छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
९१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ९१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| न प्रियाप्रिये स्पृशत इति । आगमापायिनोर्हि स्पर्शशब्दो दृष्टो यथा शीतस्पर्श उष्णस्पर्श इति । न त्वग्नेरुष्णप्रकाशयोः स्वभावभूतयोरग्निना स्पर्श इति भवति । तथाग्नेः सवितुर्वोष्णप्रकाशवत्स्वरूपभूतस्यानन्दस्य प्रियस्यापि नेह प्रतिषेधः "विज्ञानमानन्दं ब्रह्म" (बृ० उ० ३।९।२८) "आनन्दो ब्रह्म" (तै० उ० ३।६।१) इत्यादिश्रुतिभ्यः । इहापि भूमैव सुखमित्युक्तत्वात् ।<br><br>ननु भूम्नः प्रियस्यैकत्वेऽसंवेद्यत्वात्<sup>इन्द्राभिमतात्म-</sup> स्वरूपेणैव<sup>स्वरूपदर्शनम् वा</sup> नित्यसंवेद्यत्वान्निर्विशेषतेति नेन्द्रस्य तदिष्टम् 'नाह खल्वयं सम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति । नाहमत्र भोग्यं पश्यामि' | नहीं करते । 'स्पर्श' शब्दका प्रयोग आगमापायी विषयोंके लिये ही देखा गया है; जैसे—शीतस्पर्श-उष्णस्पर्श इत्यादि । अग्निके स्वभावभूत उष्ण और प्रकाशका अग्निसे स्पर्श होता है—ऐसा प्रयोग नहीं होता । इसी प्रकार अग्नि या सूर्यके उष्ण एवं प्रकाशके समान आत्माके स्वरूपभूत आनन्द-प्रियका भी यहाँ प्रतिषेध नहीं है, क्योंकि 'ब्रह्म विज्ञान एवं आनन्दस्वरूप है', 'आनन्द ही ब्रह्म है' इत्यादि श्रुतियोंसे यही सिद्ध होता है और यहाँ भी 'भूमा ही सुख है' ऐसा ही कहा गया है ।<br><br>शङ्का—किंतु भूमा और प्रियकी एकता होनेके कारण वह प्रिय भूमाका वेद्य नहीं हो सकता अथवा उसका स्वरूप होनेसे नित्यसंवेद्य होनेके कारण उसमें निर्विशेषता रहेगी; इसलिये वह (निर्विशेषता) इन्द्रको इष्ट नहीं है; क्योंकि उसने ऐसा कहा है कि 'इस अवस्थामें तो 'यह मैं हूँ' इस प्रकार अपनेको भी नहीं जानता और न इन अन्य भूतोंको ही जानता है । इस समय यह विनाशको ही प्राप्त हो जाता |
| खण्ड १२ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९११ |
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| इत्युक्तत्वात्। तद्धीन्द्रस्येष्टं यद्भूतानि चात्मानं च जानाति न चाप्रियं किञ्चिद्वेत्ति स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्येन ज्ञानेन। | है। मैं इसमें कोई फल नहीं देखता।' इन्द्रको तो वही ज्ञान इष्ट है जिस ज्ञानसे कि आत्मा सम्पूर्ण भूतोंको और अपनेको भी जानता है, किसी भी अप्रियका अनुभव नहीं करता तथा सम्पूर्ण लोकोंको और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है। |
| सत्यमेतदिष्टमिन्द्रस्येमानि <br><sub>तत्र प्रजापतेरविवक्षा</sub> भूतानि मत्तोऽन्यानि लोकाः कामाश्च सर्वं मत्तोऽन्येऽहमेषां स्वामीति; न त्वेतदिन्द्रस्य हितम्। हितं चेन्द्रस्य प्रजापतिना वक्तव्यम्। व्योमवदशरीरात्मतया सर्वभूतलोककामात्मत्वोपगमेन या प्राप्तिस्तद्धितमिन्द्राय वक्तव्यमिति प्रजापतिनाभिप्रेतम्। न तु राज्ञो राज्याप्तिवदन्यत्वेन। तत्रैवं सति कं केन विजानीयादात्मैकत्वे<sup>ते</sup> 'इमानि भूतान्ययमहमस्मि' इति। | समाधान-- ठीक है, यह इन्द्रको इष्ट तो अवश्य है कि ये भूत मेरेसे भिन्न हैं तथा ये सम्पूर्ण लोक और भोग भी मेरेसे भिन्न हैं और मैं इनका स्वामी हूँ; किंतु यह इन्द्रके लिये हितकर नहीं है। और प्रजापतिको तो इन्द्रका हित बतलाना चाहिये। आकाशके समान अशरीररूपसे जो सम्पूर्ण भूतलोक और कामके आत्मभावको प्राप्त होकर उन्हें प्राप्त करना है उस हितकर विषयका इन्द्रके प्रति उपदेश करना चाहिये—ऐसा प्रजापतिको अभिमत है। राजाकी राज्यप्राप्तिके समान अन्यभावसे लोकादिकी प्राप्ति प्रजापतिको अभिमत नहीं है। तब ऐसी अवस्थामें आत्माका एकत्व होनेपर कौन किसके द्वारा यह बात जान सकता है कि 'वे भूत हैं और यह मैं हूँ।' |
९१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ९१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| नन्वस्मिन्पक्षे 'स्त्रीभिर्वा यानैर्वा' 'स यदि पितृलोककामः' 'स एकधा भवति' इत्याद्यैश्वर्यश्रुतयोऽनुपपन्नाः । | शङ्का—किंतु ऐसा पक्ष होनेपर 'स्त्रियोंसे अथवा यानोंसे [ क्रीडा करता है ]' 'वह यदि पितृलोककी कामना करता है' 'वह एक रूप होता है' इत्यादि [ पूर्वोक्त ] ऐश्वर्यसूचक श्रुतियाँ अनुपपन्न हो जायँगी । | | न; सर्वात्मनः सर्वफलसम्बन्धोपपत्तेरविरोधात् । मृद इव सर्वघटकरककुण्डाद्याप्तिः । | समाधान—यह बात नहीं है, क्योंकि सर्वात्मा विद्वान्का किसीसे विरोध न होनेके कारण सम्पूर्ण फलोंसे सम्बन्ध हो सकता है; जिस प्रकार मृत्तिकाकी घट, कमण्डलु और कूँडा आदि सम्पूर्ण विकारोंमें प्राप्ति होती है । | | ननु सर्वात्मत्वे दुःखसम्बन्धोऽपि स्यादिति चेत् ? | शङ्का—किंतु सर्वात्मता होनेपर तो उसे दुःखका भी सम्बन्ध होगा ही ? | | न, दुःखस्याप्यात्मत्वोपगमादविरोधः । आत्मन्यविद्याकल्पनानिमित्तानि दुःखानि रज्ज्वामिव सर्पादिकल्पनानिमित्तानि । सा चाविद्याशरीरात्मैकत्वस्वरूपदर्शनेन दुःखनिमित्तोच्छिन्नेति दुःखसम्बन्धाशङ्का न सम्भवति । | समाधान—नहीं, क्योंकि दुःखके भी आत्मत्वको प्राप्त हो जानेके कारण उससे भी उसका कोई विरोध नहीं है । आत्मामें अविद्याके कारण होनेवाली कल्पनाके निमित्तसे होनेवाले दुःख रज्जुमें सर्पादि कल्पनाके कारण होनेवाले कम्पादिके समान हैं । दुःखकी निमित्तभूता वह अविद्या आत्माके अशरीरत्व और एकत्वदर्शनसे उच्छिन्न हो गयी है; इसलिये अब उसे दुःखके सम्बन्धकी आशङ्का होना सम्भव नहीं है । |
खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१३
| शुद्धसत्त्वसंकल्पनिमित्तानां तु कामानामीश्वरदेहसम्बन्धः सर्वभूतेषु मानसानाम् । पर एव सर्वसत्त्वोपाधिद्वारेण भोक्तेति सर्वाविद्याकृतसंव्यवहाराणां पर एवात्मास्पदं नान्योऽस्तीति वेदान्तसिद्धान्तः । | [ यहाँ शङ्का होती है कि जब विद्यासे अविद्या दग्ध हो जाती है तो उसके द्वारा ईश्वरमें आरोपित किया हुआ सगुणविद्याका फलभूत पूर्वोक्त ऐश्वर्य भी तो दग्ध ही हो जाता है, फिर विद्याकी स्तुतिके लिये उनका उपदेश कैसे सिद्ध हो सकता है ? उत्तर—] शुद्धसत्त्वजन्य संकल्पके कारण प्राप्त होनेवाले मनोवाञ्छित भोगरूप ऐश्वर्योंका सम्पूर्ण भूतोंमें [ केवल मनके द्वारा मायावस्थामें ] ईश्वरसे सम्बन्ध सिद्ध होता है । समस्त सत्त्वमय उपाधिके द्वारा परमात्मा ही उन ऐश्वर्योंका भोक्ता है, इसलिये सम्पूर्ण अविद्याजन्य व्यवहारोंका अधिष्ठान परमात्मा ही है, कोई दूसरा नहीं है—ऐसा वेदान्त-शास्त्रका सिद्धान्त है । | | अथैकदेशिमतम्<br>'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' इतिच्छायापुरुष एव प्रजापतिनोक्तः । स्वप्नसुषुप्तयोश्चान्य एव, न परोऽपहतपाप्मत्वादिलक्षणः, विरोधादिति केचिन्मन्यन्ते । छायाद्यात्मनां चोपदेशे प्रयोजनमाचक्षते—आदावेवोच्यमाने | यहाँ कोई-कोई ऐसा मानते हैं कि 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' इत्यादि वाक्यसे प्रजापतिने छायापुरुषका ही वर्णन किया है, तथा स्वप्न और सुषुप्तावस्थामें भी अन्य पुरुषका ही उल्लेख किया है, अपहतपाप्मत्वादिरूप परमात्माका निरूपण नहीं किया, क्योंकि इन दोनोंके लक्षणोंमें परस्पर विरोध है । छायात्मादिका उपदेश करनेमें वे यह प्रयोजन बतलाते हैं कि परमात्मा अत्यन्त दुर्विज्ञेय है, |
९१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ९१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| किल दुर्विज्ञेयत्वात्परस्यात्मनोऽत्यन्तबाह्यविषयासक्तचेतसोऽत्यन्तसूक्ष्मवस्तुश्रवणे व्यामोहो मा भूदिति । | अतः जिनका चित्त बाह्य विषयोंमें अत्यन्त आसक्त है ऐसे उन लोगोंको आरम्भमें ही उसका उपदेश कर देनेपर उस अत्यन्त सूक्ष्म वस्तुका श्रवण करनेसे कहीं व्यामोह न हो जाय । | | यथा किल द्वितीयायां सूक्ष्मं चन्द्रं दिदर्शयिषुर्वृक्षं कश्चित्प्रत्यक्षमादौ दर्शयति पश्यामुमेष चन्द्र इति। ततोऽयं ततोऽप्यन्यं गिरिमूर्धानं च चन्द्रसमीपस्थमेष चन्द्र इति । ततोऽसौ चन्द्रं पश्यति । | [ इसी बातको दृष्टान्तसे स्पष्ट करते हैं—] जिस प्रकार द्वितीयाके दिन सूक्ष्म चन्द्रमाको दिखलानेकी इच्छावाला कोई पुरुष पहले सामनेवाले वृक्षको 'देख यह चन्द्रमा है' ऐसा कहकर दिखाता है । फिर किसी अन्य वृक्षको और उसके पश्चात् चन्द्रमाके समीपवर्ती किसी पर्वतशिखरको 'यह चन्द्रमा है' ऐसा कहकर दिखलाता है । तदनन्तर वह चन्द्रमाको देख लेता है । | | एवमेतद् 'य एषोऽक्षिणि' इत्यादिमुक्तं प्रजापतिना त्रिभिः पर्यायैर्न पर इति । चतुर्थे तु पर्याये देहान्मर्त्यात्समुत्थायाशरीरतामापन्नो ज्योतिःस्वरूपं यस्मिन्नुत्तमपुरुषे स्त्र्यादिभिर्भक्षत्क्रीडन्रममाणो | इसी प्रकार प्रजापतिने 'य एषोऽक्षिणि' इत्यादि तीन पर्यायोंसे जिसका वर्णन किया है वह पर आत्मा नहीं है; किंतु चौथे पर्यायमें इस मरणशील देहसे उत्थान कर जिस उत्तम पुरुषमें वह ज्योतिः- स्वरूप अशरीरताको प्राप्त होकर स्त्री आदिके साथ वर्तमान रहता हुआ भक्षण, क्रीडा और रमण |
खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| भवति स उत्तमः पुरुषः पर उक्त इति चाहुः । | करता रहता है वही उत्तम पुरुष परात्मा कहा गया है—ऐसा भी उनका कथन है । |
| [पूर्वोक्तमतनिरसनपूर्वकं सिद्धान्तमतम्]<br>सत्यं रमणीया तावदियं व्याख्या श्रोतुम् । न त्वर्थोऽस्य ग्रन्थस्यैवं सम्भवति । कथम् ? 'अक्षिणि पुरुषो दृश्यते' इत्युपन्यस्य शिष्याभ्यां छायात्मनि गृहीते तयोस्तद्विपरीतग्रहणं मत्वा तदपनयायोदशरावोपन्यासः किं पश्यथ इति च प्रश्नः साध्वलङ्कारोपदेशश्चानर्थकः स्यात्, यदिच्छायात्मैव प्रजापतिनाक्षिणि दृश्यत इत्युपदिष्टः । किञ्च यदि स्वयमुपदिष्ट इति ग्रहणस्याप्यपनयनकारणं वक्तव्यं स्यात् । स्वप्नसुषुप्तात्मग्रहणयोरपि तदप- | **सिद्धान्ती—**ठीक है, यह व्याख्या सुननेमें तो बड़ी सुहावनी है, किंतु इस ग्रन्थका अर्थ ऐसा नहीं हो सकता । कैसे नहीं हो सकता ?—यदि प्रजापतिने 'अक्षिणि पुरुषो दृश्यते' ऐसा कहकर छायात्माका ही उपदेश किया होता तो 'अक्षिणि पुरुषो दृश्यते' ऐसा उल्लेख करके, दोनों शिष्योंद्वारा छायात्माका ही ग्रहण किये जानेपर फिर उनका वह विपरीत ग्रहण मानकर उसकी निवृत्तिके लिये उदशरावका उपक्रम, 'क्या देखते हो' ऐसा प्रश्न और सुन्दर अलङ्कारधारणका उपदेश यह सब व्यर्थ ही सिद्ध होगा । इसके सिवा यदि उन्होंने स्वयं ही उसका उपदेश किया था तो उन्हें उसी प्रकार किये हुए ग्रहणकी निवृत्तिका भी कारण बतलाना चाहिये था । इसी प्रकार स्वप्नात्मा और सुषुप्तात्माका ग्रहण करनेपर उनकी निवृत्तिका कारण |
९१६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ९१६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| नयकारणं च स्वयं ब्रूयात् । न चोक्तं तेन मन्यामहे नाक्षिणिच्छायात्मा प्रजापतिनोपदिष्टः । | भी उन्हें स्वयं बतलाना चाहिये था। किंतु यह उन्होंने बतलाया नहीं है। इसलिये हम ऐसा मानते हैं कि प्रजापतिने नेत्रान्तर्गत छायात्माका उपदेश नहीं किया। |
| किं चान्यदक्षिणि द्रष्टा चेद्दृश्यत इत्युपदिष्टःस्यात्तत इदं युक्तम् । एतं त्वेव त इत्युक्त्वा स्वप्नेऽपि द्रष्टुरेवोपदेशः । स्वप्ने न द्रष्टोपदिष्ट इति चेन्न; अपि रोदितीवाप्रियवेत्तेवेत्युपदेशात् । न च द्रष्टुरन्यः कश्चित्स्वप्ने महीयमानश्चरति । "अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः" ( बृ० उ० ४ । ३ । ९ ) इति न्यायतः श्रुत्यन्तरे सिद्धत्वात् । | इसके सिवा दूसरी बात यह भी है कि यदि 'दृश्यते' इस क्रियापदसे नेत्रान्तर्गत द्रष्टाका ही उपदेश किया गया हो तभी यह कथन युक्त हो सकता है; 'एतं त्वेव ते' ऐसा कहकर स्वप्नमें भी द्रष्टाका ही उपदेश किया गया है। यदि कहो कि स्वप्नमें द्रष्टाका उपदेश नहीं किया गया तो यह कथन ठीक नहीं; क्योंकि 'रुदन-सा करता है, अप्रियवेत्ता-सा है' ऐसा कहा गया है। द्रष्टाके सिवा और कोई भी स्वप्नमें पूजित होता हुआ-सा नहीं विचरता; क्योंकि "इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयंप्रकाश होता है" ऐसा एक अन्य (बृहदारण्यक) श्रुतिमें युक्तिपूर्वक सिद्ध किया गया है। |
| यद्यपि स्वप्ने सधीर्भवति तथापि न धीः स्वप्नभोगोपलब्धिं प्रति करणत्वं भजते । किं | यद्यपि स्वप्नमें आत्मा 'सधी:'-अन्तःकरणसहित रहता है तो भी वह अन्तःकरण स्वप्नभोगोंकी उपलब्धिके प्रति करणत्वको प्राप्त नहीं होता। तो फिर क्या रहता |
खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ ९१७
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| तर्हि ? पटचित्रवज्जाग्रद्वासनाश्रया दृश्यैव धीर्भवतीति न द्रष्टुः स्वयंज्योतिष्ट्वबाधः स्यात् । | है ?—वह पटचित्रके समान जाग्रत्-वासनाओंका आश्रयभूत दृश्य ही रहता है—इसलिये उस अवस्था में द्रष्टाके स्वयंप्रकाशत्वका बाध नहीं हो सकता । |
| किञ्चान्यत्, जाग्रत्स्वप्नयोर्भूतानि चात्मानं च जानातीमानि भूतान्ययमहमस्मीति प्राप्तौ सत्यां प्रतिषेधो युक्तः स्यान्नाह खल्वयमित्यादि। तथा चेतनस्यैवाविद्यानिमित्तयोः सशरीरत्वे सति प्रियाप्रिययोरपहतिर्नास्तीत्युक्त्वा तस्यैवाशरीरस्य सतो विद्यायां सत्यां स शरीरत्वे प्राप्तयोः प्रतिषेधो युक्तोऽशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशत इति । एकश्चात्मा स्वप्नबुद्धान्तयोर्महामत्स्यवदसङ्गः सञ्चरतीति श्रुत्यन्तरे सिद्धम् । | इसके सिवा दूसरा हेतु यह भी है कि जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओंमें यह भूतोंको और अपनेको 'ये भूत हैं और यह मैं हूँ' इस प्रकार जानता है—यह बात प्राप्त होनेपर ही [ सुषुप्तिमें ] यह अपनेको और भूतोंको नहीं जानता' ऐसा प्रतिषेध उचित हो सकता है ।<br><br>तथा चेतनके ही सशरीरत्वकी प्राप्ति होनेपर अविद्यानिमित्तक प्रियाप्रियका नाश नहीं होता ऐसा कहकर विद्या प्राप्त होनेपर अशरीर हुए उसीके सशरीरावस्था में प्राप्त हुए प्रियाप्रियका 'अशरीर होनेपर इसे प्रियाप्रिय स्पर्श नहीं करते' इस प्रकार प्रतिषेध करना उचित होगा। स्वप्न और जाग्रत्में एक ही आत्मा महामत्स्यके समान असंगरुपसे विचरता है—ऐसा एक अन्य (बृहदारण्यक) श्रुतिसे सिद्ध है । |
९१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ९१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| यच्चोक्तं सम्प्रसादः शरीरात्समुत्थाय यस्मिन्स्त्र्यादिभी रममाणो भवति सोऽन्यः सम्प्रसादादधिकरणनिर्दिष्ट उत्तमः पुरुष इति, तदप्यसत्; चतुर्थेऽपि पर्याये 'एतं त्वेव ते' इति वचनात्। यदि ततोऽन्योऽभिप्रेतः स्यात्पूर्ववत् 'एतं त्वेव ते' इति न ब्रूयान्मृषा प्रजापतिः। | और ऐसा जो कहा कि सम्प्रसाद (सुषुप्तावस्थापन्न जीव) इस शरीरसे सम्यक् प्रकारसे उत्थान कर जिसमें स्त्री आदिके साथ रमण करता रहता है वह अधिकरणरूपसे निर्दिष्ट उत्तम पुरुष उससे भिन्न है—सो भी ठीक नहीं; क्योंकि चौथे पर्यायमें 'एतं त्वेव ते' ऐसा [पूर्वोक्तका परामर्श करनेवाला] निर्देश किया गया है। यदि प्रजापतिको उससे भिन्न कोई और पुरुष अभिमत होता तो वे पहलेहीके समान 'एवं त्वेव ते' ऐसा मिथ्या वचन न कहते। | | किञ्चान्यत्तेजोऽबन्नादीनां स्रष्टुः सतः स्वविकारदेहशृङ्गे प्रवेशं दर्शयित्वा प्रविष्टाय पुनस्तत्त्वमसीत्युपदेशो मृषा प्रसज्येत। तस्मिंस्त्वं स्त्र्यादिभी रन्ता भविष्यसीति युक्त उपदेशोऽभविष्यद्यदि सम्प्रसादादन्य उत्तमः पुरुषो भवेत्। तथा भूम्यहमेवे- | इसके सिवा दूसरा कारण यह भी है कि [यदि उत्तम पुरुषको पूर्वोक्त पुरुषोंसे भिन्न मानेंगे तो] तेज, अप् और अन्नादिकी रचना करनेवाले सत्का अपने विकारभूत देहमें प्रवेश दिखलाकर इस प्रकार प्रविष्ट हुए उसको जो 'तू वह है' ऐसा उपदेश किया गया है वह मिथ्या सिद्ध होगा। यदि उत्तम पुरुष सम्प्रसादसे भिन्न होता तो 'उसमें तू स्त्री आदिके साथ रमण करनेवाला होगा, ऐसा उपदेश |
खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ ९१९
| त्यादित्यात्मैवेदं सर्वमिति नोपसमहरिष्यद्यदि भूमा जीवादन्योऽभविष्यत्। “नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा” (बृ० उ० ३।७।२३) इत्यादिश्रुत्यन्तराच्च। सर्वश्रुतिषु च परस्मिन्नात्मशब्दप्रयोगो नाभविष्यत्प्रत्यगात्मा चेत्सर्वजन्तूनां पर आत्मा न भवेत्। तस्मादेक एवात्मा प्रकरणी सिद्धः। | उचित होता और यदि भूमा जीवसे भिन्न होता तो भूमामें 'यह मैं ही हूँ' ऐसा आदेश करके 'यह सब आत्मा ही है' ऐसा उपसंहार न किया जाता। “इससे भिन्न कोई और द्रष्टा नहीं है” इस श्रुत्यन्तरसे भी यही सिद्ध होता है। यदि सम्पूर्ण जीवोंका प्रत्यगात्मा ही पर आत्मा न होता तो समस्त श्रुतियोंमें परमात्माके लिये 'आत्मा' शब्दका प्रयोग न किया जाता। अतः एक ही आत्मा इस प्रकरणका विषय सिद्ध होता है। | | न चात्मनः संसारित्वम्; अविद्याध्यस्तत्वादात्मनि संसारस्य। न हि रज्जुशुक्तिकागगनादिषु सर्परजतमलादीनि मिथ्याज्ञानाध्यस्तानि तेषां भवन्तीति। एतेन सशरीरस्य प्रियाप्रिययोरपहतिर्नास्तीति व्याख्यातम्। यच्च स्थितमप्रियवेत्तेवेति नाप्रियवेत्तैवेति सिद्धम्। एवं च सति | इसके सिवा, आत्माको संसारित्व है भी नहीं; क्योंकि आत्मामें संसार अविद्याके कारण अध्यस्त है। रज्जु, शुक्ति और आकाशादिमें मिथ्याज्ञानके कारण अध्यस्त हुए सर्प, रजत और मलादि वस्तुतः उनके नहीं हो जाते। इससे 'सशरीरके प्रियाप्रियका नाश नहीं होता' इस वाक्यकी व्याख्या हो जाती है। [ इस प्रकार ] पहले जो कहा गया था कि स्वप्नद्रष्टा अप्रियवेत्ता-सा होता है। साक्षात् अप्रियवेत्ता ही नहीं होता—सो सिद्ध हो गया। और यह सिद्ध |
९२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ९२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| सर्वपर्यायेष्वेतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति प्रजापतेर्वचनम्। यदि वा प्रजापतिच्छद्मरूपायाः श्रुतेर्वचनं सत्यमेव भवेत्। न च यत्कुतर्कबुद्ध्या मृषा कर्तुं युक्तम्। ततो गुरुतरस्यप्रमाणान्तरस्यानुपपत्तेः। | होनेपर समस्त पर्यायोंमें 'यह अमृत ओर अभय है तथा यही ब्रह्म है' ऐसा प्रजापतिका वचन अथवा प्रजापतिच्छद्मरूपा श्रुतिका वचन भी सत्य ही सिद्ध होता है। उसे कुतर्कबुद्धिसे मिथ्या प्रमाणित करना उचित नहीं है, क्योंकि उस (श्रुतिवाक्य) से उत्कृष्टतर प्रमाण मिलना असम्भव है। | | ननु प्रत्यक्षं दुःखाद्यप्रियवेत्तृत्वमव्यभिचार्यनुभूयत इति चेन्न; जरादिरहितो जीर्णोऽहं जातोऽहमायुष्मान् गौरः कृष्णो मृत इत्यादिप्रत्यक्षानुभववत्तदुपपत्तेः। सर्वमप्येतत्सत्यमिति चेदस्त्येवैतदेवं दुरवगमं येन देवराजोऽप्युदशरावादिदर्शिताविनाशयुक्तिरपि मुमोहैवात्र विनाशमेवापीतो भवतीति। | यदि कहो कि दुःखादि अप्रियवेत्तृत्व तो निश्चित है और प्रत्यक्ष अनुभव होता है—तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि 'मैं जरादिसे रहित हूँ, जराग्रस्त हूँ, उत्पन्न हुआ हूँ, आयुष्मान् हूँ, गौर हूँ, श्याम हूँ, मरा हुआ हूँ' इत्यादि प्रत्यक्ष अनुभवोंके समान वह (अप्रियवेत्तृत्व) भी सम्भव हो सकता है। यदि कहो कि यह सब तो सत्य ही है तो वस्तुतः यह बात ऐसी ही दुर्गम है, इसीसे आत्माके अविनाशके सम्बन्धमें उदकपात्रादि युक्ति दिखलानेपर भी देवराजको यह मोह ही रहा कि इस अवस्थामें तो यह विनाशको ही प्राप्त हो जाता है। |
खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थे ९२१ ЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖ
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| तथा विरोचनो महाप्राज्ञः प्राजापत्योऽपि देहमात्रात्मदर्शनो बभूव। तथेन्द्रस्यात्मविनाशभयसागर एव वैनाशिका न्यमज्जन्।<br><br>तथा सांख्या द्रष्टारं देहादिन्यतिरिक्तमवगम्यापि त्यक्तागमप्रमाणत्वान्मृत्युविषय एवान्यत्वदर्शने तस्थुः। तथान्ये काणादादिदर्शनाः कषायरक्तमिव क्षारादिभिर्वस्त्रं नवभिरात्मगुणैर्युक्तमात्मद्रव्यं विशोधयितुं प्रवृत्ताः। तथान्ये कर्मिणो बाह्यविषयापहृतचेतसो वेदप्रमाणा अपि परमार्थसत्यमात्मैकत्वं विनाशमिवेन्द्रवन्मन्यमाना घटीयन्त्रवदारोहावरोहप्रकारैरनिशं बम्भ्रमति किमन्ये क्षुद्रजन्तवो विवेकहीनाः स्वभावत एव बहिर्विषयापहृतचेतसः। | तथा परम बुद्धिमान् और प्रजापतिका पुत्र होनेपर भी विरोचन केवल देहमात्रमें आत्मबुद्धि करनेवाला हुआ। इसी प्रकार वैनाशिक लोग इन्द्रके आत्मविनाशरूप भयके समुद्रमें डूब गये। तथा सांख्यवादी द्रष्टा (आत्मा) को देहादिसे भिन्न जानकर भी शास्त्रप्रमाणको छोड़ देनेके कारण मृत्युके विषयभूत भेददर्शनमें ही पड़े रह गये। एवं अन्य काणादादि मतावलम्बी कषायसे रँगे हुए वस्त्रको क्षारादिसे शुद्ध करनेके समान आत्माके नौ गुणोंसे युक्त आत्मद्रव्यको शुद्ध करनेमें लग गये। तथा दूसरे कर्मकाण्डी लोग बाह्य विषयोंमें आसक्तचित्त होनेके कारण वेदको प्रमाण माननेवाले होनेपर भी इन्द्रके समान परमार्थसत्य आत्मैकत्वको अपना विनाश-सा समझकर घटीयन्त्रके समान ऊपर-नीचे जाते-आते रात-दिन भटकते रहते हैं। फिर जो स्वभावसे ही बाह्य विषयोंमें आसक्तचित्त हैं उन अन्य विवेकहीन क्षुद्र जीवोंकी तो बात ही क्या है! |
९३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ९३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| तस्मादिदं त्यक्तसर्वबाह्यैषणैरनन्यशरणैः परमहंसपरिव्राजकैरत्याश्रमिभिर्वेदान्तविज्ञानपरैरेव वेदनीयं पूज्यतमैः प्राजापत्यं चेमं सम्प्रदायमनुसरद्भिरुपनिबद्धं प्रकरणचतुष्टयेन। तथानुशासत्यद्यापि त एव नान्य इति ॥ १ ॥ | अतः जिन्होंने सम्पूर्ण बाह्य एषणाओंका त्याग कर दिया है, जिनकी कोई और गति नहीं है और जो प्रजापतिके सम्प्रदायका अनुसरण करनेवाले हैं उन वेदान्तविज्ञानपरायण अत्याश्रमी पूज्यतम परमहंस परिव्राजकोंके द्वारा ही यह चार प्रकरणोंमें उपनिबद्ध (प्रतिपादित) आत्मतत्त्व ज्ञातव्य है; तथा आज भी वे ही उसका उपदेश करते हैं, और कोई नहीं ॥ १ ॥ |
| तत्राशरीरस्य सम्प्रसादस्याविद्यया शरीरेणाविशेषतां सशरीरतामेव सम्प्राप्तस्य शरीरात्समुत्थाय स्वेन रूपेण यथाभिनिष्पत्तिस्तथा वक्तव्येति दृष्टान्त उच्यते— | ऐसी अवस्था में, जिस प्रकार अविद्यावश शरीरके साथ अविशेषता अर्थात् सशरीरताको ही प्राप्त हुए अशरीर सम्प्रसादकी शरीरसे उत्थान कर अपने स्वरूपकी प्राप्ति होती है वह बतलानी चाहिये—इसीसे यह दृष्टान्त कहा जाता है— |
अशरीरो वायुरभ्रं विद्युत् स्तनयित्नुरशरीराण्येतानि तद्यथैतान्यमुष्मादाकाशात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यन्ते ॥ २ ॥
वायु अशरीर है; अभ्र, विद्युत् और मेघध्वनि ये सब अशरीर हैं। जिस प्रकार ये सब उस आकाशसे समुत्थान कर सूर्यकी परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपमें परिणत हो जाते हैं ॥ २ ॥
खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९२३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| अशरीरो वायुरविद्यमानं शिरःपाण्यादिमच्छरीरमस्येत्यशरीरः। किं चाभ्रं विद्युत्स्तनयित्नुरित्येतानि चाशरीराणि। तत्तत्रैवं सति वर्षादिप्रयोजनावसाने तथा अमुष्मादिति भूमिष्ठा श्रुतिर्द्युलोकसम्बन्धनमाकाशदेशं व्यपदिशति। एतानि यथोक्तान्याकाशसमानरूपतामापन्नानि स्वेन वाय्वादिरूपेणागृह्यमाणान्याकाशाख्यतां गतानि। | वायु अशरीर है, इसके शिर एवं हाथ-पाँववाला शरीर नहीं है इसलिये यह अशरीर है। तथा बादल, बिजली और मेघध्वनि—ये भी अशरीर हैं। ऐसा होनेपर भी, जिस प्रकार वर्षादि प्रयोजनकी पूर्ति होनेपर ये उस [ आकाशसे समुत्थान कर ] इस प्रकार भूमिमें स्थित श्रुति द्युलोकसम्बन्धी आकाशका परोक्षरूपसे निर्देश करती है। ये पूर्वोक्त वायु आदि आकाशकी समानरूपताको प्राप्त हो अपने वायु आदि रूपसे गृहीत न होते हुए आकाशसंज्ञाको प्राप्त हो जाते हैं। |
| यथा सम्प्रसादोऽविद्यावस्थायां शरीरात्मभावमेवापन्नस्तानि च तथाभूतान्यमुष्माद्द्युलोकसम्बन्धिन आकाशदेशात्समुत्तिष्ठन्ति वर्षणादिप्रयोजनाभिनिवृत्तये। | जिस प्रकार सम्प्रसाद अविद्यावस्थामें देहात्मभावको ही प्राप्त रहता है उसी प्रकार तद्रूपताको प्राप्त हुए वे सब वर्षा आदि प्रयोजनकी पूर्तिके लिये इस द्युलोकसम्बन्धी आकाशदेशसे समुत्थान करते हैं। |
| कथम् ? शिशिरापाये सावित्रं परं ज्योतिः प्रकृष्टं ग्रैष्मकमुपसम्पद्य सावित्रमभितापं प्राप्येत्यर्थः। | किस प्रकार समुत्थान करते हैं?—शिशिरका अन्त होनेपर सूर्यके परम तेज ग्रीष्मकालीन प्रकृष्ट तेजको उपसम्पन्न हो अर्थात् सविताके अभितापको प्राप्त हो |
| आदित्याभितापेन पृथग्भावमा- | उस आदित्यके अभितापको प्राप्त हो उस आदित्यके |
६२४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ६२४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| पादिताः सन्तः स्वेन स्वेन रूपेण पुरोवातादिवायुरूपेण स्तिमितभावं हित्वाभ्रमपि भूमिपर्वतहस्त्यादिरूपेण विद्युदपि स्वेन ज्योतिर्लतादिचपलरूपेण स्तनयित्नुरपि स्वेन गर्जिताशनिरूपेणेत्येवं प्रावृडागमे स्वेन स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यन्ते ॥ २ ॥ | अभितापसे विभिन्नभावको प्राप्त होकर अपने-अपने स्वरूपसे सम्पन्न हो जाते हैं। उनमें वायु पूर्ववायु आदि अपने रूपोंसे, बादल आर्द्रभावको त्यागकर भूमि, पर्वत एवं हाथी आदिके सदृश आकारोंसे, विद्युत् ज्योतिर्लता आदि अपने चपल रूपसे और मेघध्वनि गर्जन तथा वज्रपात आदि अपने रूपसे स्थित हो जाते हैं। इस प्रकार वर्षाकाल आनेपर ये सभी अपने-अपने रूपसे निष्पन्न हो जाते हैं ॥ २ ॥ |
<div align="center">❖</div>| यथायं दृष्टान्तः— | । जैसा कि यह दृष्टान्त है— |
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एवमेवैष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरूपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमपुरुषः स तत्र पर्येति जक्षत्क्रीडन्रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वा नोपजनꣳस्मरन्निदꣳशरीरꣳस यथा प्रयोग्य आचरणे युक्त एवमेवायमस्मिञ्छरीरे प्राणो युक्तः॥३॥
उसी प्रकार यह सम्प्रसाद इस शरीरसे समुत्थान कर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। वह उत्तम पुरुष है। उस अवस्थामें वह हँसता, क्रीडा करता और स्त्री, यान अथवा ज्ञातिजनके साथ रमण करता अपने साथ उत्पन्न हुए इस शरीरको स्मरण न करता हुआ सब ओर विचरता है। जिस प्रकार घोड़ा या बैल गाड़ीमें जुता रहता है उसी प्रकार यह प्राण इस शरीरमें जुता हुआ है ॥ ३ ॥
खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थे ९२५
| वाय्वादीनामाकाशादिसाम्यगमनवदविद्यया संसारावस्थायां शरीरसाम्यमापन्नोऽहममुष्य पुत्रो जातो जीर्णो मरिष्येत्येवं प्रकारं प्रजापतिनैव मघवान् यथोक्तेन क्रमेण नासि त्वं देहेन्द्रियादिधर्मा तत्त्वमसीति प्रतिबोधितः सन्स एष सम्प्रसादो जीवोऽस्माच्छरीरादाकाशादिव वाय्वादयः समुत्थाय देहादिविलक्षणमात्मनो रूपमवगम्य देहात्मभावनां हित्वेत्येतत्। स्वेन रूपेण सदात्मनैवाभिनिष्पद्यत इति व्याख्यातं पुरस्तात्। <br><br> स येन स्वेन रूपेण सम्प्रसादोऽभिनिष्पद्यते--प्राक्प्रतिबोधात्तद्भ्रान्तिनिमित्तात्सर्पो भवति यथा रज्जुः पश्चात्कृतप्रकाशा रज्ज्वात्मना स्वेन रूपेणाभिनि- | [ उसी प्रकार— ] वायु आदिके आकाशादिकी समताको प्राप्त होनेके समान अविद्यावश सांसारिक अवस्था में शरीरकी समताको प्राप्त हुआ, अर्थात् 'मैं इसका पुत्र हूँ, मैं उत्पन्न हुआ हूँ, जराग्रस्त हूँ, मरूँगा' इस प्रकार समझनेवाले इन्द्रको जिस प्रकार प्रजापतिने समझाया था उसी क्रमसे 'तू देह और इन्द्रियोंके धर्मवाला नहीं है, बल्कि वह सत् ही तू है' इस प्रकार समझाया हुआ वह यह सम्प्रसाद-जीव आकाशसे वायु आदिके समान इस शरीरसे समुत्थान कर देहादिसे विलक्षण आत्मस्वरूपको जानकर अर्थात् देहात्मभावनाको त्यागकर अपने स्वाभाविक सत्त्वरूपसे ही स्थित हो जाता है—इस प्रकार पहले इसकी व्याख्या की जा चुकी है। <br><br> वह सम्प्रसाद अपने जिस स्वाभाविक रूपसे स्थित होता है—जिस प्रकार विवेक होनेसे पूर्व भ्रान्तिके कारण रज्जु सर्प हो जाती है और फिर प्रकाश होनेपर वह अपने स्वाभाविक रज्जुरूपसे स्थित |
९२६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
९२६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
| ष्पद्यते । एवं च स उत्तमपुरुष उत्तमश्चासौ पुरुषश्चेत्युत्तमपुरुषः स एवोत्तमपुरुषोऽक्षिखप्नपुरुषौ व्यक्ताव्यक्तञ्च सुषुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नोऽशरीरश्च स्वेन रूपेणेति । एषामेष स्वेन रूपेणावस्थितः क्षराक्षरौ व्याकृताव्याकृतावपेक्ष्योत्तमपुरुषः कृतनिर्वचनो ह्ययं गीतासु । <br><br> स सम्प्रसादः स्वेन रूपेण तत्र स्वात्मनि स्वस्थतया सर्वात्मभूतः पर्येति क्वचिदिन्द्राद्यात्मना जक्षद्धसन् भक्षयन् वा भक्ष्यानुच्चावचानीप्सितान् क्वचिन्मनोमात्रैः संकल्पादेव समुत्थितैर्ब्रह्मलोकिकैर्वा क्रीडन् स्त्र्यादिभी रममाणश्च मनसैव, नोपजनम्, स्त्रीपुंसयोर- | हो जाती है उसी प्रकार वह उत्तम पुरुष—जो उत्तम हो और पुरुष हो उसे उत्तम पुरुष कहते हैं । अक्षिपुरुष और स्वप्नपुरुष ये दोनों व्यक्त हैं, किंतु सुषुप्तपुरुष अपने स्वाभाविक रूपमें स्थित होकर सम्यक् प्रकारसे लीन, सम्प्रसन्न, अव्यक्त तथा अशरीर है । इनमें व्यक्त और अव्यक्त जो क्षर और अक्षर पुरुष हैं उनकी अपेक्षा यह अपने स्वाभाविक रूपमें स्थित हुआ पुरुष उत्तम है । इसका निरूपण गीतामें किया है । <br><br> वह सम्प्रसाद अपने स्वाभाविक रूपसे—स्वयं स्वात्मामें स्थित हुआ आत्मनिष्ठ होनेके कारण सबका अन्तरात्मभूत होकर सब ओर संचार करता है । कभी इन्द्रादि रूपसे 'जक्षत्'—हँसता अथवा मनोवाञ्छित बढ़िया-घटिया भोजन-सामग्रियोंको भक्षण करता हुआ, कभी मनोमात्र अर्थात् केवल संकल्पसे ही उत्पन्न हुए अथवा ब्रह्मलोक-सम्बन्धी भोगोंके साथ क्रीडा करता और स्त्री आदिके साथ मनके ही द्वारा रमण करता हुआ उपजनको—जो स्त्री-पुरुषोंके पारस्परिक सहगमनसे उत्पन्न होता है अथवा |
खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थं ९२७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| न्योन्योपगमेन जायत इत्युपजनमात्मभावेन वात्मसामीप्येन जायत इत्युपजनमिदं शरीरं तन्न स्मरन् । तत्स्मरणे हि दुःखमेव स्यात्; दुःखात्मकत्वात्तस्य । | आत्मरूपसे या अपनी समीपतासे उत्पन्न होता है ऐसे इस शरीरका नाम 'उपजन' है—इसे स्मरण न करता हुआ सब ओर संचार करता है ], क्योंकि उसका स्मरण करनेसे तो दुःख ही होगा, कारण वह दुःखात्मक है । |
| नन्वनुभूतं चेन्न स्मरेदसर्वज्ञत्वं मुक्तस्य । | शङ्का—यदि वह अनुभूत शरीरका स्मरण नहीं करता तब तो मुक्त पुरुषकी असर्वज्ञता सिद्ध होती है । |
| नैष दोषः; येन मिथ्याज्ञानादिना जनितं तच्च मिथ्याज्ञानादि विद्ययोच्छेदितमतस्तन्नानुभूतमेवेति न तदस्मरणे सर्वज्ञत्वहानिः । न ह्युन्मत्तेन ग्रहगृहीतेन वा यदनुभूतं तदुन्मादाद्यपगमेऽपि स्मर्त्तव्यं स्यात्तथेहापि संसारिभिरविद्यादोषवद्भैर्यदनुभूयते तत्सर्वात्मानमशरीरं न | समाधान—यहाँ यह दोष नहीं है । जिस मिथ्याज्ञानादिके द्वारा उस शरीरकी उत्पत्ति हुई थी वह मिथ्याज्ञानादि ज्ञानसे उच्छिन्न हो गये; इसलिये अब उस शरीरका अनुभव नहीं होता, अतः उसका स्मरण न करनेमें सर्वज्ञताकी हानि नहीं हो सकती । जो वस्तु उन्मत्त या ग्रहग्रस्त पुरुषको अनुभव होती थी उसे उन्मादादिकी निवृत्ति होनेपर भी स्मरण करना चाहिये—ऐसी बात नहीं है । इसी प्रकार इस प्रसङ्गमें भी जो शरीर अविद्यारूप दोषवाले संसारियोंद्वारा अनुभव किया जाता है वह अशरीरी सर्वात्माको स्पर्श नहीं करता, क्योंकि |
९२८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ९२८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| स्पृशति; अविद्यानिमित्ताभावात्। | उसमें उसके अविद्यारूप निमित्तका अभाव है। | | ये तूच्छिन्नदोषैर्मृदितकषायैर्मानसाः सत्याः कामा अनृतापिधाना अनुभूयन्ते विद्याभिव्यङ्ग्यत्वात्, त एवं मुक्तेन सर्वात्मभूतेन सम्बध्यन्त इत्यात्मज्ञानस्तुतये निर्दिश्यन्तेऽतः साध्वेवद्विशिनष्टि—‘य एते ब्रह्मलोके’ इति । यत्र क्वचन भवन्तोऽपि ब्रह्मण्येव हि ते लोके भवन्तीति सर्वात्मत्वाद्ब्रह्मण उच्यन्ते । | किंतु जिनके दोष नष्ट हो गये हैं और राग-द्वेषादि कषाय क्षीण हो गये हैं उन रुपोंद्वारा, मिथ्या विषयाभिनिवेशरूप अनृतके कारण अज्ञानियोंके अनुभवमें न आनेवाले जिन मानस सत्य भोगोंका अनुभव किया जाता है वे विद्याद्वारा अभिव्यक्त होनेवाले होनेके कारण इस प्रकार उपर्युक्त सर्वात्मभूत विद्वान्से सम्बन्धित हैं; इसीसे आत्मज्ञानकी स्तुतिके लिये उनका निर्देश किया जाता है। अतः ‘य एते ब्रह्मलोके’ ऐसा जो निर्देश किया गया है वह ठीक ही है, क्योंकि ब्रह्म सर्वात्मक है, अतः वे कहीं भी रहें तथापि ब्रह्मलोकमें ही हैं—इस प्रकार कहे जाते हैं। | | ननु कथमेकः सन्नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा[कामांश्च ब्राह्मलौकिकान् पश्यन्रमत इति च विरुद्धम्। यथैको यस्मिन्नेव क्षणे | शङ्का—किंतु ‘वह एक होता हुआ न तो अन्य कुछ देखता है, न अन्य कुछ सुनता है और न अन्य कुछ जानता है’ ‘वह भूमा है’ और ‘वह ब्रह्मलोकसम्बन्धी भोगोंको देखता हुआ रमण करता है’ ये दोनों कथन तो परस्परविरुद्ध हैं, जिस प्रकार यह कहा जाय कि एक पुरुष |
| खण्ड १२ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९१९ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| पश्यति स तस्मिन्नेव क्षणे न पश्यति । | जिस क्षणमें देखता है उसी क्षणमें नहीं भी देखता । |
| नैष दोषः; श्रुत्यन्तरे परिहृतत्वात्। द्रष्टुर्दृष्टेरविपरिलोपात्पश्यन्नेव भवति; द्रष्टुरन्यत्वेन कामानांमभावान्न पश्यति चेति। यद्यपि सुषुप्ते तदुक्तं मुक्तस्यापि सर्वैकत्वात्समानो द्वितीयाभावः। 'केन कं पश्येत्' इति चोक्तमेव। | **समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि एक अन्य श्रुतिमें इसका निराकरण कर दिया गया है। द्रष्टाकी दृष्टिका विपरिलोप न होनेके कारण वह देखता ही रहता है और द्रष्टासे भिन्न भोगोंका अभाव होनेके कारण वह नहीं भी देखता। यद्यपि सुषुप्तिमें वह (द्वैताभाव) बतलाया गया है तथापि मुक्तके लिये भी सब कुछ एकरूप होनेके कारण समानरूपसे द्वैताभाव है। इस विषयमें 'किसके द्वारा क्या देखे' ऐसा कहा ही गया है। |
| अशरीरस्वरूपोऽपहतपाप्मादिलक्षणः सन् कथमेष पुरुषोऽक्षिणि दृश्यत इत्युक्तः प्रजापतिना ? तत्र यथासावक्षिणि साक्षाद्दृश्यते तद्वक्तव्यमितीदमारभ्यते । तत्र को हेतुरक्षिणि दर्शन इत्याह— | यह पुरुष अशरीररूप और अपहतपाप्मादि लक्षणोंवाला होनेपर भी नेत्रमें दिखलायी देता है—ऐसा प्रजापतिने क्यों कहा ? ऐसी शङ्का होनेपर जिस प्रकार यह नेत्रमें साक्षात् दिखलायी देता है वह बतलाना चाहिये—इसीसे यह (आगेका वक्तव्य) आरम्भ किया जाता है। नेत्रके भीतर उसके दिखलायी देनेमें क्या कारण है, सो श्रुति बतलाती है— |