छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 920, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 920
| ९१६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| नयकारणं च स्वयं ब्रूयात् । न चोक्तं तेन मन्यामहे नाक्षिणिच्छायात्मा प्रजापतिनोपदिष्टः । | भी उन्हें स्वयं बतलाना चाहिये था। किंतु यह उन्होंने बतलाया नहीं है। इसलिये हम ऐसा मानते हैं कि प्रजापतिने नेत्रान्तर्गत छायात्माका उपदेश नहीं किया। |
| किं चान्यदक्षिणि द्रष्टा चेद्दृश्यत इत्युपदिष्टःस्यात्तत इदं युक्तम् । एतं त्वेव त इत्युक्त्वा स्वप्नेऽपि द्रष्टुरेवोपदेशः । स्वप्ने न द्रष्टोपदिष्ट इति चेन्न; अपि रोदितीवाप्रियवेत्तेवेत्युपदेशात् । न च द्रष्टुरन्यः कश्चित्स्वप्ने महीयमानश्चरति । "अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः" ( बृ० उ० ४ । ३ । ९ ) इति न्यायतः श्रुत्यन्तरे सिद्धत्वात् । | इसके सिवा दूसरी बात यह भी है कि यदि 'दृश्यते' इस क्रियापदसे नेत्रान्तर्गत द्रष्टाका ही उपदेश किया गया हो तभी यह कथन युक्त हो सकता है; 'एतं त्वेव ते' ऐसा कहकर स्वप्नमें भी द्रष्टाका ही उपदेश किया गया है। यदि कहो कि स्वप्नमें द्रष्टाका उपदेश नहीं किया गया तो यह कथन ठीक नहीं; क्योंकि 'रुदन-सा करता है, अप्रियवेत्ता-सा है' ऐसा कहा गया है। द्रष्टाके सिवा और कोई भी स्वप्नमें पूजित होता हुआ-सा नहीं विचरता; क्योंकि "इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयंप्रकाश होता है" ऐसा एक अन्य (बृहदारण्यक) श्रुतिमें युक्तिपूर्वक सिद्ध किया गया है। |
| यद्यपि स्वप्ने सधीर्भवति तथापि न धीः स्वप्नभोगोपलब्धिं प्रति करणत्वं भजते । किं | यद्यपि स्वप्नमें आत्मा 'सधी:'-अन्तःकरणसहित रहता है तो भी वह अन्तःकरण स्वप्नभोगोंकी उपलब्धिके प्रति करणत्वको प्राप्त नहीं होता। तो फिर क्या रहता |