छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 716, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| यिकारभ्यते, येन सर्वविज्ञान-<br>साधनशक्तिसम्पन्नस्यापि नार-<br>दस्य देवर्षेः श्रेयो न बभूव<br>येनोत्तमाभिजनविद्यावृत्तसाधन-<br>शक्तिसम्पत्तिनिमित्ताभिमानं हि-<br>त्वा प्राकृतपुरुषवत्सनत्कुमार-<br>मुपससाद श्रेयःसाधनप्राप्तये-<br>ऽतः प्रख्यापितं भवति निर-<br>तिशयप्राप्तिसाधनत्वमात्मवि-<br>द्याया इति । | आरम्भ किया जाता है, जिससे कि<br>सम्पूर्ण विज्ञानरूप साधनोंकी<br>शक्तिसे सम्पन्न होनेपर भी देवर्षि<br>नारदका कल्याण नहीं हुआ, इसीसे<br>वे उत्तम कुल, विद्या, आचार और<br>नाना प्रकारके साधनोंकी सामर्थ्य-<br>रूप सम्पत्तिसे होनेवाले अभिमान-<br>को त्यागकर श्रेयःसाधनकी प्राप्तिके<br>लिये एक साधारण पुरुषके समान<br>सनत्कुमारजीके समीप गये। इससे<br>श्रेयःप्राप्तिमें आत्मविद्याका निरतिशय<br>साधनत्व सूचित होता है। |
ॐ अधीहि भगव इति होपससाद सनत्कुमारं नारदस्तँहोवाच यद्वेत्थ तेन नोपसीद ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामीति स होवाच ॥ १ ॥
‘हे भगवन् ! मुझे उपदेश कीजिये’ ऐसा कहते हुए नारदजी सनत्कुमारजीके पास गये। उनसे सनत्कुमारजीने कहा—‘तुम जो कुछ जानते हो उसे बतलाते हुए मेरे पास उपदेश लेनेके लिये आओ; तब मैं तुम्हें उससे आगे बतलाऊँगा’ तब नारदने कहा—॥ १ ॥
| अधीह्यधीष्व भगवो भगवन्नि-<br>ति ह किलोपससाद । अधीहि<br>भगव इति मन्त्रः । सनत्कुमारं<br>योगीश्वरं ब्रह्मिष्ठं नारद उपस-<br>न्नवान् । तं न्यायत उपसन्नं | ‘हे भगवन् ! मुझे अध्ययन<br>कराइये’ ऐसा कहते हुए नारदजी<br>ब्रह्मनिष्ठ योगीश्वर सनत्कुमारके प्रति<br>उपसन्न हुए अर्थात् [ शिष्यरूपसे ]<br>उनके समीप गये । ‘अधीहि भगवः’<br>यह उपसत्तिका मन्त्र है । अपने<br>प्रति नियमानुसार उपसन्न हुए उन |