छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 929, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थे ९२५
| वाय्वादीनामाकाशादिसाम्यगमनवदविद्यया संसारावस्थायां शरीरसाम्यमापन्नोऽहममुष्य पुत्रो जातो जीर्णो मरिष्येत्येवं प्रकारं प्रजापतिनैव मघवान् यथोक्तेन क्रमेण नासि त्वं देहेन्द्रियादिधर्मा तत्त्वमसीति प्रतिबोधितः सन्स एष सम्प्रसादो जीवोऽस्माच्छरीरादाकाशादिव वाय्वादयः समुत्थाय देहादिविलक्षणमात्मनो रूपमवगम्य देहात्मभावनां हित्वेत्येतत्। स्वेन रूपेण सदात्मनैवाभिनिष्पद्यत इति व्याख्यातं पुरस्तात्। <br><br> स येन स्वेन रूपेण सम्प्रसादोऽभिनिष्पद्यते--प्राक्प्रतिबोधात्तद्भ्रान्तिनिमित्तात्सर्पो भवति यथा रज्जुः पश्चात्कृतप्रकाशा रज्ज्वात्मना स्वेन रूपेणाभिनि- | [ उसी प्रकार— ] वायु आदिके आकाशादिकी समताको प्राप्त होनेके समान अविद्यावश सांसारिक अवस्था में शरीरकी समताको प्राप्त हुआ, अर्थात् 'मैं इसका पुत्र हूँ, मैं उत्पन्न हुआ हूँ, जराग्रस्त हूँ, मरूँगा' इस प्रकार समझनेवाले इन्द्रको जिस प्रकार प्रजापतिने समझाया था उसी क्रमसे 'तू देह और इन्द्रियोंके धर्मवाला नहीं है, बल्कि वह सत् ही तू है' इस प्रकार समझाया हुआ वह यह सम्प्रसाद-जीव आकाशसे वायु आदिके समान इस शरीरसे समुत्थान कर देहादिसे विलक्षण आत्मस्वरूपको जानकर अर्थात् देहात्मभावनाको त्यागकर अपने स्वाभाविक सत्त्वरूपसे ही स्थित हो जाता है—इस प्रकार पहले इसकी व्याख्या की जा चुकी है। <br><br> वह सम्प्रसाद अपने जिस स्वाभाविक रूपसे स्थित होता है—जिस प्रकार विवेक होनेसे पूर्व भ्रान्तिके कारण रज्जु सर्प हो जाती है और फिर प्रकाश होनेपर वह अपने स्वाभाविक रज्जुरूपसे स्थित |