भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 704, कुल 978 में से

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पृष्ठ 704
७००छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

अथ यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते स सत्याभिसन्धः सत्येनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽथ मुच्यते ॥२॥

और यदि वह उस (चोरी) का करनेवाला नहीं होता तो उसीसे वह अपनेको सत्य प्रमाणित करता है। वह सत्याभिसन्ध अपनेको सत्यसे आवृत कर उस तपे हुए परशुको पकड़ लेता है। वह उससे नहीं जलता और तत्काल छोड़ दिया जाता है ॥ २ ॥

अथ यदि तस्य कर्मणोऽकर्ता भवति, तत एव सत्यमात्मानं कुरुते। स सत्येन तया स्तैन्याकर्तृतयात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति। स सत्याभिसन्धः सन्न दह्यते सत्यव्यवधानात्, अथ मुच्यते च मृषाभियोक्तृभ्यः। तप्तपरशुहस्ततलसंयोगस्य तुल्यत्वेऽपि स्तेयकर्तृकर्त्रोरनृताभिसन्धो दह्यते न तु सत्याभिसन्धः ॥ २ ॥और यदि वह उस कर्मका करनेवाला नहीं होता तो उस (चोरीके अकर्तृत्व) के ही द्वारा वह अपनेको सत्य प्रमाणित करता है। वह उस चोरीकी अकर्तृतारूप सत्यसे अपनेको अन्तर्हित कर उस तपे हुए परशुको ग्रहण करता है और सत्याभिसन्ध होनेके कारण सत्यका व्यवधान हो जानेसे वह उससे नहीं जलता। तब मिथ्या अभियोग लगानेवाले उसे तत्काल छोड़ देते हैं। इस प्रकार तप्त परशु और हथेलीके संयोगमें समानता होनेपर भी चोरी करने और न करनेवालोंमें मिथ्याभिसन्ध करनेवाला जल जाता है और सत्याभिसन्ध नहीं जलता ॥ २ ॥