छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 924, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
|---|
| सर्वपर्यायेष्वेतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति प्रजापतेर्वचनम्। यदि वा प्रजापतिच्छद्मरूपायाः श्रुतेर्वचनं सत्यमेव भवेत्। न च यत्कुतर्कबुद्ध्या मृषा कर्तुं युक्तम्। ततो गुरुतरस्यप्रमाणान्तरस्यानुपपत्तेः। | होनेपर समस्त पर्यायोंमें 'यह अमृत ओर अभय है तथा यही ब्रह्म है' ऐसा प्रजापतिका वचन अथवा प्रजापतिच्छद्मरूपा श्रुतिका वचन भी सत्य ही सिद्ध होता है। उसे कुतर्कबुद्धिसे मिथ्या प्रमाणित करना उचित नहीं है, क्योंकि उस (श्रुतिवाक्य) से उत्कृष्टतर प्रमाण मिलना असम्भव है। | | ननु प्रत्यक्षं दुःखाद्यप्रियवेत्तृत्वमव्यभिचार्यनुभूयत इति चेन्न; जरादिरहितो जीर्णोऽहं जातोऽहमायुष्मान् गौरः कृष्णो मृत इत्यादिप्रत्यक्षानुभववत्तदुपपत्तेः। सर्वमप्येतत्सत्यमिति चेदस्त्येवैतदेवं दुरवगमं येन देवराजोऽप्युदशरावादिदर्शिताविनाशयुक्तिरपि मुमोहैवात्र विनाशमेवापीतो भवतीति। | यदि कहो कि दुःखादि अप्रियवेत्तृत्व तो निश्चित है और प्रत्यक्ष अनुभव होता है—तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि 'मैं जरादिसे रहित हूँ, जराग्रस्त हूँ, उत्पन्न हुआ हूँ, आयुष्मान् हूँ, गौर हूँ, श्याम हूँ, मरा हुआ हूँ' इत्यादि प्रत्यक्ष अनुभवोंके समान वह (अप्रियवेत्तृत्व) भी सम्भव हो सकता है। यदि कहो कि यह सब तो सत्य ही है तो वस्तुतः यह बात ऐसी ही दुर्गम है, इसीसे आत्माके अविनाशके सम्बन्धमें उदकपात्रादि युक्ति दिखलानेपर भी देवराजको यह मोह ही रहा कि इस अवस्थामें तो यह विनाशको ही प्राप्त हो जाता है। |