भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 558, कुल 978 में से

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पृष्ठ 558
५१४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

मुपास्ते संदेहस्त्वेष आत्मन इति होवाच संदेहस्ते व्यशीर्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥

'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो । जो इस प्रकार इस वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है । किंतु यह आत्माका संदेह (शरीरका मध्यभाग) ही है।' ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा कि 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा संदेह (शरीरका मध्यभाग) नष्ट हो जाता' ॥ २ ॥

| संदेहस्त्वेष संदेहो मध्यं शरीरं वैश्वानरस्य । दिहेरुपचयार्थत्वान्मांसरुधिरास्थ्यादिभिश्च बहुलं शरीरं तत्संदेहः, ते तव शरीरं व्यशीर्यच्छीर्णमभविष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ | किंतु यह वैश्वानरका संदेह ही है । शरीरके मध्यभागको संदेह कहते हैं । क्योंकि 'दिह्' धातु उपचय (वृद्धि) अर्थवाला है और शरीर मांस, रुधिर एवं अस्थि आदिसे बहुल (उपचित) है इसलिये वह संदेह है, तुम्हारा वह संदेह अर्थात् शरीर नष्ट हो जाता, यदि तुम मेरे पास न आते ॥ २ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥