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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९२३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
अशरीरो वायुरविद्यमानं शिरःपाण्यादिमच्छरीरमस्येत्यशरीरः। किं चाभ्रं विद्युत्स्तनयित्नुरित्येतानि चाशरीराणि। तत्तत्रैवं सति वर्षादिप्रयोजनावसाने तथा अमुष्मादिति भूमिष्ठा श्रुतिर्द्युलोकसम्बन्धनमाकाशदेशं व्यपदिशति। एतानि यथोक्तान्याकाशसमानरूपतामापन्नानि स्वेन वाय्वादिरूपेणागृह्यमाणान्याकाशाख्यतां गतानि।वायु अशरीर है, इसके शिर एवं हाथ-पाँववाला शरीर नहीं है इसलिये यह अशरीर है। तथा बादल, बिजली और मेघध्वनि—ये भी अशरीर हैं। ऐसा होनेपर भी, जिस प्रकार वर्षादि प्रयोजनकी पूर्ति होनेपर ये उस [ आकाशसे समुत्थान कर ] इस प्रकार भूमिमें स्थित श्रुति द्युलोकसम्बन्धी आकाशका परोक्षरूपसे निर्देश करती है। ये पूर्वोक्त वायु आदि आकाशकी समानरूपताको प्राप्त हो अपने वायु आदि रूपसे गृहीत न होते हुए आकाशसंज्ञाको प्राप्त हो जाते हैं।
यथा सम्प्रसादोऽविद्यावस्थायां शरीरात्मभावमेवापन्नस्तानि च तथाभूतान्यमुष्माद्द्युलोकसम्बन्धिन आकाशदेशात्समुत्तिष्ठन्ति वर्षणादिप्रयोजनाभिनिवृत्तये।जिस प्रकार सम्प्रसाद अविद्यावस्थामें देहात्मभावको ही प्राप्त रहता है उसी प्रकार तद्रूपताको प्राप्त हुए वे सब वर्षा आदि प्रयोजनकी पूर्तिके लिये इस द्युलोकसम्बन्धी आकाशदेशसे समुत्थान करते हैं।
कथम् ? शिशिरापाये सावित्रं परं ज्योतिः प्रकृष्टं ग्रैष्मकमुपसम्पद्य सावित्रमभितापं प्राप्येत्यर्थः।किस प्रकार समुत्थान करते हैं?—शिशिरका अन्त होनेपर सूर्यके परम तेज ग्रीष्मकालीन प्रकृष्ट तेजको उपसम्पन्न हो अर्थात् सविताके अभितापको प्राप्त हो
आदित्याभितापेन पृथग्भावमा-उस आदित्यके अभितापको प्राप्त हो उस आदित्यके

६२४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

६२४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| पादिताः सन्तः स्वेन स्वेन रूपेण पुरोवातादिवायुरूपेण स्तिमितभावं हित्वाभ्रमपि भूमिपर्वतहस्त्यादिरूपेण विद्युदपि स्वेन ज्योतिर्लतादिचपलरूपेण स्तनयित्नुरपि स्वेन गर्जिताशनिरूपेणेत्येवं प्रावृडागमे स्वेन स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यन्ते ॥ २ ॥ | अभितापसे विभिन्नभावको प्राप्त होकर अपने-अपने स्वरूपसे सम्पन्न हो जाते हैं। उनमें वायु पूर्ववायु आदि अपने रूपोंसे, बादल आर्द्रभावको त्यागकर भूमि, पर्वत एवं हाथी आदिके सदृश आकारोंसे, विद्युत् ज्योतिर्लता आदि अपने चपल रूपसे और मेघध्वनि गर्जन तथा वज्रपात आदि अपने रूपसे स्थित हो जाते हैं। इस प्रकार वर्षाकाल आनेपर ये सभी अपने-अपने रूपसे निष्पन्न हो जाते हैं ॥ २ ॥ |

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यथायं दृष्टान्तः—। जैसा कि यह दृष्टान्त है—

एवमेवैष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरूपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमपुरुषः स तत्र पर्येति जक्षत्क्रीडन्रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वा नोपजनꣳस्मरन्निदꣳशरीरꣳस यथा प्रयोग्य आचरणे युक्त एवमेवायमस्मिञ्छरीरे प्राणो युक्तः॥३॥

उसी प्रकार यह सम्प्रसाद इस शरीरसे समुत्थान कर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। वह उत्तम पुरुष है। उस अवस्थामें वह हँसता, क्रीडा करता और स्त्री, यान अथवा ज्ञातिजनके साथ रमण करता अपने साथ उत्पन्न हुए इस शरीरको स्मरण न करता हुआ सब ओर विचरता है। जिस प्रकार घोड़ा या बैल गाड़ीमें जुता रहता है उसी प्रकार यह प्राण इस शरीरमें जुता हुआ है ॥ ३ ॥

खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थे ९२५


| वाय्वादीनामाकाशादिसाम्यगमनवदविद्यया संसारावस्थायां शरीरसाम्यमापन्नोऽहममुष्य पुत्रो जातो जीर्णो मरिष्येत्येवं प्रकारं प्रजापतिनैव मघवान् यथोक्तेन क्रमेण नासि त्वं देहेन्द्रियादिधर्मा तत्त्वमसीति प्रतिबोधितः सन्स एष सम्प्रसादो जीवोऽस्माच्छरीरादाकाशादिव वाय्वादयः समुत्थाय देहादिविलक्षणमात्मनो रूपमवगम्य देहात्मभावनां हित्वेत्येतत्। स्वेन रूपेण सदात्मनैवाभिनिष्पद्यत इति व्याख्यातं पुरस्तात्। <br><br> स येन स्वेन रूपेण सम्प्रसादोऽभिनिष्पद्यते--प्राक्प्रतिबोधात्तद्भ्रान्तिनिमित्तात्सर्पो भवति यथा रज्जुः पश्चात्कृतप्रकाशा रज्ज्वात्मना स्वेन रूपेणाभिनि- | [ उसी प्रकार— ] वायु आदिके आकाशादिकी समताको प्राप्त होनेके समान अविद्यावश सांसारिक अवस्था में शरीरकी समताको प्राप्त हुआ, अर्थात् 'मैं इसका पुत्र हूँ, मैं उत्पन्न हुआ हूँ, जराग्रस्त हूँ, मरूँगा' इस प्रकार समझनेवाले इन्द्रको जिस प्रकार प्रजापतिने समझाया था उसी क्रमसे 'तू देह और इन्द्रियोंके धर्मवाला नहीं है, बल्कि वह सत् ही तू है' इस प्रकार समझाया हुआ वह यह सम्प्रसाद-जीव आकाशसे वायु आदिके समान इस शरीरसे समुत्थान कर देहादिसे विलक्षण आत्मस्वरूपको जानकर अर्थात् देहात्मभावनाको त्यागकर अपने स्वाभाविक सत्त्वरूपसे ही स्थित हो जाता है—इस प्रकार पहले इसकी व्याख्या की जा चुकी है। <br><br> वह सम्प्रसाद अपने जिस स्वाभाविक रूपसे स्थित होता है—जिस प्रकार विवेक होनेसे पूर्व भ्रान्तिके कारण रज्जु सर्प हो जाती है और फिर प्रकाश होनेपर वह अपने स्वाभाविक रज्जुरूपसे स्थित |

९२६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

९२६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८


| ष्पद्यते । एवं च स उत्तमपुरुष उत्तमश्चासौ पुरुषश्चेत्युत्तमपुरुषः स एवोत्तमपुरुषोऽक्षिखप्नपुरुषौ व्यक्ताव्यक्तञ्च सुषुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नोऽशरीरश्च स्वेन रूपेणेति । एषामेष स्वेन रूपेणावस्थितः क्षराक्षरौ व्याकृताव्याकृतावपेक्ष्योत्तमपुरुषः कृतनिर्वचनो ह्ययं गीतासु । <br><br> स सम्प्रसादः स्वेन रूपेण तत्र स्वात्मनि स्वस्थतया सर्वात्मभूतः पर्येति क्वचिदिन्द्राद्यात्मना जक्षद्धसन् भक्षयन् वा भक्ष्यानुच्चावचानीप्सितान् क्वचिन्मनोमात्रैः संकल्पादेव समुत्थितैर्ब्रह्मलोकिकैर्वा क्रीडन् स्त्र्यादिभी रममाणश्च मनसैव, नोपजनम्, स्त्रीपुंसयोर- | हो जाती है उसी प्रकार वह उत्तम पुरुष—जो उत्तम हो और पुरुष हो उसे उत्तम पुरुष कहते हैं । अक्षिपुरुष और स्वप्नपुरुष ये दोनों व्यक्त हैं, किंतु सुषुप्तपुरुष अपने स्वाभाविक रूपमें स्थित होकर सम्यक् प्रकारसे लीन, सम्प्रसन्न, अव्यक्त तथा अशरीर है । इनमें व्यक्त और अव्यक्त जो क्षर और अक्षर पुरुष हैं उनकी अपेक्षा यह अपने स्वाभाविक रूपमें स्थित हुआ पुरुष उत्तम है । इसका निरूपण गीतामें किया है । <br><br> वह सम्प्रसाद अपने स्वाभाविक रूपसे—स्वयं स्वात्मामें स्थित हुआ आत्मनिष्ठ होनेके कारण सबका अन्तरात्मभूत होकर सब ओर संचार करता है । कभी इन्द्रादि रूपसे 'जक्षत्'—हँसता अथवा मनोवाञ्छित बढ़िया-घटिया भोजन-सामग्रियोंको भक्षण करता हुआ, कभी मनोमात्र अर्थात् केवल संकल्पसे ही उत्पन्न हुए अथवा ब्रह्मलोक-सम्बन्धी भोगोंके साथ क्रीडा करता और स्त्री आदिके साथ मनके ही द्वारा रमण करता हुआ उपजनको—जो स्त्री-पुरुषोंके पारस्परिक सहगमनसे उत्पन्न होता है अथवा |

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थं ९२७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
न्योन्योपगमेन जायत इत्युपजनमात्मभावेन वात्मसामीप्येन जायत इत्युपजनमिदं शरीरं तन्न स्मरन् । तत्स्मरणे हि दुःखमेव स्यात्; दुःखात्मकत्वात्तस्य ।आत्मरूपसे या अपनी समीपतासे उत्पन्न होता है ऐसे इस शरीरका नाम 'उपजन' है—इसे स्मरण न करता हुआ सब ओर संचार करता है ], क्योंकि उसका स्मरण करनेसे तो दुःख ही होगा, कारण वह दुःखात्मक है ।
नन्वनुभूतं चेन्न स्मरेदसर्वज्ञत्वं मुक्तस्य ।शङ्का—यदि वह अनुभूत शरीरका स्मरण नहीं करता तब तो मुक्त पुरुषकी असर्वज्ञता सिद्ध होती है ।
नैष दोषः; येन मिथ्याज्ञानादिना जनितं तच्च मिथ्याज्ञानादि विद्ययोच्छेदितमतस्तन्नानुभूतमेवेति न तदस्मरणे सर्वज्ञत्वहानिः । न ह्युन्मत्तेन ग्रहगृहीतेन वा यदनुभूतं तदुन्मादाद्यपगमेऽपि स्मर्त्तव्यं स्यात्तथेहापि संसारिभिरविद्यादोषवद्भैर्यदनुभूयते तत्सर्वात्मानमशरीरं नसमाधान—यहाँ यह दोष नहीं है । जिस मिथ्याज्ञानादिके द्वारा उस शरीरकी उत्पत्ति हुई थी वह मिथ्याज्ञानादि ज्ञानसे उच्छिन्न हो गये; इसलिये अब उस शरीरका अनुभव नहीं होता, अतः उसका स्मरण न करनेमें सर्वज्ञताकी हानि नहीं हो सकती । जो वस्तु उन्मत्त या ग्रहग्रस्त पुरुषको अनुभव होती थी उसे उन्मादादिकी निवृत्ति होनेपर भी स्मरण करना चाहिये—ऐसी बात नहीं है । इसी प्रकार इस प्रसङ्गमें भी जो शरीर अविद्यारूप दोषवाले संसारियोंद्वारा अनुभव किया जाता है वह अशरीरी सर्वात्माको स्पर्श नहीं करता, क्योंकि

९२८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

९२८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| स्पृशति; अविद्यानिमित्ताभावात्। | उसमें उसके अविद्यारूप निमित्तका अभाव है। | | ये तूच्छिन्नदोषैर्मृदितकषायैर्मानसाः सत्याः कामा अनृतापिधाना अनुभूयन्ते विद्याभिव्यङ्ग्यत्वात्, त एवं मुक्तेन सर्वात्मभूतेन सम्बध्यन्त इत्यात्मज्ञानस्तुतये निर्दिश्यन्तेऽतः साध्वेवद्विशिनष्टि—‘य एते ब्रह्मलोके’ इति । यत्र क्वचन भवन्तोऽपि ब्रह्मण्येव हि ते लोके भवन्तीति सर्वात्मत्वाद्ब्रह्मण उच्यन्ते । | किंतु जिनके दोष नष्ट हो गये हैं और राग-द्वेषादि कषाय क्षीण हो गये हैं उन रुपोंद्वारा, मिथ्या विषयाभिनिवेशरूप अनृतके कारण अज्ञानियोंके अनुभवमें न आनेवाले जिन मानस सत्य भोगोंका अनुभव किया जाता है वे विद्याद्वारा अभिव्यक्त होनेवाले होनेके कारण इस प्रकार उपर्युक्त सर्वात्मभूत विद्वान्‌से सम्बन्धित हैं; इसीसे आत्मज्ञानकी स्तुतिके लिये उनका निर्देश किया जाता है। अतः ‘य एते ब्रह्मलोके’ ऐसा जो निर्देश किया गया है वह ठीक ही है, क्योंकि ब्रह्म सर्वात्मक है, अतः वे कहीं भी रहें तथापि ब्रह्मलोकमें ही हैं—इस प्रकार कहे जाते हैं। | | ननु कथमेकः सन्नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा[कामांश्च ब्राह्मलौकिकान् पश्यन्रमत इति च विरुद्धम्। यथैको यस्मिन्नेव क्षणे | शङ्का—किंतु ‘वह एक होता हुआ न तो अन्य कुछ देखता है, न अन्य कुछ सुनता है और न अन्य कुछ जानता है’ ‘वह भूमा है’ और ‘वह ब्रह्मलोकसम्बन्धी भोगोंको देखता हुआ रमण करता है’ ये दोनों कथन तो परस्परविरुद्ध हैं, जिस प्रकार यह कहा जाय कि एक पुरुष |

खण्ड १२ ]शाङ्करभाष्यार्थ९१९
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
पश्यति स तस्मिन्नेव क्षणे न पश्यति ।जिस क्षणमें देखता है उसी क्षणमें नहीं भी देखता ।
नैष दोषः; श्रुत्यन्तरे परिहृतत्वात्। द्रष्टुर्दृष्टेरविपरिलोपात्पश्यन्नेव भवति; द्रष्टुरन्यत्वेन कामानांमभावान्न पश्यति चेति। यद्यपि सुषुप्ते तदुक्तं मुक्तस्यापि सर्वैकत्वात्समानो द्वितीयाभावः। 'केन कं पश्येत्' इति चोक्तमेव।**समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि एक अन्य श्रुतिमें इसका निराकरण कर दिया गया है। द्रष्टाकी दृष्टिका विपरिलोप न होनेके कारण वह देखता ही रहता है और द्रष्टासे भिन्न भोगोंका अभाव होनेके कारण वह नहीं भी देखता। यद्यपि सुषुप्तिमें वह (द्वैताभाव) बतलाया गया है तथापि मुक्तके लिये भी सब कुछ एकरूप होनेके कारण समानरूपसे द्वैताभाव है। इस विषयमें 'किसके द्वारा क्या देखे' ऐसा कहा ही गया है।
अशरीरस्वरूपोऽपहतपाप्मादिलक्षणः सन् कथमेष पुरुषोऽक्षिणि दृश्यत इत्युक्तः प्रजापतिना ? तत्र यथासावक्षिणि साक्षाद्दृश्यते तद्वक्तव्यमितीदमारभ्यते । तत्र को हेतुरक्षिणि दर्शन इत्याह—यह पुरुष अशरीररूप और अपहतपाप्मादि लक्षणोंवाला होनेपर भी नेत्रमें दिखलायी देता है—ऐसा प्रजापतिने क्यों कहा ? ऐसी शङ्का होनेपर जिस प्रकार यह नेत्रमें साक्षात् दिखलायी देता है वह बतलाना चाहिये—इसीसे यह (आगेका वक्तव्य) आरम्भ किया जाता है। नेत्रके भीतर उसके दिखलायी देनेमें क्या कारण है, सो श्रुति बतलाती है—

९३० | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ८

९३०छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय ८
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
स दृष्टान्तो यथा प्रयोग्यः प्रयोग्यपरो वा सशब्दः। प्रयुज्यत इति प्रयोग्योऽश्वो बलीवर्दो वा। यथा लोक आचरत्यनेनेत्याचरणो रथोऽनो वा तस्मिन्नाचरणे युक्तस्तदाकर्षणाय। एवमस्मिञ्छरीरे रथस्थानीये प्राणः पञ्चवृत्तिरिन्द्रियमनोबुद्धिसंयुक्तः प्रज्ञात्मा विज्ञानक्रियाशक्तिद्वयसंमूर्च्छितात्मा युक्तः स्वकर्मफलोपभोगनिमित्तं नियुक्तः। 'कस्मिन्वहमूत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामि' इतीश्वरेण राजेव सर्वाधिकारी दर्शनश्रवणचेष्टान्यापारेऽधिकृतः। तस्यैव तु मात्रैकदेशश्चक्षुरिन्द्रियं रूपोपलब्धिद्वारभूतम्॥ ३॥वह दृष्टान्त यों है, जिस प्रकार प्रयोग्य अथवा 'स यथा प्रयोग्यः' इस पदसमूहमें 'सः' शब्द प्रयोग्यपरक है। जो प्रयुक्त होता है वह अश्व या वृषभ प्रयोग्य कहलाता है। वह जिस प्रकार लोकमें—जिसके द्वारा सब ओर जाते हैं वह रथ या गाड़ी आचरण कहलाता है उस आचरणमें उसे खींचनेके लिये [अश्व या वृषभ ] जुता रहता है, इसी प्रकार इस रथस्थानीय शरीरमें पाँच वृत्तियोंवाला प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धिसे संयुक्त हुआ प्रज्ञात्मा विज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति इन दो शक्तियोंसे संयुक्त है, अर्थात् अपने कर्मफलके उपभोगके लिये नियुक्त है। 'किसके उत्क्रमण करनेपर मैं उत्क्रमण करूँगा और किसके स्थित होनेपर मैं स्थित रहूँगा' इस श्रुतिके अनुसार, राजा जिस प्रकार सर्वाधिकारीको नियुक्त करता है उसी प्रकार ईश्वरने दर्शन, श्रवण और चेष्टा आदि व्यापारमें प्राणको अधिकारी बनाया है। रूपकी उपलब्धिका द्वारभूत चक्षु इन्द्रिय उसीकी मात्रा अर्थात् एक देश है॥ ३॥

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९११


अथ यत्रैतदाकाशमनुविषष्णं चक्षुः स चाक्षुषः पुरुषो दर्शनाय चक्षुरथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा गन्धाय घ्राणमथ यो वेदेदमभिव्याहराणीति स आत्माभिव्याहाराय वागथ यो वेदेदँशृणवानोति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम् ॥ ४ ॥

जिसमें यह चक्षुद्वारा उपलक्षित आकाश अनुगत है वह चाक्षुष पुरुष है; उसके रूपग्रहणके लिये नेत्रेन्द्रिय है। जो ऐसा अनुभव करता है कि मैं इसे सूँघूँ वह आत्मा है; उसके गन्धग्रहणके लिये नासिका है और जो ऐसा समझता है कि मैं यह शब्द बोलूँ वही आत्मा है; उसके शब्दोच्चारणके लिये वागिन्द्रिय है तथा जो ऐसा जानता है कि मैं यह श्रवण करूँ, वह भी आत्मा है, श्रवण करनेके लिये श्रोत्रेन्द्रिय है ॥ ४ ॥


भाष्यम्भाष्यार्थ
अथ यत्र कृष्णतारोपलक्षित-<br>माकाशं देहच्छिद्रमनुविषष्णम-<br>नुषक्तमनुगतं तत्र स प्रकृतो-<br>ऽशरीर आत्मा चाक्षुषश्चक्षुषि भव<br>इति चाक्षुषस्तस्य दर्शनाय रूपो-<br>पलब्धये चक्षुः करणम्; यस्य तद्दे-<br>हादिभिः संहतत्वात्परस्य द्रष्टुरर्थे,<br>सोऽत्र चक्षुषि दर्शनेन लिङ्गेन<br>दृश्यते परोऽशरीरोऽसंहतः।जहाँ (जिस जाग्रदवस्था में) यह कृष्णतारोपलक्षित आकाश देहान्तर्वर्ती छिद्रमें अनुविषष्ण—अनुषक्त अर्थात् अनुगत है उस अवस्थामें यह प्रकृत अशरीर आत्मा चाक्षुष—चक्षुमें रहनेवाला है इसलिये चाक्षुष है। उसके देखने—रूपोपलब्धि करनेके लिये चक्षु करण है। देहादिसे संहत होनेके कारण जिसपर द्रष्टाके लिये चक्षु यह करण है वह पर अशरीर आत्मा इस नेत्रके अन्तर्गत दर्शनरूप लिङ्गसे उससे असंहत देखा जाता

छा० उ० ३०—

९३२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

| 'अक्षिणि दृश्यते' इति प्रजापतिनोक्तं सर्वेन्द्रियद्वारोपलक्षणार्थम्; सर्वविषयोपलब्धा हि स एवेति। स्फुटोपलब्धिहेतुत्वात्तु 'अक्षिणि' इति विशेषवचनं सर्वश्रुतिषु "अहमदर्शमिति तत्सत्यं भवति" इति च श्रुतेः। | है। 'नेत्रके अन्तर्गत दिखलायी देता है' यह बात प्रजापतिने सम्पूर्ण इन्द्रियरूप द्वारोंके उपलक्षणके लिये कही है। तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण विषयोंको उपलब्ध करनेवाला वही है। चक्षु इन्द्रिय स्फुट उपलब्धिका कारण है, इसलिये समस्त श्रुतियोंमें 'अक्षिणि' यह विशेष वचन है। "मैंने देखा है, इसलिये यह सत्य है" इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है। | | अथापि योऽस्मिन्देहे वेद कथम् ? इदं सुगन्धि दुर्गन्धि वा जिघ्राणीत्यस्य गन्धं विजानीयामिति स आत्मा तस्य गन्धाय गन्धविज्ञानाय घ्राणम्। अथ यो वेदेदं वचनमभिव्याहराणीति वदिष्यामीति स आत्माभिव्याहरणक्रियासिद्धये करणं वागिन्द्रियम्। अथ यो वेदेदं शृणवानीति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम् ॥ ४ ॥ | तथा इस शरीरमें जो यह जानता है—किस प्रकार जानता है?—मैं यह सुगन्धि या दुर्गन्धि सूँघूँ अर्थात् इसकी गन्ध जानूँ—ऐसा जो जानता है वह आत्मा है। उसके गन्ध अर्थात् गन्धज्ञानके लिये घ्राण है। और जो ऐसा जानता है कि मैं यह वचन उच्चारण करूँ अर्थात् बोलूँ वह आत्मा है; उसकी शब्दोच्चारणक्रियाकी सिद्धिके लिये वाक् इन्द्रिय करण है। तथा जो यह जानता है कि मैं यह श्रवण करूँ वह आत्मा है; उसके शब्दश्रवणके लिये श्रोत्रेन्द्रिय है॥ ४॥ |


१. स्फुटोपलब्धिमें चक्षुका हेतुत्व।

खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ [९३३


अथ यो वेदेदं मन्वानीति स आत्मा मनोऽस्य दैवं चक्षुः स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान्कामान्पश्यन्रमते ॥ ५ ॥

और जो यह जानता है कि मैं मनन करूँ वह आत्मा है। मन उसका दिव्य नेत्र है; वह यह आत्मा इस दिव्य चक्षुके द्वारा भोगोंको देखता हुआ रमण करता है ॥ ५ ॥

अथ यो वेदेदं मन्वानीति मननव्यापारमिन्द्रियासंस्पृष्टं केवलं मन्वानीति वेद स आत्मा मननाय मनः। 'यो वेद स आत्मा' इत्येवं सर्वत्र प्रयोगाद्वेदनमस्य स्वरूपमित्यवगम्यते। यथा 'यः पुरस्तात्प्रकाशयति स आदित्यो यो दक्षिणतो यः पश्चाद्य उत्तरतो य ऊर्ध्वं प्रकाशयति स आदित्यः' इत्युक्ते प्रकाशस्वरूपः स इति गम्यते।और जो यह जानता है कि मैं इसका मनन करूँ अर्थात् बाह्य इन्द्रियोंसे असंस्पृष्ट केवल मनन व्यापार करूँ वह आत्मा है; उसके मनन करनेके लिये मन करण है। 'जो जानता है वह आत्मा है' इस प्रकार ही सर्वत्र प्रयोग होनेके कारण यह विदित होता है कि ज्ञान ही इसका स्वरूप है; जिस प्रकार कि 'जो पूर्वसे प्रकाश करता है वह सूर्य है तथा जो दक्षिणसे, जो पश्चिमसे, जो उत्तरसे और जो ऊपरकी ओर प्रकाश करता है वह सूर्य है' ऐसा कहे जानेपर यह ज्ञात होता है कि सूर्य प्रकाशस्वरूप है।
दर्शनादिक्रियानिर्वृत्त्यर्थानि तु चक्षुरादिकरणानि। इदं चास्यात्मनः सामर्थ्यादवगम्यते।नेत्रादि जो इन्द्रियाँ हैं वे दर्शनादि क्रियाकी निष्पत्तिके लिये हैं—यह बात इस आत्माकी सामर्थ्यसे विदित होती है। आत्मा-

९३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

९३४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| आत्मनः सत्तामात्र एव ज्ञानकर्तृत्वं न तु व्यापृततया। यथा सवितुः सत्तामात्रमेव प्रकाशनकर्तृत्वं न तु व्यापृततयेति, तद्वत्। <br><br> मनोऽस्यात्मनो दैवमप्राकृतमितरेन्द्रियैरसाधारणं चक्षुश्चष्टे पश्यत्यनेनेति चक्षुः। वर्तमानकालविषयाणि चेन्द्रियाण्यतोऽदैवानि तानि। मनस्तु त्रिकालविषयोपलब्धिकरणं मृदितदोषं च सूक्ष्मव्यवहितादिसर्वोपलब्धिकरणं चेति दैवं चक्षुरुच्यते। <br><br> स वै मुक्तः स्वरूपापन्नोऽविद्याकृतदेहेन्द्रियमनोवियुक्तः सर्वात्मभावमापन्नः सन्नेषः व्योमवद्विशुद्धः सर्वेश्वरो मनउपाधिः सन्नेतेनैवेश्वरेण मनसैतान्कामान्सवितृप्रकाशवन्नित्यप्रततेन दर्शनेन पश्यन्रमते ॥ ५ ॥ | का जो ज्ञानकर्तृत्व है वह केवल सत्तामात्रमें है, उसकी व्याप्तताके कारण नहीं है। जिस प्रकार सूर्यका प्रकाशन-कर्तृत्व उसकी सत्तामात्रमें ही है किसी व्यापारप्रवणताके कारण नहीं है, इसी प्रकार इसे समझना चाहिये। <br><br> मन इस आत्माका दैव—अप्राकृत अर्थात् अन्य इन्द्रियोंसे असाधारण चक्षु है; 'चष्टे अनेन'—जिससे देखता है उसे चक्षु कहते हैं। इन्द्रियाँ वर्तमानकालविषयक हैं, इसलिये वे अदेव हैं; किंतु मन तीनों कालोंके विषयोंकी उपलब्धिका करण, क्षीणदोष और सूक्ष्म एवं व्यवहित सभी पदार्थोंकी उपलब्धिका साधन है, इसलिये वह दैव चक्षु कहा जाता है। तथा वह आत्मा स्वरूपस्थित होनेपर मुक्त तथा अविद्याकृत देह, इन्द्रिय और मनसे वियुक्त है, सर्वात्मभावको प्राप्त होनेपर वह आकाशके समान विशुद्ध और सर्वेश्वर है तथा मनरूप उपाधिवाला होनेपर वही इस इन्द्रियोंके स्वामी मनसे ही सूर्यके प्रकाशके समान अपनी नित्य प्रसृत दृष्टिसे इन भोगोंको देखता हुआ रमण करता है ॥ ५ ॥ |

—: ० :—

खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ ९३५


कान्कामानिति विशिनष्टि ।किन भोगोंको देखता है ? इसपर श्रुति उनका विशेषण बतलाती है।

य एते ब्रह्मलोके तं वा एतं देवा आत्मानमुपासते तस्मात्तेषाग्ँ सर्वे च लोका आप्ताः सर्वे च कामाः स सर्वाग्ँश्च लोकानाप्नोति सर्वाग्ँश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच प्रजापतिरुवाच ॥ ६ ॥

जो ये भोग इस ब्रह्मलोकमें हैं उन्हें देखता हुआ रमण करता है। उस आत्माकी देवगण उपासना करते हैं। इसीसे उन्हें सम्पूर्ण लोक और समस्त भोग प्राप्त हैं। जो उस आत्माको शास्त्र और आचार्यके उपदेशानुसार जानकर साक्षात् रूपसे अनुभव करता है वह सम्पूर्ण लोक और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है। ऐसा प्रजापतिने कहा, प्रजापतिने कहा ॥ ६ ॥

य एते ब्रह्मणि लोके हिरण्यनिधिवद्बाह्यविषयासङ्गानृतेनापिहिताः संकल्पमात्रलभ्यास्तानीत्यर्थः। यस्मादेष इन्द्राय प्रजापतिनोक्त आत्मा तस्मात्ततः श्रुत्वा तमात्मानमद्यत्वेऽपि देवा उपासते। तदुपासनाच्च तेषां सर्वे च लोका आप्ताः प्राप्ताः सर्वे च कामाः। यदर्थं हीन्द्रजो ये भोग सुवर्णकी निधिके समान ब्रह्मलोकमें बाह्य विषयोंकी आसक्तिरूप अनृतसे आच्छादित हैं अर्थात् केवल संकल्पमात्रसे प्राप्त होनेयोग्य हैं, उन्हें वह देखता है। क्योंकि इस आत्माका प्रजापतिने इन्द्रको उपदेश किया है इसलिये उनसे श्रवण कर आज भी देवगण उसकी उपासना करते हैं। उसकी उपासनासे उन्हें सारे लोक और समस्त भोग प्राप्त हैं। तात्पर्य यह

९३६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

९३६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

| एकशतं वर्षाणि प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवास तत्फलं प्राप्तं देवैरित्यभिप्रायः ।<br><br>तद्युक्तं देवानां महाभाग्यत्वान्न त्विदानीं मनुष्याणामल्पजीवितत्वान्मन्दतरप्रज्ञत्वाच्च सम्भवतीति प्राप्त इदमुच्यते—स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामानिदानींतनोऽपि; कोऽसौ ? इन्द्रादिवद्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह सामान्येन किल प्रजापतिरुवाच । अतः सर्वेषामात्मज्ञानं तत्फलप्राप्तिश्च तुल्यैव भवतीत्यर्थः । द्विर्वचनं प्रकरणसमाप्त्यर्थम् ॥ ६ ॥ | है कि जिसके लिये इन्द्रने प्रजापतिके यहाँ एक सौ एक वर्ष ब्रह्मचर्यवास किया था वह फल देवताओंको प्राप्त हो गया ।<br><br>देवता महान् भाग्यशाली हैं, अतः उनके लिये वह (सम्पूर्ण लोक और समस्त भोगोंकी प्राप्ति होनी ) उचित ही है, किंतु इस समय मनुष्योंको तो उनका मिलना सम्भव नहीं हैं; क्योंकि वे अल्पजीवी और मन्दतर बुद्धिवाले हैं—ऐसी शङ्का प्राप्त होनेपर यह कहा जाता है—वह वर्तमानकालीन साधक भी सम्पूर्ण लोक और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है । वह कौन ? जो इन्द्रादिके समान उस आत्माको जानकर साक्षात् अनुभव कर लेता है—इस प्रकार सामान्यरूपसे ( सभीके लिये ) प्रजापतिने कहा । अतः आत्मज्ञान और उसके फलकी प्राप्ति सभीके लिये समान है—ऐसा इसका तात्पर्य है । 'प्रजापतिरुवाच' इसकी द्विरुक्ति प्रकरणकी समाप्तिके लिये है ॥ ६ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषद्व्यष्टमाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥

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त्रयोदश खण्ड

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‘श्यामाच्छबलम्’ इस मन्त्रका उपदेश

श्यामाच्छबलं प्रपद्ये शबलाच्छ्यामं प्रपद्येऽश्व इव रोमाणि विधूय पापं चन्द्र इव राहोर्मुखात्प्रमुच्य धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभिसम्भवामीत्यभिसम्भवामीति ॥ १ ॥

मैं श्याम (हृदयस्थ) ब्रह्मसे शबल ब्रह्मलोक प्राप्त होऊँ और शबलसे श्यामको प्राप्त होऊँ। अश्व जिस प्रकार रोएँ झाड़कर निर्मल हो जाता है उसी प्रकार मैं पापोंको झाड़कर तथा राहुके मुखसे निकले हुए चन्द्रमाके समान शरीरको त्यागकर कृतकृत्य हो अकृत (नित्य) ब्रह्मलोकको प्राप्त होता हूँ, ब्रह्मलोकको प्राप्त होता हूँ ॥ १ ॥

श्यामाच्छबलं प्रपद्य इत्यादि-‘श्यामाच्छबलं प्रपद्ये’ इत्यादि
मन्त्राम्नायः पावनो जपार्थश्चमन्त्र पवित्र करनेवाला है और
ध्यानार्थो वा । श्यामो गम्भीरोयह जप अथवा ध्यानके लिये है।
वर्णः श्याम इव श्यामो हार्दंश्याम यह गम्भीर वर्ण है। हृदयस्थ
ब्रह्मात्यन्तदुरवगाह्यत्वात्तद्धार्दंब्रह्म अत्यन्त दुर्गम होनेके कारण
ब्रह्म ज्ञात्वा ध्यानेन तस्माच्छ्या-श्याम वर्णके समान श्याम है, उस
माच्छबलं शबल इव शबलोऽर-हृदयस्थ ब्रह्मको जानकर ध्यानके
ण्याद्यनेककाममिश्रत्वाद्व्रह्मलो-द्वारा उस श्याम ब्रह्मसे शबल
ब्रह्मको—जो शबलके समान शबल
है, क्योंकि ब्रह्मलोक अरण्यादि
अनेक कामनाओंसे युक्त है इसलिये

९३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

९३८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| कस्य शाबल्यम्, तं ब्रह्मलोकं शबलं प्रपद्ये मनसा शरीरपातादूर्ध्वं गच्छेयम् । यस्मादहं शबलाद्ब्रह्मलोकान्नामरूपव्याकरणाय श्यामं प्रपद्ये हार्दंभावं प्रपन्नोऽस्मीत्यभिप्रायः । अतस्तमेव प्रकृतिस्वरूपमात्मानं शबलं प्रपद्य इत्यर्थः । | उसकी शबलता है, उस शबल ब्रह्मलोकको मनसे—शरीरपातके पश्चात् प्राप्त होऊँ—जाऊँ, क्योंकि मैं नाम-रूपकी अभिव्यक्तिके लिये शबल ब्रह्मलोकसे श्याम—हार्द-भावको प्राप्त हुआ हूँ, ऐसा इसका अभिप्राय है । अतः तात्पर्य यह है कि मैं उस अपने प्रकृतिस्वरूप शबल आत्माको प्राप्त होऊँ । | | कथं शबलं ब्रह्मलोकं प्रपद्ये ? इत्युच्यते—अश्व इव स्वानि लोमानि विधूय कम्पनेन श्रमं पांस्वादि च रोमतोऽपनीय यथा निर्मलो भवत्येवं हार्दब्रह्मज्ञानेन विधूय पापं धर्माधर्माख्यं चन्द्र इव च राहुग्रस्तस्तस्माद्राहोर्मुखात्प्रमुच्य भास्वरा भवति यथा—एव धूत्वा प्रहाय शरीरं सर्वानर्थाश्रयमिहैव ध्यानेन कृतात्मा कृतकृत्यः सन्नकृतं नित्यं ब्रह्मलोकमभिसम्भवामीति । द्विर्वचनं मन्त्रसमाप्त्यर्थम् ॥ १ ॥ | मैं शबल ब्रह्मलोकको कैसे प्राप्त हो सकता हूँ ? सो बतलाया जाता है—जिस प्रकार अश्व अपने रोएँ हिलाकर अर्थात् रोम-कम्पनके द्वारा श्रम और धूलि आदि दूर करके जैसे निर्मल हो जाता है उसी प्रकार हार्दब्रह्मके ज्ञानसे धर्माधर्म-रूप पापको झाड़कर तथा राहुग्रस्त चन्द्रमाके समान जिस प्रकार कि वह राहुके मुखसे निकलकर प्रकाशमान हो जाता है उसी प्रकार सम्पूर्ण अनर्थोंके आश्रयभूत शरीरको त्याग-कर इस लोकमें ही ध्यानद्वारा कृतात्मा—कृतकृत्य हो अकृत—नित्य ब्रह्मलोकको प्राप्त होता हूँ । 'ब्रह्मलोकमभिसम्भवामि' इसकी द्विरुक्ति मन्त्रकी समाप्तिके लिये है ॥ १ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदष्टमाध्याये त्रयोदश-
खण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥

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चतुर्दश खण्ड


कारणरूपसे आकाशसंज्ञक ब्रह्मका उपदेश

आकाशो वा इत्यादि ब्रह्मणो लक्षणनिर्देशार्थम् आध्यानाय।'आकाशो वै' इत्यादि श्रुति उत्तम प्रकारसे ध्यान करनेके निमित्त ब्रह्मका लक्षण निर्देश करनेके लिये है।

आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतꣴ स आत्मा प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानां यशो राज्ञां यशो विशां यशोऽहमनुप्रापत्सि स हाहं यशसां यशः इयेतमदत्कमदत्कꣳश्येतं लिन्दु माभिगां लिन्दु माभिगाम् ॥ १ ॥

आकाश नामसे प्रसिद्ध आत्मा नाम और रूपका निर्वाह करनेवाला है। वे (नाम और रूप) जिसके अन्तर्गत हैं वह ब्रह्म है, वह अमृत है, वही आत्मा है। मैं प्रजापतिके सभागृहको प्राप्त होता हूँ; मैं यशःसंज्ञक आत्मा हूँ; मैं ब्राह्मणोंके यश, क्षत्रियोंके यश और वैश्योंके यश (यशःस्वरूप आत्मा) को प्राप्त होना चाहता हूँ; वह मैं यशोंका यश हूँ; मैं बिना दाँतोंके भक्षण करनेवाले रोहित वर्ण पिच्छिल स्त्री-चिह्नको प्राप्त न होऊँ, प्राप्त न होऊँ ॥ १ ॥

आकाशो वै नाम श्रुतिषु प्रसिद्ध आत्मा; आकाश इवाशरीरत्वात्सूक्ष्मत्वाच्च । स'आकाश' इस नामसे श्रुतियोंमें आत्मा प्रसिद्ध है, क्योंकि वह आकाशके समान अशरीर और सूक्ष्म है। वह आकाश (आकाश-

छा० उ० ३१–

९४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

९४०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
चाकाशो नामरूपयोः स्वात्मस्थयोर्जगद्बीजभूतयोः सलिलस्येव फेनस्थानीययोर्निर्वहिता निर्वोढा व्याकर्ता। ते नामरूपे यदन्तरा यस्य ब्रह्मणोऽन्तरा मध्ये वर्तेते तयोर्वा नामरूपयोरन्तरा मध्ये यन्नामरूपाभ्यामस्पृष्टं यदित्येतत्तद्ब्रह्म नामरूपविलक्षणं नामरूपाभ्यामस्पृष्टं तथापि तयोर्निर्वोढ्रेवंलक्षणं ब्रह्मेत्यर्थः। इदमेव मैत्रेयीब्राह्मणेनोक्तं चिन्मात्रानुगमात्सर्वत्र चित्स्वरूपतैवेति गम्यत एकवाक्यता।संज्ञक आत्मा) जलके फेनस्थानीय अपनेमें स्थित नाम और रूपका निर्वहिता—निर्वाह करनेवाला अर्थात् उन्हें व्यक्त करनेवाला है। वे नाम और रूप जिसके अन्तर्गत हैं अर्थात् जिस ब्रह्मके अन्तरा—मध्यमें वर्तमान हैं, अथवा जो उन नाम और रूपके अन्तरा—मध्यमें है और उन नाम और रूपसे असंस्पृष्ट है; तात्पर्य यह है कि वह ब्रह्म नाम-रूपसे विलक्षण और नाम रूपसे असंस्पृष्ट है, तो भी उनका निर्वाह करनेवाला है; अर्थात् ब्रह्म ऐसे लक्षणोंवाला है। यही बात [बृहदारण्यकान्तर्गत] मैत्रेयीब्राह्मणमें कही गयी है कि सर्वत्र चिन्मात्रकी अनुगति होनेके कारण सबकी चिद्रूपता है—इस प्रकार इन वाक्योंकी एकवाक्यता ज्ञात होती है।
कथं तदवगम्यते? इत्याह—स आत्मा। आत्मा हि नाम सर्वजन्तूनां प्रत्यक्चेतनः स्वसंवेद्यः प्रसिद्धस्तेनैव स्वरूपेणानीयाशरीरा व्योमवत्सर्वगत आत्मायह बात कैसे ज्ञात होती है? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती है—'स आत्मा'—आत्मा सम्पूर्ण जीवोंका प्रत्यक्चेतन और स्वसंवेद्य प्रसिद्ध है; उसी रूपसे उन्नयन (ऊहा) करके वह अशरीर और आकाशके समान सर्वगत आत्मा

खण्ड १४] शाङ्करभाष्यार्थ ९४१


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
ब्रह्मेत्यवगन्तव्यम् । तच्चात्मा ब्रह्मामृतममरणधर्मा ।ही ब्रह्म है—ऐसा जानना चाहिये। वह आत्मरूप ब्रह्म अमृत—अमरणधर्मा है।
अत ऊर्ध्वं मन्त्रः। प्रजापतिश्चतुर्मुखस्तस्य सभां वेश्म प्रभुविमितं वेश्म प्रपद्ये गच्छेयम् । किञ्च यशोऽहं यशो नामात्माऽहं भवामि ब्राह्मणानाम् । ब्राह्मणा एव हि विशेषतस्तमुपासते ततस्तेषां यशो भवामि । तथा राज्ञां विशां च । तेऽप्यधिकृता एवेति तेषामप्यात्मा भवामि । तद्यशोऽहमनुप्रापत्स्येऽनुप्राप्तुमिच्छामि । स हाहं यशसामात्मनां देहेन्द्रियमनोबुद्धिलक्षणानामात्मा ।इसके आगे मन्त्र है—प्रजापति चतुर्मुख ब्रह्माका नाम है, उनकी सभा अर्थात् प्रभुविमितनामक गृहको मैं प्राप्त होऊँ--जाऊँ। मैं ब्राह्मणोंका यश-यशसंज्ञक आत्मा होऊँ क्योंकि ब्राह्मण ही विशेषरूपसे उसकी उपासना करते हैं; अतः मैं उनका यश होऊँ। इसी प्रकार मैं क्षत्रिय और वैश्योंका भी यश होऊँ। वे भी अधिकारी ही हैं, अतः मैं उनका भी आत्मा होऊँ। मैं उनका यश प्राप्त करना चाहता हूँ। वह मैं यशःस्वरूप आत्माओंका अर्थात् देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धिरूप आत्माओंका आत्मा हूँ।
किमर्थमहमेवं प्रपद्ये ? इत्युच्यते—श्येतं वर्णतः पक्वबदरसमं रोहितम् । तथादत्कं दन्तरहितमप्यदत्कं भक्षयितृ स्त्रीव्यञ्जनं तत्सेविनां तेजोबलवीर्यविज्ञान-मैं इस प्रकार आत्माको क्यों प्राप्त होता हूँ ? सो बतलाया जाता है—श्येत—जो रङ्गमें पके हुए बेरके समान लाल है, यथा 'अदत्क'—दन्तरहित होनेपर भी 'अदत्क' भक्षण करनेवाले स्त्रीचिह्नको; क्योंकि वह अपना सेवन करनेवालेके तेज, बल, वीर्य, विज्ञान

९४२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

९४२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८


| धर्माणामपहन्तृ विनाशयित्रीत्ये- | और धर्मका हनन अर्थात् विनाश | | तत् । यदेवंलक्षणं श्येतं लिन्दु | करनेवाला है। जो ऐसे लक्षणों- | | | वाला श्येत लिन्दु—पिच्छिल स्त्री- | | पिच्छलं तन्माभिगां माभिग- | चिह्न है उसे प्राप्त न होऊँ उसमें | | | गमन न करूँ । 'माभिगाम् | | च्छेयम् । द्विर्वचनमत्यन्तानर्थ- | माभिगाम्' यह द्विरुक्ति उसका | | | अत्यन्त अनर्थहेतुत्व प्रदर्शित | | हेतुत्वप्रदर्शनार्थम् ॥ १ ॥ | करनेके लिये है ॥ १ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये चतुर्दशखण्ड- भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥