छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 917, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१३
| शुद्धसत्त्वसंकल्पनिमित्तानां तु कामानामीश्वरदेहसम्बन्धः सर्वभूतेषु मानसानाम् । पर एव सर्वसत्त्वोपाधिद्वारेण भोक्तेति सर्वाविद्याकृतसंव्यवहाराणां पर एवात्मास्पदं नान्योऽस्तीति वेदान्तसिद्धान्तः । | [ यहाँ शङ्का होती है कि जब विद्यासे अविद्या दग्ध हो जाती है तो उसके द्वारा ईश्वरमें आरोपित किया हुआ सगुणविद्याका फलभूत पूर्वोक्त ऐश्वर्य भी तो दग्ध ही हो जाता है, फिर विद्याकी स्तुतिके लिये उनका उपदेश कैसे सिद्ध हो सकता है ? उत्तर—] शुद्धसत्त्वजन्य संकल्पके कारण प्राप्त होनेवाले मनोवाञ्छित भोगरूप ऐश्वर्योंका सम्पूर्ण भूतोंमें [ केवल मनके द्वारा मायावस्थामें ] ईश्वरसे सम्बन्ध सिद्ध होता है । समस्त सत्त्वमय उपाधिके द्वारा परमात्मा ही उन ऐश्वर्योंका भोक्ता है, इसलिये सम्पूर्ण अविद्याजन्य व्यवहारोंका अधिष्ठान परमात्मा ही है, कोई दूसरा नहीं है—ऐसा वेदान्त-शास्त्रका सिद्धान्त है । | | अथैकदेशिमतम्<br>'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' इतिच्छायापुरुष एव प्रजापतिनोक्तः । स्वप्नसुषुप्तयोश्चान्य एव, न परोऽपहतपाप्मत्वादिलक्षणः, विरोधादिति केचिन्मन्यन्ते । छायाद्यात्मनां चोपदेशे प्रयोजनमाचक्षते—आदावेवोच्यमाने | यहाँ कोई-कोई ऐसा मानते हैं कि 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' इत्यादि वाक्यसे प्रजापतिने छायापुरुषका ही वर्णन किया है, तथा स्वप्न और सुषुप्तावस्थामें भी अन्य पुरुषका ही उल्लेख किया है, अपहतपाप्मत्वादिरूप परमात्माका निरूपण नहीं किया, क्योंकि इन दोनोंके लक्षणोंमें परस्पर विरोध है । छायात्मादिका उपदेश करनेमें वे यह प्रयोजन बतलाते हैं कि परमात्मा अत्यन्त दुर्विज्ञेय है, |