BharatKosha
Back to the archive

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

५४२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

Page 546Permalink
५४२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| कारानुरूपम् । न स्वैरी परदारेषु गन्ता । अत एव स्वैरिणी कुतो दुष्टचारिणी न संभवतीत्यर्थः । <br><br> तैश्च न वयं धनेनार्थिन इत्युक्त आहाल्पं मत्वैते धनं न गृह्णन्तीति । यक्ष्यमाणो वै कतिभिरहोभिरहं हे भगवन्तोऽस्मि, तदर्थं क्लृप्तं धनं मया यावदेकैकस्मै यथोक्तमृत्विजे धनं दास्यामि तावत्प्रत्येकं भगवद्भ्योऽपि दास्यामि । वसन्तु भगवन्तः पश्यन्तु च मम यागम् ॥ ५ ॥ | अविद्वान् है और न कोई स्वैरी—परस्त्रियोंके प्रति गमन करनेवाला है; अतः स्वैरिणी भी कैसे हो सकती है ? अर्थात् कोई दुराचारिणी स्त्री होनी भी सम्भव नहीं है।' <br><br> फिर उनके यह कहनेपर कि 'हम धनके अर्थी नहीं हैं' यह समझकर कि ये लोग थोड़ा मानकर धन नहीं लेते, उसने कहा—'हे पूज्यगण ! कुछ दिनोंमें मैं यज्ञानुष्ठान करनेवाला हूँ, उसके लिये मैंने धनका संकल्प कर दिया है। उस समय शास्त्राज्ञानुसार मैं जितना-जितना धन एक-एक ऋत्विक्‌को दूँगा। उतना ही आपमेंसे प्रत्येकको भी दूँगा। अतः आपलोग यहीं ठहरिये और मेरा यज्ञ देखिये' ॥५॥ |


अश्वपतिके प्रति मुनियोंकी प्रार्थना

इत्युक्ताः—इस प्रकार कहे जानेपर—

ते होचुर्येन हैवार्थेन पुरुषश्चरेत्तᳪहैव वदेदात्मानमेवेमं वैश्वानरᳪसंप्रत्यध्येषि तमेव नो ब्रूहीति ॥ ६ ॥

वे बोले—'जिस प्रयोजनसे कोई पुरुष कहीं जाता है उसे चाहिये कि अपने उसी प्रयोजनको कहे। इस समय आप वैश्वानर आत्माको जानते हैं, उसीका आप हमारे प्रति वर्णन कीजिये' ॥ ६ ॥

Page 547Permalink

खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५४३


| ते होचुः--येन हैवार्थेन प्रयोजनेन यं प्रति चरेद्गच्छेत्पुरुषस्तं हैवार्थं वदेत्, इदमेव प्रयोजनमागमनस्येत्ययं न्यायः सताम् । वयं च वैश्वानरज्ञानार्थिनः । आत्मानमेवेमं वैश्वानरं संप्रत्यध्येषि सम्यग्जानासि । अतस्तमेव नोऽस्मभ्यं ब्रूहि ॥६॥ | वे बोले-जिस अर्थ यानी प्रयोजनसे कोई पुरुष किसीके पास जाय उसे अपना वह प्रयोजन बतला देना चाहिये कि 'मेरे आनेका केवल यही प्रयोजन है।' सत्पुरुषोंका ऐसा ही नियम है । हमलोग भी वैश्वानरको जाननेकी इच्छावाले हैं । इस समय आप इस वैश्वानर आत्माको अच्छी तरह जानते हैं; अतः हमारे प्रति उसीका वर्णन कीजिये ॥ ६ ॥ |

— : ० : —

राजाके प्रति मुनियोंकी उपसत्ति

| इत्युक्तः-- | इस प्रकार कहे जानेपर— |

तान्होवाच प्रातर्वः प्रतिवक्तास्मीति ते ह समित्पाणयः पूर्वाह्णे प्रतिचक्रमिरे तान्हानुपनीयैवैतदुवाच ॥७॥

वह उनसे बोला—'अच्छा, मैं प्रातःकाल आपलोगोंको इसका उत्तर दूँगा।' तब दूसरे दिन वे पूर्वाह्णमें हाथमें समिधाएँ लेकर राजाके पास गये । उनका उपनयन न करके ही राजाने उस विद्याका उपदेश किया ॥ ७ ॥

| तान्होवाच--प्रातर्वो युष्मभ्यं प्रतिवक्तास्मि प्रतिवाक्यं दातास्मीत्युक्तास्ते ह राज्ञोऽभिप्रायज्ञाः समित्पाणयः समिद्भारहस्ता अपरेद्युः पूर्वाह्णे राजानं प्रतिचक्रमिरे गतवन्तः। | वह उनसे बोला--'मैं आप लोगोंको इसका उत्तर प्रातःकाल दूँगा।' इस प्रकार कहे जानेपर राजाके अभिप्रायको जाननेवाले वे मुनिगण दूसरे दिन पूर्वाह्नमें समित्पाणि--हाथोंमें समिधाएँ लिये राजाके पास आये । |

५४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

Page 548Permalink
५४४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| यतः एवं महाशाला महाश्रोत्रिया ब्राह्मणाः सन्तो महाशालत्वाद्यभिमानं हित्वा समिद्धारहस्ता जातितो हीनं राजानं विद्यार्थिनो विनयेनोपजग्मुः, तथान्यैर्विद्योपादित्सुभिर्भवितव्यम् । तेभ्यश्चादाद्विद्यामनुपनीयैवोपनयनमकृत्वैव । तान्यथा योग्येभ्यो विद्यामदात्तथान्येनापि विद्या दातव्येत्याख्यायिकार्थः । एतद्वैश्वानरविज्ञानमुवाचेति वक्ष्यमाणेन संबन्धः ॥ ७ ॥ | क्योंकि इस प्रकार महागृहस्थ और परमश्रोत्रिय ब्राह्मण होनेपर भी वे महागृहस्थत्व आदिके अभिमानको छोड़कर हाथोंमें समिधाएँ ले विद्यार्थी बन अपनेसे हीन जातिवाले राजाके पास विनयपूर्वक गये थे इसलिये विद्योपार्जनकी इच्छावाले अन्य पुरुषोंको भी ऐसा ही होना चाहिये । तब राजाने उनका उपनयन न करके ही उन्हें विद्या दे दी । अतः इस आख्यायिकाका यही तात्पर्य है कि जिस प्रकार उन योग्य विद्यार्थियोंको राजाने विद्या दी थी उसी प्रकार दूसरोंको भी विद्यादान करना चाहिये । [ मूलके ‘एतत्’ शब्दका ] ‘एतद् वैश्वानरविज्ञानम् उवाच’ इस प्रकार आगे कहे जानेवाले वैश्वानरविज्ञानसे सम्बन्ध है ॥ ७ ॥ |

—:०:—

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥

Page 549Permalink

द्वादश खण्ड

अश्वपति और औपमन्यवका संवाद

स कथमुवाच ? इत्याह—उसने किस प्रकार उपदेश दिया ? सो बतलाते हैं—

औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति। दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते ॥ १ ॥

[ राजा— ] 'हे उपमन्युकुमार ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' 'हे पूज्य राजन् ! मैं द्युलोककी ही उपासना करता हूँ' ऐसा उसने उत्तर दिया । [ राजा— ] 'तुम जिस आत्माकी उपासना करते हो यह निश्चय ही, 'सुतेजा' नामसे प्रसिद्ध वैश्वानर आत्मा है, इसीसे तुम्हारे कुलमें सुत, प्रसुत और आसुत दिखायी देते हैं' ॥ १ ॥

| औपमन्यव हे कमात्मानं वै वैश्वानरं त्वमुपास्स इति पप्रच्छ । | 'हे औपमन्यव ! तुम किस वैश्वानर आत्माकी उपासना करते हो ?' ऐसा राजाने पूछा । | | नन्वयमन्याय आचार्यः सन्-ञ्शिष्यं पृच्छतीति । | शङ्का—किंतु आचार्य होकर भी शिष्यसे पूछता है—यह तो अनुचित है । | | नैष दोषः; 'यद्वेत्थ तेन मोपसीद ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामि' | समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि 'जो कुछ तू जानता है उसे बतलाकर तू मेरे प्रति उपसन्न हो; तब उससे आगे मैं |

५४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

Page 550Permalink
५४६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| इति न्यायदर्शनात् । अन्यत्राप्याचार्यस्याप्रतिभानवति शिष्ये प्रतिभात्पादनार्थः प्रश्नो दृष्टोऽजातशत्रोः, 'क्वँैष तदाभूत्कुत एतदागात्' इति । | तुझे बतलाऊँगा' ऐसा न्याय देखा जाता है*। इसके सिवा अन्यत्र भी आचार्य अजातशत्रुका अपने प्रतिभा-शून्य शिष्यमें प्रतिभा उत्पन्न करनेके लिये 'तो फिर यह कहाँ उत्पन्न हुआ, और कहाँसे आया ?' ऐसा प्रश्न करना देखा जाता है । | | दिवमेव द्युलोकमेव वैश्वानरमुपासे भगवो राजन्निति होवाच । एष वै सुतेजाः शोभनं तेजो यस्य सोऽयं सुतेजा इति प्रसिद्धो वैश्वानर आत्मा, आत्मनोऽवयवभूतत्वात् । यंत्वमात्मानमात्मैकदेशमुपास्से तस्मात्सुतेजसो वैश्वानरस्योपासनात्तव सुतमभिषुतं सोमरूपं कर्मणि प्रस्रुतं प्रकर्षेण च सुतमासुतं चाहर्गणादिषु तव | 'हे पूज्य राजन् ! मैं द्युलोककी ही अर्थात् द्युलोकरूप वैश्वानरकी ही उपासना करता हूँ' ऐसा उसने उत्तर दिया । [तब राजाने कहा-] 'यह निश्चय ही 'सुतेजा'—जिनका तेज शोभन है ऐसा यह 'सुतेजा' नामसे प्रसिद्ध वैश्वानर आत्मा है । क्योंकि आत्माका अवयवभूत है; जिस आत्मा अर्थात् आत्माके एक देशकी तुम उपासना करते हो उसी सुतेजा वैश्वानरकी उपासना करनेसे यहाँ--तुम्हारे कुलमें अहर्गण ( एकाहादिरूप ज्योतिष्टोम ) आदिमें 'सुत'—अभिषुत (निकाला हुआ) सोमरूप लताद्रव्य, [अहीन] कर्ममें प्रस्रुत—विशेषरूपसे निकाला हुआ द्रव्य तथा [सत्रमें] 'आसुत' |

* यह न्याय छा० ७ । १ । ७ में सनत्कुमारकी उक्तिसे जाना जाता है ।

Page 551Permalink

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५४७


| कुले दृश्यतेऽतीव कर्मिणस्त्व-<br><br>त्कुलीना इत्यर्थः ॥ १ ॥ | (सर्वतोभावेन निकाला हुआ) सोमरस अधिक देखा जाता है। तात्पर्य यह है कि तुम्हारे कुटुम्बी बड़े ही कर्मनिष्ठ हैं' ॥ १ ॥ |

—: ० :—

अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥

'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो इस वैश्वानर आत्माकी इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। यह वैश्वानर आत्माका मस्तक है।' ऐसा राजाने कहा, और यह भी कहा कि—'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा मस्तक गिर जाता' ॥२॥

| अत्स्यन्नं दीप्ताग्निः सन्पश्यसि च पुत्रपौत्रादि प्रियमिष्टम् । अन्योऽप्यत्त्यन्नं पश्यति च प्रियं भवत्यस्य सुतं प्रसूतमासुतमित्यादि कर्मित्वं ब्रह्मवर्चसं कुले यः कश्चिदेतं यथोक्तमेवं वैश्वानरमुपास्ते । मूर्धा त्वात्मनो वैश्वानरस्यैष न समस्तो वैश्वानरः। | 'तुम दीप्ताग्नि होकर अन्न भक्षण करते हो। तथा पुत्र-पौत्रादिरूप प्रिय-इष्टका दर्शन करते हो। और भी जो कोई इस उपयुक्त वैश्वानरकी इस प्रकार उपासना करता है वह भी अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें सुत, प्रसूत एवं आसुत इत्यादि कर्मित्वरूप ब्रह्मतेज होता है। किंतु यह वैश्वानर आत्माका मस्तक ही है, सम्पूर्ण वैश्वानर नहीं है; अतः इस- |

छा० उ० १८—

५४८ | छाान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

Page 552Permalink
५४८छाान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| अतः समस्तबुद्ध्या वैश्वानरस्यो-<br>पासनान्मूर्धा शिरस्ते विपरीत-<br>ग्राहिणो व्यपतिष्यद्विपतितम-<br>भविष्यत्, यद्यदि मां नागमि-<br>ष्यो नागतोऽभविष्यः । साध्व-<br>कार्षीर्यन्मामागतोऽसीत्यभि-<br>प्रायः ॥ २ ॥ | की समस्त बुद्धिसे उपासना करनेके<br>कारण विपरीत ग्रहण करनेवाले<br>तुम्हारा मस्तक गिर जाता, यदि<br>तुम मेरे पास न आते अर्थात् मेरे<br>पास आगमन न करते । तात्पर्य<br>यह है कि तुम मेरे पास चले आये<br>यह अच्छा ही किया' ॥ २ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥

Page 553Permalink

त्रयोदश खण्ड

अश्वपति और सत्ययज्ञका संवाद

अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलुपि प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै विश्वरूप आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव बहु विश्वरूपं कुले दृश्यते ॥ १ ॥

फिर उसने पुलुषके पुत्र सत्ययज्ञसे कहा—'हे प्राचीनयोग्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' वह बोला—'हे पूज्य राजन् ! मैं आदित्यकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजाने कहा— ] 'यह निश्चय ही विश्वरूप वैश्वानर आत्मा है, जिस आत्माकी तुम उपासना करते हो; इसीसे तुम्हारे कुलमें बहुत-सा विश्वरूप साधन दिखायी देता है' ॥ १ ॥

| अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलुपिं हे प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्से ? इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवाच । शुक्लनीलादिरूपत्वाद्विश्वरूपत्वमादित्यस्य, सर्वरूपत्वाद्वा, सर्वाणि रूपाणि हि त्वाष्ट्राणि यतोऽतो वा विश्वरूप आदित्यः; | फिर उसने पुलुषके पुत्र सत्ययज्ञसे कहा—'हे प्राचीनयोग्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' तब उसने 'हे पूज्य राजन् ! मैं आदित्यकी ही उपासना करता हूँ' ऐसा उत्तर दिया । शुक्लनीलादिरूप होनेके कारण आदित्यकी विश्वरूपता है, अथवा सर्वरूप होनेके कारण; या सारे रूप त्वष्टाके ही हैं, इस लिये आदित्य विश्वरूप है। उसकी |

५५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

Page 554Permalink
५५०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

तदुपासनात्तव बहु विश्वरूपमिहामुत्रार्थमुपकरणं दृश्यते कुले ॥ १ ॥उपासनाके कारण तुम्हारे कुलमें बहुत-सा विश्वरूप ऐहिक और पारलौकिक साधन दिखायी देता है ॥ १ ॥
<center>—: ० :—</center>
किं च त्वामनु--तथा तुम्हारे पीछे—

प्रवृत्तोऽश्वतरोरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते चक्षुष्ट्वेतदात्मन इति होवाचान्धोऽभविष्यो यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥

'खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ और दासियोंके सहित हार प्रवृत्त है। तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो इस प्रकार इस वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। किंतु यह आत्माका नेत्र ही है।' ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा—'यदि तुम मेरे पास न आते तो अंधे हो जाते' ॥ २ ॥

प्रवृत्तोऽश्वतरीभ्यां युक्तो रथाऽश्वतरीरथो दासीनिष्को दासीभिर्युक्तो निष्को हारो दासीनिष्कः । अत्स्यन्नमित्यादि समानम् । चक्षुर्वैश्वानरस्य तु सविता । तस्य समस्तबुद्धयोपासनादन्धोऽभविष्यश्चक्षुर्हीनोऽभविष्यो यन्मां नागमिष्य इति पूर्ववत् ॥ २ ॥'अश्वतरोरथ—दो खच्चरियोंसे युक्त रथ और दासीनिष्क—दासियोंसे युक्त निष्क यानी हार प्रवृत्त है। 'अत्स्यन्नम्' इत्यादिका तात्पर्य पूर्ववत् है। किंतु सूर्य वैश्वानरका नेत्र ही है। उसकी समस्त बुद्धिसे उपासना करनेके कारण, यदि तुम मेरे पास न आते तो अन्धे हो जाते'—ऐसा पूर्ववत् जानना चाहिये ॥ २ ॥
<center>—: ० :—</center> <center>

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥

—: ० :—

</center>
Page 555Permalink

चतुर्दश खण्ड

--: ३ :--

अश्वपति और इन्द्रद्युम्नका संवाद

अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्व-
मात्मानमुपास्स इति वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचैष
वै पृथग्वर्त्मात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वां
पृथग्बलय आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति ॥ १ ॥

तदनन्तर राजाने भाल्लवेय इन्द्रद्युम्नसे कहा—'हे वैयाघ्रपद्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' वह बोला—'हे पूज्य राजन् ! मैं वायुकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजाने कहा— ] 'जिस आत्माकी तुम उपासना करते हो वह निश्चय ही पृथग्वर्त्मा वैश्वानर आत्मा है; इसीसे तुम्हारे प्रति पृथक्-पृथक् उपहार आते हैं और तुम्हारे पीछे पृथक् पृथक् रथकी पङ्क्तियाँ चलती हैं' ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्से इत्यादि समानम् । पृथग्वर्त्मा नाना वर्त्मानि यस्य वायोरावहोद्वहादिभिर्भेदैर्वर्तमानस्य सोऽयं पृथग्वर्त्मा वायुः । तस्मात्पृथग्वर्त्मात्मनो वैश्वानरस्योपासनात्पृ-तदनन्तर राजाने भाल्लवेय इन्द्रद्युम्नसे कहा—'हे वैयाघ्रपद्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये । पृथग्वर्त्मा—आवह, उद्वह आदि भेदोंसे विद्यमान जिस वायुके अनेकों मार्ग हैं वह वायु पृथग्वर्त्मा है । 'अतः पृथग्वर्त्मा वैश्वानर आत्माकी उपासना करनेके कारण तुम्हारे पास पृथक्

५५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

Page 556Permalink
५५२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| थङ्नानादिकास्त्वां बलयो वस्त्रा-न्नादिलक्षणा बलय आयन्त्या-गच्छन्ति । पृथग्रथश्रेणयो रथ-पङ्क्तयोऽपि त्वामनुयन्ति ॥ १ ॥ | —नाना दिशाओंसे वस्त्र एवं अन्नादिरूप उपहार आते हैं; तथा पृथक्-पृथक् रथश्रेणियाँ—रथकी पङ्क्तियाँ भी तुम्हारे पीछे चलती हैं'१ |

—: ० :—

अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥

'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो कोई इस प्रकार इस वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है । किंतु यह आत्माका प्राण ही है'—ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा कि 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा प्राण उत्क्रमण कर जाता' ॥२॥

| अत्स्यन्नमित्यादि समानम् ।<br><br>प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच<br><br>प्राणस्ते तवोदक्रमिष्यदुत्क्रान्तोऽभविष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ | 'अत्स्यन्नम्' इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है । 'किंतु यह आत्माका प्राण ही है' ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा कि 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा प्राण उत्क्रमण कर जाता अर्थात् उत्क्रान्त हो जाता' ॥ २ ॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१४॥

Page 557Permalink

पञ्चदश खण्ड

一: ० :一

अश्वपति और जनका संवाद

अथ होवाच जनँशार्कराक्ष्य कं त्वमात्मानमु- पास्स इत्याकाशमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै बहुल आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वं बहुलोऽसि प्रजया च धनेन च ॥ १ ॥

तदनन्तर राजाने जनसे कहा—'हे शार्कराक्ष्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा—'हे पूज्य राजन् ! मैं आकाशकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा बोला- ] 'यह निश्चय ही बहुलसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है जिसकी कि तुम उपासना करते हो । इसीसे तुम प्रजा और धनके कारण बहुल हो' ॥ १ ॥

अथ होवाच जनमित्यादि समानम् । एष वै बहुल आत्मा वैश्वानरः । बहुलत्वमाकाशस्य सर्वगतत्वाद्वहुलगुणोपासनाच्च । त्वं बहुलोऽसि प्रजया च पुत्रपौत्रादिलक्षणया धनेन च हिरण्यादिना ॥ १ ॥'फिर उसने जनसे कहा' इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है। यह निश्चय ही बहुलसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है । सर्वगत होनेके कारण तथा बहुल-गुणरूपसे उपासित होनेके कारण आकाशका बहुलत्व ( पूर्णत्व ) है । इसीसे तुम पुत्र पौत्रादिरूप प्रजा और सुवर्णादि धनसे बहुल ( परिपूर्ण ) हो ॥ १ ॥

अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानर-

५१४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

Page 558Permalink
५१४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

मुपास्ते संदेहस्त्वेष आत्मन इति होवाच संदेहस्ते व्यशीर्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥

'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो । जो इस प्रकार इस वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है । किंतु यह आत्माका संदेह (शरीरका मध्यभाग) ही है।' ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा कि 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा संदेह (शरीरका मध्यभाग) नष्ट हो जाता' ॥ २ ॥

| संदेहस्त्वेष संदेहो मध्यं शरीरं वैश्वानरस्य । दिहेरुपचयार्थत्वान्मांसरुधिरास्थ्यादिभिश्च बहुलं शरीरं तत्संदेहः, ते तव शरीरं व्यशीर्यच्छीर्णमभविष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ | किंतु यह वैश्वानरका संदेह ही है । शरीरके मध्यभागको संदेह कहते हैं । क्योंकि 'दिह्' धातु उपचय (वृद्धि) अर्थवाला है और शरीर मांस, रुधिर एवं अस्थि आदिसे बहुल (उपचित) है इसलिये वह संदेह है, तुम्हारा वह संदेह अर्थात् शरीर नष्ट हो जाता, यदि तुम मेरे पास न आते ॥ २ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥

Page 559Permalink

षोडश खण्ड

--: ० :--

अश्वपति और बुडिलका संवाद

अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यप एव भगवो राजन्निति होवाचैष वै रयिरात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वꣳ रयिमान्पुष्टिमानसि ॥ १ ॥

फिर उसने अश्वतराश्वके पुत्र बुडिलसे कहा—'हे वैयाघ्रपद्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा—'हे पूज्य राजन् ! मैं तो जलकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा बोला—] 'जिसकी तुम उपासना करते हो वह निश्चय ही रयिसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है; इसीसे तुम रयिमान् (धनवान्) और पुष्टिमान् हो' ॥ १ ॥

| अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विमित्यादि समानम् । एष वै रयिरात्मा वैश्वानरो धनरूपः, अद्भ्योऽन्नं ततो धनमिति । तस्माद्रयिमान् धनवांस्त्वं पुष्टिमांश्च शरीरेण, पुष्टेश्चान्ननिमित्तत्वात् ॥ १ ॥ | 'तदनन्तर राजाने अश्वतराश्वके पुत्र बुडिलसे कहा'—इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है। यह निश्चय ही धनरूप रयिसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है; क्योंकि जलसे अन्न होता है और अन्नसे धन। इसीसे तुम रयिमान् यानी धनवान् हो तथा शरीरसे पुष्टिमान् हो, क्योंकि पुष्टि अन्नके कारण हुआ करती है ॥ १ ॥ |

—: ० :—

अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानर-

५५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

Page 560Permalink
५५६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

मुपास्ते बस्तिस्त्वेष आत्मन इति होवाच बस्तिस्ते व्यभेत्स्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥

'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो पुरुष इस वैश्वानर आत्माकी इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। किंतु यह आत्माका बस्ति ही है'—ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा कि 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा बस्तिस्थान फट जाता' ॥ २ ॥

| बस्तिस्त्वेष आत्मनो वैश्वानरस्य बस्तिर्मूत्रसंग्रहस्थानं बस्तिस्ते व्यभेत्स्यद्भिन्नोऽभविष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ | 'यह वैश्वानर आत्माका बस्ति है; बस्ति मूत्रसंग्रहके स्थानको कहते हैं। 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा बस्ति भिन्न—विदीर्ण हो जाता'—ऐसा राजाने कहा ॥२॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥

Page 561Permalink

सप्तदश खण्ड


अश्वपति और उद्दालकका संवाद

अथ होवाचोद्दालकमारुणिं गौतम कं त्वमात्मान-
मुपास्स इति पृथिवीमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै
प्रतिष्ठात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वं
प्रतिष्ठितोऽसि प्रजया च पशुभिश्च ॥ १ ॥

तत्पश्चात् राजाने अरुणके पुत्र उद्दालकसे कहा—'हे गौतम ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा—'हे पूज्य राजन् ! मैं तो पृथिवीकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा बोला— ] 'जिसकी तुम उपासना करते हो यह निश्चय ही प्रतिष्ठासंज्ञक वैश्वानर आत्मा है । इसीसे तुम प्रजा और पशुओंके कारण प्रतिष्ठित हो' ॥ १ ॥

अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं
भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानर-
मुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन इति होवाच पादौ ते व्यम्ला-
स्येतां यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥

'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो कोई इस वैश्वानर आत्माकी इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। किंतु यह आत्माके चरण ही हैं' ऐसा उसने कहा और यह भी कहा कि 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारे चरण शिथिल हो जाते' ॥ २ ॥

५५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

Page 562Permalink
५५८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| अथ होवाचोद्दालकमित्यादि समानम् । पृथिवीमेव भगवो राजन्निति होवाच । एष वै प्रतिष्ठा पादौ वैश्वानरस्य । पादौ ते व्यम्लास्येतां विम्लानावेभविष्यतां श्लथीभूतौ यन्मां नागमिष्य इति ॥ १-२ ॥ | 'फिर उद्दालकसे कहा' इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है। [उद्दालकने कहा-] 'हे पूज्य राजन् ! मैं पृथिवीकी ही उपासना करता हूँ' [ राजा बोला-] 'यह निश्चय ही वैश्वानर आत्माकी प्रतिष्ठा यानी उसके चरण हैं। यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारे चरण विशेषरूपसे म्लान अर्थात् शिथिल हो जाते' ॥१-२॥ |

<div align="center">

— : ० : —

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये सप्तदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १७ ॥

</div>
Page 563Permalink

अष्टादश खण्ड

-: ० :-

अश्वपतिका उपदेश—वैश्वानरकी समस्तोपासनाका फल

तान्होवाचैते वै खलु यूयं पृथगिवेममात्मानं वैश्वानरं विद्वांसोऽन्नमत्थ यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति ॥ १ ॥

राजाने उनसे कहा—'तुम ये सब लोग इस वैश्वानर आत्माको अलग-सा जानकर अन्न भक्षण करते हो। जो कोई 'यही मैं हूँ' इस प्रकार अभिमानका विषय होनेवाले इस प्रादेशमात्र वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह समस्त लोकोंमें, समस्त प्राणियोंमें और समस्त आत्माओंमें अन्न भक्षण करता है' ॥ १ ॥

| तान्यथोक्तवैश्वानरदर्शनवतो होवाच—एते यूयम्, वै खल्वित्यनर्थकौ, यूयं पृथगिवापृथक्सन्तमिममेकं वैश्वानरमात्मानं विद्वांसोऽन्नमत्थ, परिच्छिन्नात्मबुद्धयेत्येतत्—हस्तिदर्शन इव जात्यन्धाः । | यहाँ 'वै' और 'खलु' ये दो निपात अर्थशून्य हैं। उन उपर्युक्त वैश्वानर दृष्टिवालोंसे राजाने कहा—ये तुमलोग अपनेसे अभिन्न होनेपर भी इस वैश्वानर आत्माको पृथक्-सा जानकर अन्न भक्षण करते हो। तात्पर्य यह है कि जन्मान्ध पुरुषोंके हस्तिदर्शनके समान* तुम परिच्छिन्न आत्मबुद्धिसे उसे जानते हो। |


  • अर्थात् जिस प्रकार कुछ जन्मान्ध, जिन्होंने हाथीको कभी नहीं देखा, उसके आकारका अनुमान करने लगें तो उनमेंसे जो पुरुष हाथीके सूँड, शिर, कान अथवा टाँग आदि जिस अवयवका स्पर्श करता है वह उसे ही हाथीका समग्ररूप समझने लगता है, उसी प्रकार तुम सबकी भी वैश्वानरके अवयवोंमें समग्र वैश्वानरबुद्धि हो रही है।

५६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

Page 564Permalink
५६०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| यस्त्वेतमेवं यथोक्तावयवैर्द्युमूर्द्धादिभिः पृथिवीपादान्तैर्विशिष्टमेकं प्रादेशमात्रम्, प्रादेशैर्द्युमूर्द्धादिभिः पृथिवीपादान्तैरध्यात्मं मीयते ज्ञायत इति प्रादेशमात्रम् । मुखादिषु वा करणेष्वत्तृत्वेन मीयत इति प्रादेशमात्रः। द्युलोकादिपृथिव्यन्तप्रदेशपरिमाणो वा प्रादेशमात्रः । प्रकर्षेण शास्त्रेणादिश्यन्त इति प्रादेशा द्युलोकादय एव तावत्परिमाणः प्रादेशमात्रः । | किंतु जो कोई द्युलोकरूप मस्तकसे लेकर पृथिवीरूप पादपर्यन्त इन पूर्वोक्त अवयवोंसे युक्त एक प्रादेशमात्र—जो प्रत्यगात्मामें ही द्युमूर्द्धासे लेकर पृथिवीपादपर्यन्त प्रादेशोंद्वारा मित होता है अर्थात् जाना जाता है, उस प्रादेशमात्र आत्माकी [उपासना करता है]। अथवा मुख आदि करणोंमें भोक्तारूपसे मित होता है इसलिये प्रादेशमात्र है। या द्युलोकसे लेकर पृथिवीपर्यन्त प्रदेश ही उसका परिमाण है इसलिये प्रादेशमात्र है। अथवा शास्त्रद्वारा प्रकर्षसे आदिष्ट होते हैं इसलिये द्युलोक आदि प्रादेश हैं उतने ही परिमाणवाला होनेसे प्रादेशमात्र है। | | शाखान्तरे तु मूर्धादिश्चिबुकप्रतिष्ठ इति प्रादेशमात्रं कल्पयन्ति, इह तु न तथाभिप्रेतः, 'तस्य ह वा एतस्यात्मनः' इत्याद्युपसंहारात् । | अन्य शाखामें तो मूर्धासे लेकर चिबुकपर्यन्त प्रतिष्ठित है इसलिये उसे प्रादेशमात्र कल्पित करते हैं, किंतु यहाँ वह इस प्रकार अभिप्रेत नहीं है, क्योंकि 'उस इस आत्माका [द्युलोक ही मूर्धा है]' इत्यादि [सार्वत्म्य-] रूपसे उपसंहार किया गया है। | | प्रत्यगात्मतयाभिविमीयतेऽहमिति ज्ञायत इत्यभिविमानस्तमेत- | वह प्रत्यगात्मरूपसे अभिविमान किया जाता है अर्थात् 'मैं' इस प्रकार जाना जाता है; इसलिये अभिविमान है, उस इस वैश्वानर |

Page 565Permalink

खण्ड १८] शाङ्करभाष्यार्थ ५४१


| मात्मानं वैश्वानरम्-विश्वान्नरान्नयति पुण्यपापानुरूपां गतिं सर्वात्मैष ईश्वरो वैश्वानरो विश्वो नर एववा सर्वात्मत्वात्, विश्वैर्वा नरैः प्रत्यगात्मतया प्रविभज्य नीयत इति वैश्वानरस्तमेवमुपास्ते यः, सोऽद्वन्नन्नादी; सर्वेषु लोकेषु द्युलोकादिषु सर्वेषु भूतेषु चराचरेषु सर्वेष्वात्मसु शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिषु तेषु ह्यात्मकल्पनाव्यपदेशः प्राणिनाम्, अन्नमत्ति, वैश्वानरवित्सर्वात्मा सन्नन्नमत्ति, न यथाज्ञः पिण्डमात्राभिमानः सन्नित्यर्थः ॥ १ ॥ | आत्माकी—यह सर्वात्मा ईश्वर सम्पूर्ण नरोंको पुण्य-पापानुरूप गतिको ले जाता है इसलिये, अथवा सर्वात्मा होनेके कारण विश्व (सर्व) नरस्वरूप है इसलिये, 'वैश्वानर' है, या समस्त नरोंद्वारा अपने प्रत्यगात्मरूपसे विभक्त करके ले जाया जाता है इसलिये 'वैश्वानर' है—उसकी जो इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता हुआ अन्नादी (अन्न खानेवाला) होता है, द्युलोकादि समस्त लोकोंमें, सम्पूर्ण चराचर भूतोंमें तथा शरीर; इन्द्रिय, मन और बुद्धिरूप समस्त आत्माओंमें—क्योंकि इन्हींमें प्राणियोंकी आत्मकल्पनाका निर्देश किया जाता है—अन्न भक्षण करता है। तात्पर्य यह है कि वैश्वानरवेत्ता सर्वात्मा होकर अन्न भक्षण करता है अज्ञानियोंके समान पिण्डमात्रमें अभिमान करके अन्न नहीं खाता। १। |

-- : ॐ : --
वैश्वानरका साङ्गोपाङ्ग स्वरूप

कस्मादेवम् ? यस्मात्---ऐसा क्यों है ? क्योंकि—

तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥ २ ॥