छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 923, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ ९१९
| त्यादित्यात्मैवेदं सर्वमिति नोपसमहरिष्यद्यदि भूमा जीवादन्योऽभविष्यत्। “नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा” (बृ० उ० ३।७।२३) इत्यादिश्रुत्यन्तराच्च। सर्वश्रुतिषु च परस्मिन्नात्मशब्दप्रयोगो नाभविष्यत्प्रत्यगात्मा चेत्सर्वजन्तूनां पर आत्मा न भवेत्। तस्मादेक एवात्मा प्रकरणी सिद्धः। | उचित होता और यदि भूमा जीवसे भिन्न होता तो भूमामें 'यह मैं ही हूँ' ऐसा आदेश करके 'यह सब आत्मा ही है' ऐसा उपसंहार न किया जाता। “इससे भिन्न कोई और द्रष्टा नहीं है” इस श्रुत्यन्तरसे भी यही सिद्ध होता है। यदि सम्पूर्ण जीवोंका प्रत्यगात्मा ही पर आत्मा न होता तो समस्त श्रुतियोंमें परमात्माके लिये 'आत्मा' शब्दका प्रयोग न किया जाता। अतः एक ही आत्मा इस प्रकरणका विषय सिद्ध होता है। | | न चात्मनः संसारित्वम्; अविद्याध्यस्तत्वादात्मनि संसारस्य। न हि रज्जुशुक्तिकागगनादिषु सर्परजतमलादीनि मिथ्याज्ञानाध्यस्तानि तेषां भवन्तीति। एतेन सशरीरस्य प्रियाप्रिययोरपहतिर्नास्तीति व्याख्यातम्। यच्च स्थितमप्रियवेत्तेवेति नाप्रियवेत्तैवेति सिद्धम्। एवं च सति | इसके सिवा, आत्माको संसारित्व है भी नहीं; क्योंकि आत्मामें संसार अविद्याके कारण अध्यस्त है। रज्जु, शुक्ति और आकाशादिमें मिथ्याज्ञानके कारण अध्यस्त हुए सर्प, रजत और मलादि वस्तुतः उनके नहीं हो जाते। इससे 'सशरीरके प्रियाप्रियका नाश नहीं होता' इस वाक्यकी व्याख्या हो जाती है। [ इस प्रकार ] पहले जो कहा गया था कि स्वप्नद्रष्टा अप्रियवेत्ता-सा होता है। साक्षात् अप्रियवेत्ता ही नहीं होता—सो सिद्ध हो गया। और यह सिद्ध |