रह्मेत्युपासीत' इत्यादि वाक्योंसे इस वाक्यमें विलक्षणता है। 'आदित्यो ब्रह्मेत्युपासीत' आदि वाक्योंमें 'इति' शब्दका व्यवधान रहनेके कारण उनका साक्षात् ब्रह्मत्व ज्ञात नहीं होता। इसके सिवा आदित्यादि रूपवान् होनेके कारण तथा आकाश और मनके 'इति' शब्दसे व्यवधान होनेके कारण वे ब्रह्म नहीं हो सकते। किंतु इस प्रसङ्गमें तो [ आरुणि ] सत्‌का ही इस (तेजोऽवन्नमय-संघात) में प्रवेश दिखलाकर 'तू वह है' इस प्रकार निरंकुश सदात्मभावका उपदेश करता है।
ननु पराक्रमादिगुणः सिंहोऽसि त्वमितिवत्तत्त्वमसीति स्यात् ।पूर्व० — जिस प्रकार पराक्रमादि गुणवाला 'तू सिंह है' ऐसा कहा जाता है उसी प्रकार 'तू वह है' यह वाक्य भी तो हो सकता है ?
न; मृदादिवत्सदेकमेवाद्वितीयं सत्यमित्युपदेशात् । न चोपचारविज्ञानात्तस्य तावदेव चिरमिति सत्सम्पत्तिरुपदिश्येत ।सिद्धान्ती— नहीं, क्योंकि 'मृत्तिकादिके समान एकमात्र अद्वितीय सत् ही सत्य है' ऐसा उपदेश किया गया है। औपचारिक विज्ञानके द्वारा उसे तभीतक विलम्ब है' इस प्रकार सत्की प्राप्तिका उपदेश नहीं किया जा