छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
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खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ [९३३
अथ यो वेदेदं मन्वानीति स आत्मा मनोऽस्य दैवं चक्षुः स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान्कामान्पश्यन्रमते ॥ ५ ॥
और जो यह जानता है कि मैं मनन करूँ वह आत्मा है। मन उसका दिव्य नेत्र है; वह यह आत्मा इस दिव्य चक्षुके द्वारा भोगोंको देखता हुआ रमण करता है ॥ ५ ॥
| अथ यो वेदेदं मन्वानीति मननव्यापारमिन्द्रियासंस्पृष्टं केवलं मन्वानीति वेद स आत्मा मननाय मनः। 'यो वेद स आत्मा' इत्येवं सर्वत्र प्रयोगाद्वेदनमस्य स्वरूपमित्यवगम्यते। यथा 'यः पुरस्तात्प्रकाशयति स आदित्यो यो दक्षिणतो यः पश्चाद्य उत्तरतो य ऊर्ध्वं प्रकाशयति स आदित्यः' इत्युक्ते प्रकाशस्वरूपः स इति गम्यते। | और जो यह जानता है कि मैं इसका मनन करूँ अर्थात् बाह्य इन्द्रियोंसे असंस्पृष्ट केवल मनन व्यापार करूँ वह आत्मा है; उसके मनन करनेके लिये मन करण है। 'जो जानता है वह आत्मा है' इस प्रकार ही सर्वत्र प्रयोग होनेके कारण यह विदित होता है कि ज्ञान ही इसका स्वरूप है; जिस प्रकार कि 'जो पूर्वसे प्रकाश करता है वह सूर्य है तथा जो दक्षिणसे, जो पश्चिमसे, जो उत्तरसे और जो ऊपरकी ओर प्रकाश करता है वह सूर्य है' ऐसा कहे जानेपर यह ज्ञात होता है कि सूर्य प्रकाशस्वरूप है। |
| दर्शनादिक्रियानिर्वृत्त्यर्थानि तु चक्षुरादिकरणानि। इदं चास्यात्मनः सामर्थ्यादवगम्यते। | नेत्रादि जो इन्द्रियाँ हैं वे दर्शनादि क्रियाकी निष्पत्तिके लिये हैं—यह बात इस आत्माकी सामर्थ्यसे विदित होती है। आत्मा- |