भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 710
७०६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
मृषात्वादुपचारविज्ञानस्य त्वमिन्द्रो यम इतिवत् ।सकता था, क्योंकि 'तू इन्द्र है' 'तू यम है' इत्यादि विज्ञानोंके समान औपचारिक विज्ञान तो मिथ्या ही हुआ करता है ।
[उपदेशस्य स्तुत्यर्थत्वनिरासः]<br>नापि स्तुतिरनुपास्यत्वाच्छ्वेतकेतोः । नापि सच्छ्वेतकेतुत्वोपदेशेन स्तूयेत । न हि राजा दासस्त्वमिति स्तुत्यः स्यात् । नापि सतः सर्वात्मन एकदेशविरोधो युक्तस्तत्त्वमसीति देशाधिपतेरिव ग्रामाध्यक्षस्त्वमिति । न चान्या गतिरिह सदात्मत्वोपदेशार्थान्तरभूता सम्भवति ।इसके सिवा यह स्तुति भी नहीं हो सकती, क्योंकि श्वेतकेतु उपास्य नहीं है । न श्वेतकेतुरूपसे उपदेश देकर सत्‌की ही स्तुति की जा सकती है, क्योंकि 'तू दास है' ऐसा कहकर राजाकी स्तुति नहीं की जाती । इसके सिवा देशाधिपतिकी 'तू ग्रामाध्यक्ष है' ऐसा कहनेके समान सर्वात्मक सत्‌को 'तू वह है' ऐसा कहकर [ श्वेतकेतुरूप ] एक देशमें निरुद्ध करना भी उचित नहीं है । इनसे अतिरिक्त सत्‌के आत्मत्वोपदेशसे अर्थान्तरभूत कोई और गति इस वाक्यमें सम्भव ही नहीं है ।
[बुद्धिमात्रकर्तव्यतानिरासः]<br>ननु सदस्मीति बुद्धिमात्रमिह कर्तव्यतया चोद्यते न त्वज्ञातं सदसीति ज्ञाप्यत इति चेत् ।**पूर्व०—**यदि ऐसा मानें कि यहाँ 'मैं सत् हूँ' ऐसी बुद्धिका ही कर्तव्यरूपसे उपदेश किया गया है 'तू सत् है' ऐसा कहकर अज्ञातका ज्ञान नहीं कराया गया—तो ?
नन्वस्मिनपक्षेऽप्यश्रुतं श्रुतं भवतीत्याद्यनुपपन्नम् ।**सिद्धान्ती—**किंतु इस पक्षको माननेपर भी 'अश्रुत श्रुत हो जाता है' इत्यादि कथन तो अनुपपन्न ही रहेगा।