छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 928, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६२४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| पादिताः सन्तः स्वेन स्वेन रूपेण पुरोवातादिवायुरूपेण स्तिमितभावं हित्वाभ्रमपि भूमिपर्वतहस्त्यादिरूपेण विद्युदपि स्वेन ज्योतिर्लतादिचपलरूपेण स्तनयित्नुरपि स्वेन गर्जिताशनिरूपेणेत्येवं प्रावृडागमे स्वेन स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यन्ते ॥ २ ॥ | अभितापसे विभिन्नभावको प्राप्त होकर अपने-अपने स्वरूपसे सम्पन्न हो जाते हैं। उनमें वायु पूर्ववायु आदि अपने रूपोंसे, बादल आर्द्रभावको त्यागकर भूमि, पर्वत एवं हाथी आदिके सदृश आकारोंसे, विद्युत् ज्योतिर्लता आदि अपने चपल रूपसे और मेघध्वनि गर्जन तथा वज्रपात आदि अपने रूपसे स्थित हो जाते हैं। इस प्रकार वर्षाकाल आनेपर ये सभी अपने-अपने रूपसे निष्पन्न हो जाते हैं ॥ २ ॥ |
<div align="center">❖</div>| यथायं दृष्टान्तः— | । जैसा कि यह दृष्टान्त है— |
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एवमेवैष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरूपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमपुरुषः स तत्र पर्येति जक्षत्क्रीडन्रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वा नोपजनꣳस्मरन्निदꣳशरीरꣳस यथा प्रयोग्य आचरणे युक्त एवमेवायमस्मिञ्छरीरे प्राणो युक्तः॥३॥
उसी प्रकार यह सम्प्रसाद इस शरीरसे समुत्थान कर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। वह उत्तम पुरुष है। उस अवस्थामें वह हँसता, क्रीडा करता और स्त्री, यान अथवा ज्ञातिजनके साथ रमण करता अपने साथ उत्पन्न हुए इस शरीरको स्मरण न करता हुआ सब ओर विचरता है। जिस प्रकार घोड़ा या बैल गाड़ीमें जुता रहता है उसी प्रकार यह प्राण इस शरीरमें जुता हुआ है ॥ ३ ॥