भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 939

खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ ९३५


कान्कामानिति विशिनष्टि ।किन भोगोंको देखता है ? इसपर श्रुति उनका विशेषण बतलाती है।

य एते ब्रह्मलोके तं वा एतं देवा आत्मानमुपासते तस्मात्तेषाग्ँ सर्वे च लोका आप्ताः सर्वे च कामाः स सर्वाग्ँश्च लोकानाप्नोति सर्वाग्ँश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच प्रजापतिरुवाच ॥ ६ ॥

जो ये भोग इस ब्रह्मलोकमें हैं उन्हें देखता हुआ रमण करता है। उस आत्माकी देवगण उपासना करते हैं। इसीसे उन्हें सम्पूर्ण लोक और समस्त भोग प्राप्त हैं। जो उस आत्माको शास्त्र और आचार्यके उपदेशानुसार जानकर साक्षात् रूपसे अनुभव करता है वह सम्पूर्ण लोक और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है। ऐसा प्रजापतिने कहा, प्रजापतिने कहा ॥ ६ ॥

य एते ब्रह्मणि लोके हिरण्यनिधिवद्बाह्यविषयासङ्गानृतेनापिहिताः संकल्पमात्रलभ्यास्तानीत्यर्थः। यस्मादेष इन्द्राय प्रजापतिनोक्त आत्मा तस्मात्ततः श्रुत्वा तमात्मानमद्यत्वेऽपि देवा उपासते। तदुपासनाच्च तेषां सर्वे च लोका आप्ताः प्राप्ताः सर्वे च कामाः। यदर्थं हीन्द्रजो ये भोग सुवर्णकी निधिके समान ब्रह्मलोकमें बाह्य विषयोंकी आसक्तिरूप अनृतसे आच्छादित हैं अर्थात् केवल संकल्पमात्रसे प्राप्त होनेयोग्य हैं, उन्हें वह देखता है। क्योंकि इस आत्माका प्रजापतिने इन्द्रको उपदेश किया है इसलिये उनसे श्रवण कर आज भी देवगण उसकी उपासना करते हैं। उसकी उपासनासे उन्हें सारे लोक और समस्त भोग प्राप्त हैं। तात्पर्य यह