भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 551, कुल 978 में से

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पृष्ठ 551

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५४७


| कुले दृश्यतेऽतीव कर्मिणस्त्व-<br><br>त्कुलीना इत्यर्थः ॥ १ ॥ | (सर्वतोभावेन निकाला हुआ) सोमरस अधिक देखा जाता है। तात्पर्य यह है कि तुम्हारे कुटुम्बी बड़े ही कर्मनिष्ठ हैं' ॥ १ ॥ |

—: ० :—

अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥

'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो इस वैश्वानर आत्माकी इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। यह वैश्वानर आत्माका मस्तक है।' ऐसा राजाने कहा, और यह भी कहा कि—'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा मस्तक गिर जाता' ॥२॥

| अत्स्यन्नं दीप्ताग्निः सन्पश्यसि च पुत्रपौत्रादि प्रियमिष्टम् । अन्योऽप्यत्त्यन्नं पश्यति च प्रियं भवत्यस्य सुतं प्रसूतमासुतमित्यादि कर्मित्वं ब्रह्मवर्चसं कुले यः कश्चिदेतं यथोक्तमेवं वैश्वानरमुपास्ते । मूर्धा त्वात्मनो वैश्वानरस्यैष न समस्तो वैश्वानरः। | 'तुम दीप्ताग्नि होकर अन्न भक्षण करते हो। तथा पुत्र-पौत्रादिरूप प्रिय-इष्टका दर्शन करते हो। और भी जो कोई इस उपयुक्त वैश्वानरकी इस प्रकार उपासना करता है वह भी अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें सुत, प्रसूत एवं आसुत इत्यादि कर्मित्वरूप ब्रह्मतेज होता है। किंतु यह वैश्वानर आत्माका मस्तक ही है, सम्पूर्ण वैश्वानर नहीं है; अतः इस- |

छा० उ० १८—