छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| तुल्यां बुद्धिमुत्पादयति; अतः सर्वेण समोऽतः साम समत्वादित्यर्थः।<br><br>उद्गीथभक्तिसामान्यवचनादेव लोकादिषूक्तसामान्याद्धिंकारादित्वं गम्य इति हिंकारादित्वे कारणं नोक्तम्। सामत्वे पुनः सवितुरनुक्तं कारणं न सुबोधमिति समत्वमुक्तम् ॥ १ ॥ | सबमें समान बुद्धि उत्पन्न करता है, [ क्योंकि उसे सभी प्राणी अपने-अपने सम्मुख देखते हैं ] इसलिये वह सबके साथ समान है; अतः इस समताके कारण वह साम है।<br><br>उद्गीथभक्तिमें समानता बतलानेसे ही [ अर्थात् उद्गीथके साथ आदित्यका ऊर्ध्वत्वमें सादृश्य है—ऐसा जो श्रुतिने कहा है उसके अनुसार ही ] लोकादिमें भी [ सामावयवोंके साथ ] सादृश्य बतलाये जानेसे उनका हिंकारादिरूप होना ज्ञात होता है—इसीसे [ श्रुतिमें आदित्यावयवोंके ] हिंकारादिरूप होनेमें कारण नहीं बतलाया गया था।* किंतु आदित्यकी सामरूपतामें न बतलाया गया कारण सुगमतासे नहीं जाना जा सकता इसलिये उसके सम्बन्धमें समत्वरूप कारण बतलाया गया है ॥ १ ॥ |
तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात्तस्य यत्पुरोदयात्स हिंकारस्तदस्य पशवोऽन्वायत्तास्तस्मात्ते हिं कुर्वन्ति हिंकारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥२॥
उस आदित्यमें ये सम्पूर्ण भूत अनुगत हैं—ऐसा जाने। जो उस आदित्यके उदयसे पूर्व है वह हिंकार है। उस सूर्यका जो हिंकाररूप है
* क्योंकि लोकादिके हिंकारादिरूप होनेमें जो-जो कारण हैं, वे ही आदित्यावयवोंके सम्बन्धमें भी समझे जा सकते हैं।
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७५ ※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※
उसके पशु अनुगत हैं, इससे वे हिंकार करते हैं। अतः वे ही इस आदित्यरूप सामके हिंकारभाजन हैं ॥ २ ॥
| तस्मिन्नादित्येऽवयवविभागश इमानि वक्ष्यमाणानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तान्यनुगतान्यादित्यमुपजीव्यत्वेनेति विद्यात् । कथम् ? तस्यादित्यस्य यत्पुरोदयाद्धर्मरूपम्, स हिंकारो भक्तिस्तत्रेदं सामान्यं यत्तस्य हिंकारभक्तिरूपम् । | उस आदित्यमें ये आगे बतलाये जानेवाले समस्त भूत अवयवविभागानुसार उसके उपजीव्य रूपसे अन्वायत्त — अनुगत हैं—ऐसा जाने । वे किस प्रकार अनुगत हैं ? [ यह बतलाते हैं—] उस आदित्यका उदयसे पहले जो धर्मरूप ( धर्मानुष्ठानका प्रेरक स्वरूप) है वह हिंकारभक्ति है। उस धर्मरूपमें यही सादृश्य है कि वह उस ( आदित्यसंज्ञक साम ) का हिंकारभक्तिरूप है । | | तदस्यादित्यस्य साम्नः पशवो गवाद्योऽन्वायत्ता अनुगतास्तद्भक्तिरूपमुपजीवन्तीत्यर्थः । यस्मादेवं तस्मात्ते हिंकुर्वन्ति पशवः प्रागुदयात् । तस्माद्धिंकारभाजिनो ह्येतस्यादित्याख्यस्य साम्नः तद्भक्तिभजनशीलत्वाद्वि त एवं वर्तन्ते ॥ २ ॥ | उस इस आदित्यरूप सामके गौ आदि पशु अन्वायत्त—अनुगत हैं; अर्थात् उस हिंकारभक्तिरूपसे उसमें उपजीवी हैं । क्योंकि ऐसा है इसीलिये वे पशु सूर्योदयसे पूर्व हिंकार-शब्द करते हैं । अतः वे इस आदित्यसंज्ञक सामके हिंकारपात्र हैं । उस हिंकारभक्तिके सेवनमें तत्पर रहनेसे ही वे इस प्रकार बर्ताव करते हैं [ अर्थात् सूर्योदयसे पूर्व हिंकार करते हैं ] ॥ २ ॥ |
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अथ यत्प्रथमोदिते स प्रस्तावस्तदस्य मनुष्या अन्वायत्तास्तस्मात्ते प्रस्तुतिकामाः प्रशꣳसाकामाः प्रस्तावभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ३ ॥
| १७६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
| १७६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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तथा सूर्यके पहले-पहल उदित होनेपर जो रूप होता है वह प्रस्ताव है । उसके उस रूपके मनुष्य अनुगामी हैं, अतः वे प्रस्तुति [प्रत्यक्षस्तुति] और प्रशंसा [ परोक्षस्तुति ] की इच्छावाले हैं, क्योंकि वे इस सामकी प्रस्तावभक्तिका सेवन करनेवाले हैं ॥ ३ ॥
| अथ यत्प्रथमोदिते सवितृ- <br><br> रूपं तदस्यादित्याख्यस्य साम्नः <br><br> प्रस्तावस्तदस्य मनुष्या अन्वा- <br><br> यत्ताः पूर्ववत् । तस्मात्ते प्रस्तुतिं <br><br> प्रशंसां कामयन्ते। यस्मात्प्रस्ता- <br><br> वभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ३ ॥ | तथा सूर्यके पहले-पहल उदित होनेपर जो उसका रूप होता है वह इस आदित्यसंज्ञक सामका प्रस्ताव है; पूर्ववत् [ अर्थात् पशुओं-के समान ] उसके उस रूपके मनुष्य अनुगामी हैं । इसीसे वे प्रस्तुति और प्रशंसाकी इच्छा करते हैं, क्योंकि वे इस सामके प्रस्तावका भजन करनेवाले हैं ॥ ३ ॥ |
अथ यत्सङ्गववेलायाँ१स आदिस्तदस्य वयाँ१स्य-<br>न्वायत्तानि तस्मात्तान्यन्तरिक्षेऽनारम्बणान्यादायात्मानं<br>परिपतन्त्यादिभाजीनि ह्येतस्य साम्नः ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् आदित्यका जो रूप सङ्गववेलामें ( सूर्योदयके तीन मुहूर्त्त पश्चात् कालमें ) रहता है वह आदि है । उसके उस रूपके अनुगत पक्षिगण हैं; क्योंकि वे इस सामके आदिका भजन करनेवाले हैं, इसलिये वे अन्तरिक्षमें अपनेको निराधाररूपसे सब ओर ले जाते हैं ॥ ४ ॥
| अथ यत्सङ्गववेलायां गवां <br><br> रश्मीनां सङ्गमनं सङ्गमो यस्यां <br><br> वेलायां गवां वा वत्सैः सा सङ्ग- | तत्पश्चात् सङ्गववेलामें—जिस वेलामें गो यानी सूर्यकिरणोंका सङ्गम होता है अथवा जिसमें गौओंका बछड़ोंसे सङ्गम होता है उसे सङ्गववेला |
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७७
| बवेला तस्मिन्काले यत्सावित्रं रूपं स आदिर्भक्तिविशेष ओङ्कारस्तदस्य वयांसि पक्षिणोऽन्वायत्तानि ।<br><br>यत एवं तस्मात्तानि वयांस्यन्तरिक्षेऽनारम्बणान्यनालम्बनान्यात्मानमादायात्मानमेवालम्बनत्वेन गृहीत्वा परिपतन्ति गच्छन्त्यत आकारसामान्यादादिभक्तिभाजीनि ह्येतस्य साम्नः ॥ ४ ॥ | कहते हैं, उस कालमें सूर्यदेवका जो रूप होता है वह आदि—भक्तिविशेष ओङ्कार है । उसके उस रूपके अनुगामी पक्षिगण हैं ।<br><br>क्योंकि ऐसा है इसलिये वे पक्षिगण आकाशमें अनारम्बण—बिना आश्रयके ही अपनेको आलम्बनरूपसे ग्रहण कर सब ओर जाते हैं । अतः [ 'आदायात्मानं परिपतन्ति' इसके आरम्भमें ] आकाररूप सादृश्य होनेके कारण वे इस सामकी आदि-संज्ञक भक्तिके भागी हैं ॥ ४ ॥ |
अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने स उद्गीथस्तदस्य देवा अन्वायत्तास्तस्मात्ते सत्तमाः प्राजापत्यानामुद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ५ ॥
तथा अब जो मध्यदिवसमें आदित्यका रूप होता है वह उद्गीथ है । इसके उस रूपके देवतालोग अनुगत हैं । इसीसे वे प्रजापतिसे उत्पन्न हुए प्राणियोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे इस सामकी उद्गीथभक्तिके भागी हैं ॥ ५ ॥
| अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिन ऋजुमध्यन्दिन इत्यर्थः । स उद्गीथभक्तिस्तदस्य देवा अन्वा- | तथा अब जो सम्प्रति मध्यन्दिनमें अर्थात् ठीक मध्याह्नमें [ आदित्यका रूप होता ] है वह उद्गीथभक्ति है; उसके उस रूपके अनुगामी देवता- |
१७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय २
| १७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय २ |
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| यत्ताः, द्योतनातिशयात्तत्काले। तस्मात्ते सत्तमा विशिष्टतमाः प्राजापत्यानां प्रजापत्यपत्यानामूद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥५॥ | लोग हैं, क्योंकि उस समय वे अत्यन्त प्रकाशशील होते हैं। इसीसे वे प्राजापत्योंमें—प्रजापतिके पुत्रोंमें सत्तम-विशिष्टतम होते हैं, क्योंकि वे इस सामकी उद्गीथभक्तिके भागी हैं ॥५॥ |
अथ यदूर्ध्वं मध्यन्दिनात्प्रागपराह्णात्स प्रतिहारस्तदस्य गर्भा अन्वायत्तास्तस्मात्ते प्रतिहृता नावपद्यन्ते प्रतिहारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ६ ॥
तथा आदित्यका जो रूप मध्याह्नके पश्चात् और अपराह्नके पूर्व होता है वह प्रतिहार है। उसके उस रूपके अनुगामी गर्भ हैं। इसीसे वे प्रतिहृत (ऊपरकी ओर आकृष्ट) किये जानेपर नीचे नहीं गिरते, क्योंकि वे इस सामकी प्रतिहारभक्तिके पात्र हैं ॥ ६ ॥
| अथ यदूर्ध्वं मध्यन्दिनात्प्रागपराह्नाद्यद्रूपं सवितुः स प्रतिहारस्तदस्य गर्भा अन्वायत्ताः। अतस्ते सवितुः प्रतिहारभक्तिरूपेणोर्ध्वं प्रतिहृताः सन्तो नावपद्यन्ते नाधः पतन्ति तद्द्वारे सत्यपीत्यर्थः। यतः प्रतिहारभाजिनो ह्येतस्य साम्नो गर्भाः ॥ ६ ॥ | तथा आदित्यका जो रूप मध्याह्नके पश्चात् और अपराह्नसे पूर्व होता है वह प्रतिहार है। उसके उस रूपके अनुगामी गर्भ हैं। अतः वे सूर्यकी प्रतिहारभक्तिरूपसे ऊपरकी ओर प्रतिहृत (आकृष्ट) होनेके कारण, पतनके द्वारपर रहते हुए भी, अवपन्न नहीं होते—नीचे नहीं गिरते, क्योंकि गर्भ इस सामकी प्रतिहारभक्तिके भागी हैं ॥ ६ ॥ |
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७९
अथ यदूर्ध्वमपराह्नात्प्रागस्तमयात्स उपद्रवस्तद-
स्यारण्या अन्वायत्तास्तस्मात्ते पुरुषं दृष्ट्वा कक्षꣳश्व-
भ्रमित्युपद्रवन्त्युपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ७ ॥
तथा आदित्यका जो रूप अपराह्नके पश्चात् और सूर्यास्तसे पूर्व होता है वह उपद्रव है। उसके उस रूपके अनुगामी वन्य पशु हैं। इसीसे वे पुरुषको देखकर भयवश अरण्य अथवा गुहामें भाग जाते हैं, क्योंकि वे इस सामकी उपद्रवभक्तिके भागी हैं ॥ ७ ॥
| अथ यदूर्ध्वमपराह्नात्प्रागस्तमयात्स उपद्रवस्तदस्यारण्याः पशवोऽन्वायत्ताः । तस्मात्ते पुरुषं दृष्ट्वा भीताः कक्षमरण्यं श्वभ्रं भयशून्यमित्युपद्रवन्त्युपगच्छन्ति; दृष्ट्रोपद्रावणादुपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥७॥ | तथा आदित्यका जो रूप अपराह्नके पश्चात् और सूर्यास्तके पूर्व होता है वह उपद्रव है। उसके उस रूपके अनुगामी वन्य पशु हैं। इसीसे वे पुरुषको देखकर भयभीत हो कक्ष—वनमें अथवा भयशून्य गुहामें भाग जाते हैं। इस प्रकार देखकर भागनेके कारण वे इस सामकी उपद्रवभक्तिके भागी हैं ॥७॥ |
—: ० :—
अथ यत्प्रथमास्तमिते तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वा-
यत्तास्तस्मान्निदधति निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्न
एवं खल्वमुमादित्यꣳसप्तविधꣳसामोपास्ते ॥ ८ ॥
तथा आदित्यका जो रूप सूर्यास्तसे पूर्व होता है वह निधन है। उसके उस रूपके अनुगत पितृगण हैं; इसीसे [श्राद्धकालमें] उन्हें [पितृ-पितामह आदिरूपसे दर्भपर] स्थापित करते हैं, क्योंकि वे पितृ-गण निश्चय ही इस सामकी निधनभक्तिके पात्र हैं। इसी प्रकार इस आदित्यरूप सप्तविध सामकी उपासना करते हैं ॥ ८ ॥
१८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| अथ यत्प्रथमास्तमितेऽदर्शनं जिगमिषति सवितरि तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वायत्तास्तस्मात्तान्निदधति पितृपितामहप्रपितामहरूपेण दर्भेषु निक्षिपन्ति तांस्तदर्थं पिण्डान्वा स्थापयन्ति । निधनसंबन्धान्निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्नः पितरः। एवमवयवशः सप्तधा विभक्तं खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपास्ते यस्तस्य तदापत्तिः फलमिति वाक्यशेषः ॥ ८ ॥ | तथा सूर्यास्तसे पूर्व अर्थात् सूर्य जब अदृश्य होना चाहता है उस समय उसका जो रूप है वह निधन है। उसके उस रूपके अनुगत पितृगण हैं। इसीसे उन्हें निहित करते हैं अर्थात् पिता, पितामह और प्रपितामहरूपसे उन्हें दर्भोंपर स्थापित करते हैं अथवा उनके उद्देश्यसे पिण्ड रखते हैं । इस प्रकार निधनका सम्बन्ध होनेके कारण वे पितृगण इस सामकी निधनभक्तिके पात्र हैं । इस प्रकार अवयवरूपसे सात भागोंमें विभक्त हुए इस आदित्यरूप सप्तविध सामकी जो उपासना करता है उसे आदित्यरूपताकी प्राप्ति होनारूप फल मिलता है—यह वाक्यशेष है ॥८॥ |
<br>इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥
दशम खण्ड
मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना
| मृत्युरादित्यः अहोरात्रादि-कालेन जगतः प्रमापयितृत्वा-त्तस्यातितरणायेदं सामोपासन-मुपदिश्यते— | दिवस और रात्रि आदि कालके द्वारा जगत्का प्रमापयिता [ अर्थात् वधकर्ता ] होनेके कारण आदित्य मृत्यु है, उसे पार करनेके लिये इस सामोपासनाका उपदेश किया जाता है— |
अथ खल्वात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधꣳसामो-
पासीत हिङ्कार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं
तत्समम् ॥ १ ॥
अब [ यह बतलाया जाता है कि ] समान अक्षरोंवाले मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना करे। 'हिंकार' यह तीन अक्षरोंवाला है तथा 'प्रस्ताव' यह भी तीन अक्षरोंवाला है, अतः उसके समान है ॥ १ ॥
| अथ खल्वनन्तरमादित्य-मृत्युविषयसामोपासनस्यात्मसं-मितं स्वावयवतुल्यतया मितं परमात्मतुल्यतया वा संमित-मतिमृत्यु मृत्युजयहेतुत्वात् । | अब निश्चय ही आदित्यरूप मृत्यु-के विषयभूत सामकी उपासनाके पश्चात् आत्मसंमित—अपने अवयवों ( सामावयवों ) की तुल्यताद्वारा परिमिति अथवा परमात्मसदृशताके कारण ज्ञात, जो मृत्युको जीतनेका हेतु होनेके कारण अतिमृत्यु है, [ उस सप्तविध सामकी उपासना |
१८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| यथा प्रथमेऽध्याय उद्गीथभक्ति-<br>नामाक्षराण्युद्गीथ इत्युपास्यत्वे-<br>नोक्तानि, तथेह साम्नः सप्त-<br>विधभक्तिनामाक्षराणि समाहृत्य<br>त्रिभिस्त्रिभिः समतया सामत्वं<br>परिकल्प्योपास्यत्वेनोच्यन्ते ।<br><br>तदुपासनेन मृत्युगोचराक्षर-<br>संख्यासामान्येन तं मृत्युं प्राप्य<br>तदतिरिक्ताक्षरेण तस्यादित्यस्य<br>मृत्योरतिक्रमणायैव संक्रमणं<br>कल्पयति । अतिमृत्यु सप्तविधं<br>सामोपासीत मृत्युमतिक्रान्त-<br>मतिरिक्ताक्षरसंख्ययेत्यतिमृत्यु<br>साम । तस्य प्रथमभक्तिनामा-<br>क्षराणि हिङ्कार इत्येतत्त्र्यक्षरं<br>भक्तिनाम । प्रस्ताव इति च | करे—यह बतलाया जाता है ] जिस<br>प्रकार प्रथम अध्यायमें उद्गीथभक्ति<br>के नामके अक्षर 'उद्गीथ हैं' इस<br>प्रकार उपास्यरूपसे बतलाये गये हैं,<br>उसी प्रकार यहाँ सामकी सात<br>प्रकारकी भक्तियोंके नामोंके अक्षरोंको<br>एकत्रित कर तीन-तीन अक्षरोंद्वारा<br>समत्व होनेके कारण उनके सामत्व-<br>की कल्पना कर उन्हें उपास्यरूपसे<br>बतलाया जाता है ।<br><br>मृत्युके विषयभूत अक्षरोंकी संख्या<br>[जो इक्कीस है उस] की सदृशताके<br>कारण उन अक्षरोंकी उपासना करनेसे<br>मृत्यु (आदित्य) को प्राप्तकर उनसे<br>अतिरिक्त अक्षरद्वारा उस आदित्यरूप<br>मृत्युके अतिक्रमणके लिये ही श्रुति<br>[ उपासकके ] संक्रमणकी कल्पना<br>करती है* [ श्रुतिमें जो कहा है<br>कि ] अतिमृत्यु सप्तविध सामकी<br>उपासना करे सो अतिरिक्त अक्षर-<br>संख्या (बाईसवीं) के द्वारा मृत्युका<br>अतिक्रमण करनेके कारण साम<br>अतिमृत्यु है । उस सामकी प्रथम<br>भक्तिके नामाक्षर 'हिंकार' हैं, यह<br>भक्तिनाम तीन अक्षरोंवाला है; तथा |
* यह बात आगे पाँचवें मन्त्रमें स्पष्ट कर दी गयी है।
खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ १८३
| भक्तेस्त्र्यक्षरमेव नाम तत्पूर्वेण समम् ॥ १ ॥ | ‘प्रस्ताव’ यह प्रस्तावभक्तिका नाम भी तीन अक्षरोंवाला ही है, अतः यह पहले नामके समान है ॥ १ ॥ |
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आदिरिति द्व्यक्षरं प्रतिहार इति चतुरक्षरं तत इहैकं तत्समम् ॥ २ ॥
‘आदि’ यह दो अक्षरोंवाला नाम है और ‘प्रतिहार’ यह चार अक्षरोंवाला नाम है। इसमेंसे एक अक्षर निकालकर आदिमें मिलानेसे वे समान हो जाते हैं ॥ २ ॥
| आदिरिति द्व्यक्षरं सप्तविधस्य साम्नः संख्यापूरण ओङ्कार आदिरित्युच्यते । प्रतिहार इति चतुरक्षरम् । तत इहैकक्षरमवच्छिद्याक्षरयोः प्रक्षिप्यते । तेन तत्सममेव भवति ॥ २ ॥ | ‘आदि’ यह दो अक्षरोंवाला है। सात प्रकारके सामकी संख्याको पूर्ण करनेमें ओङ्कार ‘आदि’ इस नामसे कहा जाता है। तथा ‘प्रतिहार’ चार अक्षरोंवाला नाम है। यहाँ उसमेंसे एक अक्षर निकालकर आदिके दो अक्षरोंमें मिला दिया जाता है। इससे वह उसके समान ही हो जाता है ॥ २ ॥ |
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उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षरमतिशिष्यते त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ ३ ॥
‘उद्गीथ’ यह तीन अक्षरोंका और ‘उपद्रव’ यह चार अक्षरोंका नाम है। ये दोनों तीन-तीन अक्षरोंमें तो समान हैं; किंतु एक अक्षर बच रहता है। अतः [ ‘अक्षर’ होनेके कारण ] तीन अक्षरोंवाला होनेसे तो वह [ एक ] भी उनके समान ही है ॥ ३ ॥
१८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षरमतिशिष्यतेऽतिरिच्यते। तेन वैषम्ये प्राप्ते साम्नः समत्वकरणायाह तदेकमपि सदक्षरमिति त्र्यक्षरमेव भवति। अतस्तत्समम् ॥ ३ ॥ | 'उद्गीथ' यह नाम तीन अक्षरोंवाला है और 'उपद्रव' यह चार अक्षरोंवाला। तीन-तीन अक्षरोंसे ये समान हैं, किंतु एक अक्षर बच रहता है यानी बढ़ता है। उसके कारण इनमें विषमता प्राप्त होनेपर सामका समत्व करनेके लिये श्रुति कहती है कि वह एक होनेपर भी 'अक्षर' है, इसलिये वह नाम भी तीन अक्षरोंवाला ही है। अतः उन्हींके समान है ॥ ३ ॥ |
निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥
'निधन' यह नाम तीन अक्षरोंका है, अतः यह उनके समान ही है। वे ही ये बाईस अक्षर हैं ॥ ४ ॥
| निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति। एवं त्र्यक्षरसमतया सामत्वं संपाद्य यथाप्राप्तान्येवाक्षराणि संख्यायन्ते। तानि ह वा एतानि सप्तभक्तिनामाक्षराणि द्वाविंशतिः ॥ ४ ॥ | 'निधन' यह तीन अक्षरोंवाला नाम है, अतः यह उनके समान ही है। इस प्रकार तीन अक्षरोंमें समानता होनेके कारण उनका सामत्व सम्पादित कर इस प्रकार प्राप्त हुए अक्षरोंकी गणना की जाती है—निश्चय ही वे ये सात भक्तियोंके नामाक्षर बाईस हैं ॥ ४ ॥ |
—: ० :—
खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ १८५
एकविंशत्यादित्यमाप्नोत्येकविंशो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविंशेन परमादित्याज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् ॥ ५ ॥
इक्कीस अक्षरोंद्वारा साधक आदित्यलोकं प्राप्त करता है, क्योंकि इस लोकसे वह आदित्य निश्चय ही इक्कीसवाँ है । बाईसवें अक्षरद्वारा वह आदित्यसे परे उस दुःखहीन एवं शोकरहित लोकको जीत लेता है ॥ ५ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| तत्रैकविंशत्यक्षरसंख्ययादित्यमाप्नोति मृत्युम् । यस्मादेकविंश इतोऽस्माल्लोकादसावादित्यः संख्यया । "द्वादश मासाः पञ्चर्तवस्त्रय इमे लोका असावादित्य एक विँशः" इति श्रुतेः । अतिशिष्टेन द्वाविंशेनाक्षरेण परं मृत्योरादित्याज्जयत्याप्नोतीत्यर्थः । यच्च तदादित्यात्परं किं तत् ? नाकं कमिति सुखं तस्य प्रतिषेधोऽकं तन्न भवतीति नाकं कमेवेत्यर्थः, अमृत्युविषयत्वात् । विशोकं च तद्विगतशोकं मानसदुःखरहितमित्यर्थः । तदाप्नोतीति ॥ ५ ॥ | वहाँ वह इक्कीस अक्षर-संख्याके द्वारा तो आदित्यलोकरूप मृत्युको प्राप्त करता है, क्योंकि इस लोककी अपेक्षा वह आदित्यलोक संख्यामें इक्कीसवाँ है। जैसा कि "बारह महीने, पाँच ऋतुएँ, तीन ये लोक और इक्कीसवाँ वह आदित्यलोक', इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है। बचे हुए बाईसवें अक्षरद्वारा वह मृत्यु यानी आदित्यलोकसे परे उत्कृष्ट लोकको जीत लेता यानी प्राप्त कर लेता है। उस आदित्यलोकसे जो परे है वह क्या है ? वह नाक है—क सुखको कहते हैं उसका प्रतिषेधक अक है, वह जिसमें न हो उसे नाक कहते हैं; अर्थात् मृत्युका विषय न होनेके कारण वह क (सुख) ही है। तथा वह विशोक—शोकरहित अर्थात् मानसिक दुःखसे हीन है। उसी (लोक) को वह प्राप्त कर लेता है ॥ ५ ॥ |
—: • :—
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| उक्तस्यैव पिण्डितार्थमाह— | श्रुति ऊपर कही हुई बातका ही सारांश कहती है— |
१८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
|---|
आप्नोति हादित्यस्य जयं परो हास्यादित्यजया-
जयो भवति य एतदेवं विद्वानात्मसंमितमतिमृत्यु
सप्तविधᳵसामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥
[वह पुरुष] आदित्यलोककी जय प्राप्त करता है तथा उसे आदित्य-विजयसे भी उत्कृष्ट जय प्राप्त होती है, जो इस उपासनाको इस प्रकार जाननेवाला होकर आत्मसम्मित और मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना करता है—सामकी उपासना करता है ॥ ६ ॥
| एकविंशतिसंख्ययादित्यस्य जयमाप्नोति । परो हास्यैवंविद आदित्यजयान्मृत्युगोचरात्परो जयो भवति द्वाविंशत्यक्षरसंख्ययेत्यर्थः । य एतदेवं विद्वानित्याद्युक्तार्थम् । तस्यैतद्यथोक्तं फलमिति । द्विरभ्यासः सप्तविध्यसमाप्त्यर्थः ॥ ६ ॥ | इक्कीसवीं अक्षर-संख्याके द्वारा आदित्यलोककी जय प्राप्त करता है; अतः तात्पर्य यह है कि इस प्रकार जाननेवाले इस उपासकको बाईसवीं अक्षर-संख्याके द्वारा इस मृत्युगोचर आदित्यजयकी अपेक्षा भी उत्कृष्ट जय प्राप्त होती है । 'य एतदेवं विद्वान्' इत्यादि वाक्यका अर्थ पहले कहा जा चुका है; उसे यह उपर्युक्त फल प्राप्त होता है । 'सामोपास्ते-सामोपास्ते' यह द्विरुक्ति उपासनाकी सप्तविधताकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ ६ ॥ |
—: ० :—
इति च्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये दशमखण्ड-भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥
—: ० :—
एकादश खण्ड
गायत्रसामकी उपासना
| विना नामग्रहणं पञ्चविधस्य सप्तविधस्य च साम्न उपासनमु- | [यहाँतक] बिना नाम लिये पञ्चविध एवं सप्तविध सामकी उपासनाका |
खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८७
| शाङ्करभाष्यम् | भाषार्थ |
|---|---|
| क्तम्। अथेदानों गायत्रादिनामग्रहणपूर्वकं विशिष्टफलानि सामोपासनान्तराण्युच्यन्ते । यथाक्रमं गायत्रादीनां कर्मणि प्रयोगस्तथैव— | वर्णन किया गया। अब आगे 'गायत्र' आदि नाम लेकर विशिष्ट फलवती अन्य सामोपासनाओं का उल्लेख किया जाता है। गायत्र आदि उपासनाओंका उनके क्रमके अनुसार कर्ममें प्रयोग किया जाता है; उसीके अनुसार— |
मनो हिंकारो वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतम् ॥ १ ॥
मन हिंकार है, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, श्रोत्र प्रतिहार है और प्राण निधन है। यह गायत्रसंज्ञक साम प्राणोंमें प्रतिष्ठित है ॥ १ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाषार्थ |
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| मनो हिंकारो मनसः सर्वकरणवृत्तीनां प्राथम्यात् । तदानन्तर्याद्वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रेष्ठ्यात् । श्रोत्रं प्रतिहारः प्रतिहृतत्वात् । प्राणो निधनं यथोक्तानां प्राणे निधनात्स्वापकाले । एतद्गायत्रं साम प्राणेषु प्रोतं गायत्र्याः प्राणसंस्तुतत्वात् ॥ १ ॥ | सम्पूर्ण इन्द्रियवृत्तियोंमें मनकी प्रथमता होनेके कारण मन हिंकार है, उसका पश्चाद्वर्ती होनेसे वाक् प्रस्ताव है, उत्कृष्ट होनेके कारण चक्षु उद्गीथ है, प्रतिहृत होनेके कारण श्रोत्र प्रतिहार है तथा प्राण निधन है, क्योंकि सुषुप्तिकालमें पूर्वोक्त सम्पूर्ण इन्द्रियवर्ग प्राणमें लीन हो जाते हैं। यह गायत्रसंज्ञक साम प्राणोंमें प्रतिष्ठित है, क्योंकि गायत्रीका प्राणरूपसे स्तवन किया गया है ॥१॥ |
स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या महामनाः स्यात्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
वह जो इस प्रकार गायत्रसंज्ञक सामको प्राणोंमें प्रतिष्ठित जानता है, प्राणवान् होता है, पूर्ण आयुका उपभोग करता है, प्रशस्त जीवनलाभ करता है, प्रजा और पशुओं द्वारा महान् होता है तथा कीर्तिके द्वारा भी महान् होता है। वह महामना (उदारहृदय) होवे—यही उसका व्रत है ॥२॥
१८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति । अविकलकरणो भवतीत्येतत् । सर्वमायुरेति । “शतं वर्षाणि सर्वमायुः पुरुषस्य” इति श्रुतेः । ज्योगुज्ज्वलं जीवति । महान्भवति प्रजादिभिर्महांश्च कीर्त्या । गायत्रोपासकस्यैतद्व्रतं भवति यन्महामनस्त्वम्, अक्षुद्रचित्तः स्यादित्यर्थः ॥ २ ॥ | वह जो इस प्रकार इस गायत्र-संज्ञक सामको प्राणोंमें प्रतिष्ठित जानता है, प्राणवान् होता है अर्थात् अविकल इन्द्रियवान् होता है, वह पूर्ण आयुका उपभोग करता है। “पुरुषकी पूर्ण आयु सौ वर्ष है”—ऐसी श्रुति है। ज्योक्—उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है; प्रजादिके कारण भी महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। यह जो महामनस्त्व (विशालहृदयता) है, गायत्रोपासकका व्रत है अर्थात् उसे उदारचित्त होना चाहिये ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥११॥
द्वादश खण्ड
रथन्तरसामकी उपासना
अभिमन्थति स हिंकारो धूमो जायते स प्रस्तावो ज्वलति स उद्गीथोऽङ्गारा भवन्ति स प्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनꣳसंशाम्यति तन्निधनमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतम् ॥ १ ॥
अभिमन्थन करता है—यह हिंकार है, धूम उत्पन्न होता है—यह प्रस्ताव है, प्रज्वलित होता है—यह उद्गीथ है, अङ्गार होते हैं—यह प्रतिहार है तथा शान्त होने लगता है—यह निधन है और सर्वथा शान्त हो जाता है—यह भी निधन है। रथन्तरसाम अग्निमें प्रतिष्ठित है ॥१॥
खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १८९
| अभिमन्थति स हिंकारः प्राथम्यात् । अग्नेर्धूमो जायते स प्रस्ताव आनन्तर्यात् । ज्वलति स उद्गीथो हविःसंबन्धाच्छ्रैष्ठ्यं ज्वलनस्य । अङ्गारा भवन्ति स प्रतिहारोऽङ्गाराणां प्रतिहृतत्वात् । उपशमः सावशेषत्वाग्नेः संशमो निःशेषोपशमः समाप्तिसामान्यान्निधनम् । एतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतम्; मन्थने ह्यग्नेर्गीयते ॥ १ ॥ | [ अग्निका ] अभिमन्थन करता है—यह सर्वप्रथम होनेके कारण हिंकार है । अग्निसे जो धुआँ उत्पन्न होता है वह इसका पश्चाद्वर्ती होनेके कारण प्रस्ताव है । अग्नि जलता है—यह उद्गीथ है; हविका सम्बन्ध होनेके कारण अग्निके प्रज्वलित होनेकी श्रेष्ठता है । अङ्गार होते हैं—यह प्रतिहार है, क्योंकि अङ्गारोंका प्रतिहरण किया जाता है। अग्निके बुझनेमें कसर रह जानेके कारण उपशम और उसका सर्वथा शान्त हो जाना संशम रूप निधन हैं, क्योंकि उसके साथ समाप्तिमें इनकी समानता है। यह रथन्तरसाम अग्निमें अनुस्यूत है तथा यह अग्नि-मन्थनकालमें गाया जाता है ॥ १ ॥ |
स य एवमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न प्रत्यङ्ङग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत्तद्व्रतम्॥२॥
वह, जो पुरुष इस प्रकार इस रथन्तरसामको अग्निमें अनुस्यूत जानता है वह ब्रह्मतेजःसम्पन्न और अन्नका भोक्ता होता है, पूर्ण जीवनका उपभोग करता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण महान् होता है । अग्निकी ओर मुख करके भक्षण न करे और न थूके ही—यह व्रत है ॥ २ ॥
| स य इत्यादि पूर्ववत् । ब्रह्मवर्चसी वृत्तस्वाध्यायनिमित्तं | 'स यः' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये । ब्रह्मवर्चसी—सदाचार और स्वाध्यायके |
१९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| तेजो ब्रह्मवर्चसम्, तेजस्तु केवलं त्विड्भावः । अन्नादो दीप्ताग्निः । न प्रत्यङ्ङग्नेरभिमुखो नाचामेन भक्षयेत्किञ्चिन्न निष्ठीवेच्च श्लेष्मनिरसनं च न कुर्यात्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | निमित्तसे प्राप्त हुआ तेज 'ब्रह्मवर्चस्' कहलाता है, केवल तेज तो त्विङ्-भाव ( कान्ति ) का नाम है। 'अन्नाद' का अर्थ दीप्ताग्नि है। अग्निकी ओर मुख करके आचमन यानो कुछ भी भक्षण न करे और न निष्ठीवन—श्लेष्मा ( कफ ) का ही त्याग करे—यह व्रत है ॥ २ ॥ |
—: ० :— इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥ —: ० :—
त्रयोदश खण्ड
वामदेव्यसामकी उपासना
उपमन्त्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रति स्त्रीं सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमे तद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् १
पुरुष जो संकेत करता है, वह हिंकार है; जो तोष देता (प्रसन्न करनेके लिये मीठी बातें कहता) है, वह प्रस्ताव है; स्त्रीके साथ जो सोता है वह उद्गीथ है; अपनी अनेक पत्नियोंमेंसे प्रत्येकके साथ जो शयन (अनुकूल बर्ताव) करता है, वह प्रतिहार है; मिथुनद्वारा जो समय बिताता है, वह निधन है; मैथुन आदि क्रियाकी जो समाप्ति करता है, वह भी निधन ही है, यह वामदेव्य साम मिथुनमें ओत-प्रोत है ॥ १ ॥
| उपमन्त्रयते संकेतं करोति प्राथम्यात्स हिंकारः। ज्ञपयते तोषयति स प्रस्तावः। सहशयनमेकपर्यङ्कगमनं स उद्गीथः श्रैष्ठ्यात्। प्रतिस्त्रीं | पुरुष जो उपमन्त्रण—संकेत करता है, वह प्रथम होनेसे हिंकार है। जो ज्ञापन करता—मीठी बातें कह-कर तोष देता है, वह प्रस्ताव है। स्त्री-पुरुषका जो साथ सोना—एक शय्यापर जाना है, वह उद्गीथ है, क्योंकि उत्तम |
खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १९१
| शयनं स्त्रियोऽभिमुखीभावः स प्रतिहारः। कालं गच्छति मैथुनेन पारं समाप्तिं गच्छति तन्निधनम् । एतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम्, वाय्वम्बुमिथुनसम्बन्धात् ॥१॥ | सन्तानकी प्राप्तिका हेतु होनेके कारण) वह उत्कृष्ट है। अपनी अनेक पत्नियोंमेंसे प्रत्येकके साथ जो शयन करना—सम्मुख या अनुकूल होना है, वह प्रतिहार है। पुरुष मिथुनद्वारा जो समय बिताता है तथा मैथुनक्रियाकी जो समाप्ति करता है, वह निधन है। यह वामदेव्य साम मिथुनमें ओतप्रोत है; क्योंकि वायु और जलके मिथुन (जोड़े) से इसका सम्बन्ध है ॥ १ ॥ |
स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनी भवति मिथुनान्मिथुनात्प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न काञ्चन परिहरेत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
जो पुरुष इस प्रकार इस वामदेव्य सामको मिथुनमें ओतप्रोत जानता है, वह मिथुनवान् (दाम्पत्य-सुखसे सम्पन्न) होता है, प्रत्येक मैथुनसे संतानको जन्म देता है। सारी आयुका उपभोग करता है, उज्ज्वल जीवन बिताता है। प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। जिस उपासकके अनेक पत्नियाँ हों वह उनमेंसे किसीका भी परित्याग न करे, यह (वामदेव्योपासकका) व्रत है ॥ २ ॥
| स य इत्यादि पूर्ववत्। मिथुनी भवत्यविधुरो भवतीत्यर्थः। मिथुनान्मिथुनात्प्रजायत इत्यमोघरेतस्त्वमुच्यते। न काञ्चन काञ्चिदपि स्त्रियंस्वात्मन्नन्यप्राप्तां न परिहरेत्स- | 'स यः' इत्यादि मन्त्रभागका अर्थ पूर्ववत् है। मिथुनवान् होता है अर्थात् कभी विधुर (पत्नीके संयोग-सुखसे वञ्चित) नहीं होता है। मिथुन-मिथुनसे संतानको जन्म देता है, इस कथनके द्वारा उसकी अमोघवीर्यता बतायी जाती है। अपनी बहुत-सी स्त्रियोंमेंसे जो कोई जब कभी समागमकी इच्छा लेकर अपनी शय्यापर आ जाय, उसका परित्याग न |
१९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| १९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| मागमागमिनीम्, वामदेव्यसामोपासनाङ्गत्वेन विधानात्। एतस्मादन्यत्रप्रतिषेधस्मृतयः। वचनप्रामाण्याच्च धर्माविगतेर्न प्रतिषेधशास्त्रेणास्य विरोधः ॥ २ ॥ | करे; क्योंकि वामदेव्य सामोपासनाके अङ्गरूपसे इसका विधान किया गया है। स्मृतियोंके निषेध-वचन इस वामदेव्योपासनासे अन्यत्र ही लागू होते हैं। श्रुतिके वचनोंके प्रमाणसे ही धर्मका निश्चय होता है, अतः निषेधशास्त्रके साथ इस विधिका विरोध नहीं है ॥ २ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥
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चतुर्दश खण्ड
बृहत्सामकी उपासना
उद्यन्हिङ्कार उदितः प्रस्तावो मध्यन्दिन उद्गीथोऽपराह्नः प्रतिहारोऽस्तंयन्निधनमेतद्बृहदादित्येप्रोतम् ॥ १ ॥
उदित होता हुआ सूर्य हिंकार है, उदित हुआ प्रस्ताव है, मध्याह्नकालिक सूर्य उद्गीथ है, मध्याह्नोत्तरकालिक प्रतिहार है और जो अस्तमित होनेवाला सूर्य है, वह निधन है । यह बृहत्साम सूर्यमें स्थित है ॥ १ ॥
| उद्यन्सविता स हिंकारः। प्राथम्याद्दर्शनस्य । उदितः प्रस्तावः प्रस्तवनहेतुत्वात्कर्मणाम् । मध्यन्दिन उद्गीथः श्रेष्ठत्वात् । अपराह्नः प्रतिहारः पश्वादीनां गृहान् प्रति हरणात् । यदस्तं यंस्तन्निधनं रात्रौ गृहे निधानात् प्राणिनाम् । एतद्बृहदादित्ये प्रोतं बृहत आदित्यदैवत्यत्वात् ॥ १ ॥ | उदित होता हुआ जो सूर्य है वह हिंकार है, क्योंकि उसका दर्शन सबसे पहले होता है । उदित हुआ सूर्य कर्मोंके प्रस्तवनका हेतु होनेके कारण प्रस्ताव है । मध्याह्नकालीन सूर्य उत्कृष्ट होनेके कारण उद्गीथ है । पशु आदिको घरोंकी ओर ले जानेके कारण अपराह्न सूर्य प्रतिहार है । तथा जो अस्तको प्राप्त होनेवाला सूर्य है वह रातमें सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने घरोंमें निहित करनेवाला होनेसे निधन है । यह बृहत्साम सूर्यमें स्थित है, क्योंकि बृहत्का सूर्य ही देवता है ॥ १ ॥ |
खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यं १९३
स य एवमेतद्बृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या तपन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥
वह पुरुष, जो इस प्रकार इस बृहत्सामको सूर्यमें स्थित जानता है, तेजस्वी और अन्नका भोग करनेवाला होता है । वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है । तपते हुए सूर्यकी निन्दा न करे—यह नियम है ॥ २ ॥
| स य इत्यादि पूर्ववत्। तपन्तं <br><br> न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ | ‘स यः’ इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत् है । तपते हुए सूर्यकी निन्दा न करे—यह [ बृहत्सामोपासकके लिये ] नियम है ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥