भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 933, कुल 978 में से

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पृष्ठ 933
खण्ड १२ ]शाङ्करभाष्यार्थ९१९
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
पश्यति स तस्मिन्नेव क्षणे न पश्यति ।जिस क्षणमें देखता है उसी क्षणमें नहीं भी देखता ।
नैष दोषः; श्रुत्यन्तरे परिहृतत्वात्। द्रष्टुर्दृष्टेरविपरिलोपात्पश्यन्नेव भवति; द्रष्टुरन्यत्वेन कामानांमभावान्न पश्यति चेति। यद्यपि सुषुप्ते तदुक्तं मुक्तस्यापि सर्वैकत्वात्समानो द्वितीयाभावः। 'केन कं पश्येत्' इति चोक्तमेव।**समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि एक अन्य श्रुतिमें इसका निराकरण कर दिया गया है। द्रष्टाकी दृष्टिका विपरिलोप न होनेके कारण वह देखता ही रहता है और द्रष्टासे भिन्न भोगोंका अभाव होनेके कारण वह नहीं भी देखता। यद्यपि सुषुप्तिमें वह (द्वैताभाव) बतलाया गया है तथापि मुक्तके लिये भी सब कुछ एकरूप होनेके कारण समानरूपसे द्वैताभाव है। इस विषयमें 'किसके द्वारा क्या देखे' ऐसा कहा ही गया है।
अशरीरस्वरूपोऽपहतपाप्मादिलक्षणः सन् कथमेष पुरुषोऽक्षिणि दृश्यत इत्युक्तः प्रजापतिना ? तत्र यथासावक्षिणि साक्षाद्दृश्यते तद्वक्तव्यमितीदमारभ्यते । तत्र को हेतुरक्षिणि दर्शन इत्याह—यह पुरुष अशरीररूप और अपहतपाप्मादि लक्षणोंवाला होनेपर भी नेत्रमें दिखलायी देता है—ऐसा प्रजापतिने क्यों कहा ? ऐसी शङ्का होनेपर जिस प्रकार यह नेत्रमें साक्षात् दिखलायी देता है वह बतलाना चाहिये—इसीसे यह (आगेका वक्तव्य) आरम्भ किया जाता है। नेत्रके भीतर उसके दिखलायी देनेमें क्या कारण है, सो श्रुति बतलाती है—