छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 703, कुल 978 में से
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खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६९९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अन्यथा दत्तेऽपि धने बन्धनप्रसङ्गात्; इत्युक्ताः पुनराहुः-स्तेयमकार्षीच्चौर्येण धनमपहार्षीदिति। <br><br> तेष्वेवं वदत्स्वितरोऽपह्नुते नाहं तत्कर्तेति । | धन देनेपर भी उसे लेनेवालेको बन्धनका प्रसंग उपस्थित होता है।' इस प्रकार कहे जानेपर वे फिर कहते हैं—'इसने चोरी की है अर्थात् चोरीसे धन लिया है।' <br><br> उनके इस प्रकार कहनेपर वह पुरुष 'मैं चोरी करनेवाला नहीं हूँ' ऐसा कहकर अपने कर्मको छिपाता है। |
| ते चाहुः संदिह्यमानं स्तेयमकार्षीस्त्वमस्य धनस्येति । <br><br> तस्मिंश्चापह्नुवान् आहुः परशुमस्मै तपतेति शोधयत्वात्मानमिति । स यदि तस्य स्तैन्यस्य कर्ता भवति बहिश्चापह्नुते स एवं भूतस्तत एवानृतमन्यथाभूतं सन्तमन्यथात्मानं कुरुते । | तब वे संदेह किये जानेवाले पुरुषसे कहते हैं—'तूने इसके धनकी चोरी अवश्य की है।' <br><br> फिर भी उसके छिपानेपर वे कहते हैं—'इसके लिये परशु तपाओ—इस प्रकार यह अपनेको निर्दोष सिद्ध करे।' यदि वह उस चोरीका करनेवाला होता है और ऊपरसे छिपाता है तो ऐसा होनेपर वह अपनेको अनृत अर्थात् अन्यथा (चोर) होनेपर अपनेको अन्यथा (साहु) प्रदर्शित करता है। |
| स तथानृताभिसन्धोऽनृतेनात्मानमन्तर्धाय व्यवहितं कृत्वा परशुं तप्तं मोहात्प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ हन्यते राजपुरुषैः स्वकृतेनानृताभिसन्धिदोषेण ॥१॥ | इस प्रकार मिथ्याभिनिवेशवाला होकर वह अपनेको मिथ्यासे अन्तर्हित करता—छिपाता हुआ मोहवश तपे हुए परशुको ग्रहण करता और जल जाता है। तब अपने किये हुए मिथ्याभिनिवेशरूप दोषसे वह राजपुरुषोंद्वारा मारा जाता है ॥ १ ॥ |