छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 927, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 927
खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९२३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अशरीरो वायुरविद्यमानं शिरःपाण्यादिमच्छरीरमस्येत्यशरीरः। किं चाभ्रं विद्युत्स्तनयित्नुरित्येतानि चाशरीराणि। तत्तत्रैवं सति वर्षादिप्रयोजनावसाने तथा अमुष्मादिति भूमिष्ठा श्रुतिर्द्युलोकसम्बन्धनमाकाशदेशं व्यपदिशति। एतानि यथोक्तान्याकाशसमानरूपतामापन्नानि स्वेन वाय्वादिरूपेणागृह्यमाणान्याकाशाख्यतां गतानि। | वायु अशरीर है, इसके शिर एवं हाथ-पाँववाला शरीर नहीं है इसलिये यह अशरीर है। तथा बादल, बिजली और मेघध्वनि—ये भी अशरीर हैं। ऐसा होनेपर भी, जिस प्रकार वर्षादि प्रयोजनकी पूर्ति होनेपर ये उस [ आकाशसे समुत्थान कर ] इस प्रकार भूमिमें स्थित श्रुति द्युलोकसम्बन्धी आकाशका परोक्षरूपसे निर्देश करती है। ये पूर्वोक्त वायु आदि आकाशकी समानरूपताको प्राप्त हो अपने वायु आदि रूपसे गृहीत न होते हुए आकाशसंज्ञाको प्राप्त हो जाते हैं। |
| यथा सम्प्रसादोऽविद्यावस्थायां शरीरात्मभावमेवापन्नस्तानि च तथाभूतान्यमुष्माद्द्युलोकसम्बन्धिन आकाशदेशात्समुत्तिष्ठन्ति वर्षणादिप्रयोजनाभिनिवृत्तये। | जिस प्रकार सम्प्रसाद अविद्यावस्थामें देहात्मभावको ही प्राप्त रहता है उसी प्रकार तद्रूपताको प्राप्त हुए वे सब वर्षा आदि प्रयोजनकी पूर्तिके लिये इस द्युलोकसम्बन्धी आकाशदेशसे समुत्थान करते हैं। |
| कथम् ? शिशिरापाये सावित्रं परं ज्योतिः प्रकृष्टं ग्रैष्मकमुपसम्पद्य सावित्रमभितापं प्राप्येत्यर्थः। | किस प्रकार समुत्थान करते हैं?—शिशिरका अन्त होनेपर सूर्यके परम तेज ग्रीष्मकालीन प्रकृष्ट तेजको उपसम्पन्न हो अर्थात् सविताके अभितापको प्राप्त हो |
| आदित्याभितापेन पृथग्भावमा- | उस आदित्यके अभितापको प्राप्त हो उस आदित्यके |