भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 936

९३२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

| 'अक्षिणि दृश्यते' इति प्रजापतिनोक्तं सर्वेन्द्रियद्वारोपलक्षणार्थम्; सर्वविषयोपलब्धा हि स एवेति। स्फुटोपलब्धिहेतुत्वात्तु 'अक्षिणि' इति विशेषवचनं सर्वश्रुतिषु "अहमदर्शमिति तत्सत्यं भवति" इति च श्रुतेः। | है। 'नेत्रके अन्तर्गत दिखलायी देता है' यह बात प्रजापतिने सम्पूर्ण इन्द्रियरूप द्वारोंके उपलक्षणके लिये कही है। तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण विषयोंको उपलब्ध करनेवाला वही है। चक्षु इन्द्रिय स्फुट उपलब्धिका कारण है, इसलिये समस्त श्रुतियोंमें 'अक्षिणि' यह विशेष वचन है। "मैंने देखा है, इसलिये यह सत्य है" इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है। | | अथापि योऽस्मिन्देहे वेद कथम् ? इदं सुगन्धि दुर्गन्धि वा जिघ्राणीत्यस्य गन्धं विजानीयामिति स आत्मा तस्य गन्धाय गन्धविज्ञानाय घ्राणम्। अथ यो वेदेदं वचनमभिव्याहराणीति वदिष्यामीति स आत्माभिव्याहरणक्रियासिद्धये करणं वागिन्द्रियम्। अथ यो वेदेदं शृणवानीति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम् ॥ ४ ॥ | तथा इस शरीरमें जो यह जानता है—किस प्रकार जानता है?—मैं यह सुगन्धि या दुर्गन्धि सूँघूँ अर्थात् इसकी गन्ध जानूँ—ऐसा जो जानता है वह आत्मा है। उसके गन्ध अर्थात् गन्धज्ञानके लिये घ्राण है। और जो ऐसा जानता है कि मैं यह वचन उच्चारण करूँ अर्थात् बोलूँ वह आत्मा है; उसकी शब्दोच्चारणक्रियाकी सिद्धिके लिये वाक् इन्द्रिय करण है। तथा जो यह जानता है कि मैं यह श्रवण करूँ वह आत्मा है; उसके शब्दश्रवणके लिये श्रोत्रेन्द्रिय है॥ ४॥ |


१. स्फुटोपलब्धिमें चक्षुका हेतुत्व।