भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 925

खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थे ९२१ ЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖ

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तथा विरोचनो महाप्राज्ञः प्राजापत्योऽपि देहमात्रात्मदर्शनो बभूव। तथेन्द्रस्यात्मविनाशभयसागर एव वैनाशिका न्यमज्जन्।<br><br>तथा सांख्या द्रष्टारं देहादिन्यतिरिक्तमवगम्यापि त्यक्तागमप्रमाणत्वान्मृत्युविषय एवान्यत्वदर्शने तस्थुः। तथान्ये काणादादिदर्शनाः कषायरक्तमिव क्षारादिभिर्वस्त्रं नवभिरात्मगुणैर्युक्तमात्मद्रव्यं विशोधयितुं प्रवृत्ताः। तथान्ये कर्मिणो बाह्यविषयापहृतचेतसो वेदप्रमाणा अपि परमार्थसत्यमात्मैकत्वं विनाशमिवेन्द्रवन्मन्यमाना घटीयन्त्रवदारोहावरोहप्रकारैरनिशं बम्भ्रमति किमन्ये क्षुद्रजन्तवो विवेकहीनाः स्वभावत एव बहिर्विषयापहृतचेतसः।तथा परम बुद्धिमान् और प्रजापतिका पुत्र होनेपर भी विरोचन केवल देहमात्रमें आत्मबुद्धि करनेवाला हुआ। इसी प्रकार वैनाशिक लोग इन्द्रके आत्मविनाशरूप भयके समुद्रमें डूब गये। तथा सांख्यवादी द्रष्टा (आत्मा) को देहादिसे भिन्न जानकर भी शास्त्रप्रमाणको छोड़ देनेके कारण मृत्युके विषयभूत भेददर्शनमें ही पड़े रह गये। एवं अन्य काणादादि मतावलम्बी कषायसे रँगे हुए वस्त्रको क्षारादिसे शुद्ध करनेके समान आत्माके नौ गुणोंसे युक्त आत्मद्रव्यको शुद्ध करनेमें लग गये। तथा दूसरे कर्मकाण्डी लोग बाह्य विषयोंमें आसक्तचित्त होनेके कारण वेदको प्रमाण माननेवाले होनेपर भी इन्द्रके समान परमार्थसत्य आत्मैकत्वको अपना विनाश-सा समझकर घटीयन्त्रके समान ऊपर-नीचे जाते-आते रात-दिन भटकते रहते हैं। फिर जो स्वभावसे ही बाह्य विषयोंमें आसक्तचित्त हैं उन अन्य विवेकहीन क्षुद्र जीवोंकी तो बात ही क्या है!