छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 178, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| १७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| तुल्यां बुद्धिमुत्पादयति; अतः सर्वेण समोऽतः साम समत्वादित्यर्थः।<br><br>उद्गीथभक्तिसामान्यवचनादेव लोकादिषूक्तसामान्याद्धिंकारादित्वं गम्य इति हिंकारादित्वे कारणं नोक्तम्। सामत्वे पुनः सवितुरनुक्तं कारणं न सुबोधमिति समत्वमुक्तम् ॥ १ ॥ | सबमें समान बुद्धि उत्पन्न करता है, [ क्योंकि उसे सभी प्राणी अपने-अपने सम्मुख देखते हैं ] इसलिये वह सबके साथ समान है; अतः इस समताके कारण वह साम है।<br><br>उद्गीथभक्तिमें समानता बतलानेसे ही [ अर्थात् उद्गीथके साथ आदित्यका ऊर्ध्वत्वमें सादृश्य है—ऐसा जो श्रुतिने कहा है उसके अनुसार ही ] लोकादिमें भी [ सामावयवोंके साथ ] सादृश्य बतलाये जानेसे उनका हिंकारादिरूप होना ज्ञात होता है—इसीसे [ श्रुतिमें आदित्यावयवोंके ] हिंकारादिरूप होनेमें कारण नहीं बतलाया गया था।* किंतु आदित्यकी सामरूपतामें न बतलाया गया कारण सुगमतासे नहीं जाना जा सकता इसलिये उसके सम्बन्धमें समत्वरूप कारण बतलाया गया है ॥ १ ॥ |
तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात्तस्य यत्पुरोदयात्स हिंकारस्तदस्य पशवोऽन्वायत्तास्तस्मात्ते हिं कुर्वन्ति हिंकारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥२॥
उस आदित्यमें ये सम्पूर्ण भूत अनुगत हैं—ऐसा जाने। जो उस आदित्यके उदयसे पूर्व है वह हिंकार है। उस सूर्यका जो हिंकाररूप है
* क्योंकि लोकादिके हिंकारादिरूप होनेमें जो-जो कारण हैं, वे ही आदित्यावयवोंके सम्बन्धमें भी समझे जा सकते हैं।