छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 922, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| यच्चोक्तं सम्प्रसादः शरीरात्समुत्थाय यस्मिन्स्त्र्यादिभी रममाणो भवति सोऽन्यः सम्प्रसादादधिकरणनिर्दिष्ट उत्तमः पुरुष इति, तदप्यसत्; चतुर्थेऽपि पर्याये 'एतं त्वेव ते' इति वचनात्। यदि ततोऽन्योऽभिप्रेतः स्यात्पूर्ववत् 'एतं त्वेव ते' इति न ब्रूयान्मृषा प्रजापतिः। | और ऐसा जो कहा कि सम्प्रसाद (सुषुप्तावस्थापन्न जीव) इस शरीरसे सम्यक् प्रकारसे उत्थान कर जिसमें स्त्री आदिके साथ रमण करता रहता है वह अधिकरणरूपसे निर्दिष्ट उत्तम पुरुष उससे भिन्न है—सो भी ठीक नहीं; क्योंकि चौथे पर्यायमें 'एतं त्वेव ते' ऐसा [पूर्वोक्तका परामर्श करनेवाला] निर्देश किया गया है। यदि प्रजापतिको उससे भिन्न कोई और पुरुष अभिमत होता तो वे पहलेहीके समान 'एवं त्वेव ते' ऐसा मिथ्या वचन न कहते। | | किञ्चान्यत्तेजोऽबन्नादीनां स्रष्टुः सतः स्वविकारदेहशृङ्गे प्रवेशं दर्शयित्वा प्रविष्टाय पुनस्तत्त्वमसीत्युपदेशो मृषा प्रसज्येत। तस्मिंस्त्वं स्त्र्यादिभी रन्ता भविष्यसीति युक्त उपदेशोऽभविष्यद्यदि सम्प्रसादादन्य उत्तमः पुरुषो भवेत्। तथा भूम्यहमेवे- | इसके सिवा दूसरा कारण यह भी है कि [यदि उत्तम पुरुषको पूर्वोक्त पुरुषोंसे भिन्न मानेंगे तो] तेज, अप् और अन्नादिकी रचना करनेवाले सत्का अपने विकारभूत देहमें प्रवेश दिखलाकर इस प्रकार प्रविष्ट हुए उसको जो 'तू वह है' ऐसा उपदेश किया गया है वह मिथ्या सिद्ध होगा। यदि उत्तम पुरुष सम्प्रसादसे भिन्न होता तो 'उसमें तू स्त्री आदिके साथ रमण करनेवाला होगा, ऐसा उपदेश |