छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 916, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| नन्वस्मिन्पक्षे 'स्त्रीभिर्वा यानैर्वा' 'स यदि पितृलोककामः' 'स एकधा भवति' इत्याद्यैश्वर्यश्रुतयोऽनुपपन्नाः । | शङ्का—किंतु ऐसा पक्ष होनेपर 'स्त्रियोंसे अथवा यानोंसे [ क्रीडा करता है ]' 'वह यदि पितृलोककी कामना करता है' 'वह एक रूप होता है' इत्यादि [ पूर्वोक्त ] ऐश्वर्यसूचक श्रुतियाँ अनुपपन्न हो जायँगी । | | न; सर्वात्मनः सर्वफलसम्बन्धोपपत्तेरविरोधात् । मृद इव सर्वघटकरककुण्डाद्याप्तिः । | समाधान—यह बात नहीं है, क्योंकि सर्वात्मा विद्वान्का किसीसे विरोध न होनेके कारण सम्पूर्ण फलोंसे सम्बन्ध हो सकता है; जिस प्रकार मृत्तिकाकी घट, कमण्डलु और कूँडा आदि सम्पूर्ण विकारोंमें प्राप्ति होती है । | | ननु सर्वात्मत्वे दुःखसम्बन्धोऽपि स्यादिति चेत् ? | शङ्का—किंतु सर्वात्मता होनेपर तो उसे दुःखका भी सम्बन्ध होगा ही ? | | न, दुःखस्याप्यात्मत्वोपगमादविरोधः । आत्मन्यविद्याकल्पनानिमित्तानि दुःखानि रज्ज्वामिव सर्पादिकल्पनानिमित्तानि । सा चाविद्याशरीरात्मैकत्वस्वरूपदर्शनेन दुःखनिमित्तोच्छिन्नेति दुःखसम्बन्धाशङ्का न सम्भवति । | समाधान—नहीं, क्योंकि दुःखके भी आत्मत्वको प्राप्त हो जानेके कारण उससे भी उसका कोई विरोध नहीं है । आत्मामें अविद्याके कारण होनेवाली कल्पनाके निमित्तसे होनेवाले दुःख रज्जुमें सर्पादि कल्पनाके कारण होनेवाले कम्पादिके समान हैं । दुःखकी निमित्तभूता वह अविद्या आत्माके अशरीरत्व और एकत्वदर्शनसे उच्छिन्न हो गयी है; इसलिये अब उसे दुःखके सम्बन्धकी आशङ्का होना सम्भव नहीं है । |