छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 930, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें९२६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
| ष्पद्यते । एवं च स उत्तमपुरुष उत्तमश्चासौ पुरुषश्चेत्युत्तमपुरुषः स एवोत्तमपुरुषोऽक्षिखप्नपुरुषौ व्यक्ताव्यक्तञ्च सुषुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नोऽशरीरश्च स्वेन रूपेणेति । एषामेष स्वेन रूपेणावस्थितः क्षराक्षरौ व्याकृताव्याकृतावपेक्ष्योत्तमपुरुषः कृतनिर्वचनो ह्ययं गीतासु । <br><br> स सम्प्रसादः स्वेन रूपेण तत्र स्वात्मनि स्वस्थतया सर्वात्मभूतः पर्येति क्वचिदिन्द्राद्यात्मना जक्षद्धसन् भक्षयन् वा भक्ष्यानुच्चावचानीप्सितान् क्वचिन्मनोमात्रैः संकल्पादेव समुत्थितैर्ब्रह्मलोकिकैर्वा क्रीडन् स्त्र्यादिभी रममाणश्च मनसैव, नोपजनम्, स्त्रीपुंसयोर- | हो जाती है उसी प्रकार वह उत्तम पुरुष—जो उत्तम हो और पुरुष हो उसे उत्तम पुरुष कहते हैं । अक्षिपुरुष और स्वप्नपुरुष ये दोनों व्यक्त हैं, किंतु सुषुप्तपुरुष अपने स्वाभाविक रूपमें स्थित होकर सम्यक् प्रकारसे लीन, सम्प्रसन्न, अव्यक्त तथा अशरीर है । इनमें व्यक्त और अव्यक्त जो क्षर और अक्षर पुरुष हैं उनकी अपेक्षा यह अपने स्वाभाविक रूपमें स्थित हुआ पुरुष उत्तम है । इसका निरूपण गीतामें किया है । <br><br> वह सम्प्रसाद अपने स्वाभाविक रूपसे—स्वयं स्वात्मामें स्थित हुआ आत्मनिष्ठ होनेके कारण सबका अन्तरात्मभूत होकर सब ओर संचार करता है । कभी इन्द्रादि रूपसे 'जक्षत्'—हँसता अथवा मनोवाञ्छित बढ़िया-घटिया भोजन-सामग्रियोंको भक्षण करता हुआ, कभी मनोमात्र अर्थात् केवल संकल्पसे ही उत्पन्न हुए अथवा ब्रह्मलोक-सम्बन्धी भोगोंके साथ क्रीडा करता और स्त्री आदिके साथ मनके ही द्वारा रमण करता हुआ उपजनको—जो स्त्री-पुरुषोंके पारस्परिक सहगमनसे उत्पन्न होता है अथवा |