भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 921, कुल 978 में से

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पृष्ठ 921

खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ ९१७


संस्कृतहिन्दी
तर्हि ? पटचित्रवज्जाग्रद्वासनाश्रया दृश्यैव धीर्भवतीति न द्रष्टुः स्वयंज्योतिष्ट्वबाधः स्यात् ।है ?—वह पटचित्रके समान जाग्रत्-वासनाओंका आश्रयभूत दृश्य ही रहता है—इसलिये उस अवस्था में द्रष्टाके स्वयंप्रकाशत्वका बाध नहीं हो सकता ।
किञ्चान्यत्, जाग्रत्स्वप्नयोर्भूतानि चात्मानं च जानातीमानि भूतान्ययमहमस्मीति प्राप्तौ सत्यां प्रतिषेधो युक्तः स्यान्नाह खल्वयमित्यादि। तथा चेतनस्यैवाविद्यानिमित्तयोः सशरीरत्वे सति प्रियाप्रिययोरपहतिर्नास्तीत्युक्त्वा तस्यैवाशरीरस्य सतो विद्यायां सत्यां स शरीरत्वे प्राप्तयोः प्रतिषेधो युक्तोऽशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशत इति । एकश्चात्मा स्वप्नबुद्धान्तयोर्महामत्स्यवदसङ्गः सञ्चरतीति श्रुत्यन्तरे सिद्धम् ।इसके सिवा दूसरा हेतु यह भी है कि जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओंमें यह भूतोंको और अपनेको 'ये भूत हैं और यह मैं हूँ' इस प्रकार जानता है—यह बात प्राप्त होनेपर ही [ सुषुप्तिमें ] यह अपनेको और भूतोंको नहीं जानता' ऐसा प्रतिषेध उचित हो सकता है ।<br><br>तथा चेतनके ही सशरीरत्वकी प्राप्ति होनेपर अविद्यानिमित्तक प्रियाप्रियका नाश नहीं होता ऐसा कहकर विद्या प्राप्त होनेपर अशरीर हुए उसीके सशरीरावस्था में प्राप्त हुए प्रियाप्रियका 'अशरीर होनेपर इसे प्रियाप्रिय स्पर्श नहीं करते' इस प्रकार प्रतिषेध करना उचित होगा। स्वप्न और जाग्रत्‌में एक ही आत्मा महामत्स्यके समान असंगरुपसे विचरता है—ऐसा एक अन्य (बृहदारण्यक) श्रुतिसे सिद्ध है ।
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