छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 931, कुल 978 में से
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खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थं ९२७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| न्योन्योपगमेन जायत इत्युपजनमात्मभावेन वात्मसामीप्येन जायत इत्युपजनमिदं शरीरं तन्न स्मरन् । तत्स्मरणे हि दुःखमेव स्यात्; दुःखात्मकत्वात्तस्य । | आत्मरूपसे या अपनी समीपतासे उत्पन्न होता है ऐसे इस शरीरका नाम 'उपजन' है—इसे स्मरण न करता हुआ सब ओर संचार करता है ], क्योंकि उसका स्मरण करनेसे तो दुःख ही होगा, कारण वह दुःखात्मक है । |
| नन्वनुभूतं चेन्न स्मरेदसर्वज्ञत्वं मुक्तस्य । | शङ्का—यदि वह अनुभूत शरीरका स्मरण नहीं करता तब तो मुक्त पुरुषकी असर्वज्ञता सिद्ध होती है । |
| नैष दोषः; येन मिथ्याज्ञानादिना जनितं तच्च मिथ्याज्ञानादि विद्ययोच्छेदितमतस्तन्नानुभूतमेवेति न तदस्मरणे सर्वज्ञत्वहानिः । न ह्युन्मत्तेन ग्रहगृहीतेन वा यदनुभूतं तदुन्मादाद्यपगमेऽपि स्मर्त्तव्यं स्यात्तथेहापि संसारिभिरविद्यादोषवद्भैर्यदनुभूयते तत्सर्वात्मानमशरीरं न | समाधान—यहाँ यह दोष नहीं है । जिस मिथ्याज्ञानादिके द्वारा उस शरीरकी उत्पत्ति हुई थी वह मिथ्याज्ञानादि ज्ञानसे उच्छिन्न हो गये; इसलिये अब उस शरीरका अनुभव नहीं होता, अतः उसका स्मरण न करनेमें सर्वज्ञताकी हानि नहीं हो सकती । जो वस्तु उन्मत्त या ग्रहग्रस्त पुरुषको अनुभव होती थी उसे उन्मादादिकी निवृत्ति होनेपर भी स्मरण करना चाहिये—ऐसी बात नहीं है । इसी प्रकार इस प्रसङ्गमें भी जो शरीर अविद्यारूप दोषवाले संसारियोंद्वारा अनुभव किया जाता है वह अशरीरी सर्वात्माको स्पर्श नहीं करता, क्योंकि |