भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 179

खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७५ ※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※

उसके पशु अनुगत हैं, इससे वे हिंकार करते हैं। अतः वे ही इस आदित्यरूप सामके हिंकारभाजन हैं ॥ २ ॥

| तस्मिन्नादित्येऽवयवविभागश इमानि वक्ष्यमाणानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तान्यनुगतान्यादित्यमुपजीव्यत्वेनेति विद्यात् । कथम् ? तस्यादित्यस्य यत्पुरोदयाद्धर्मरूपम्, स हिंकारो भक्तिस्तत्रेदं सामान्यं यत्तस्य हिंकारभक्तिरूपम् । | उस आदित्यमें ये आगे बतलाये जानेवाले समस्त भूत अवयवविभागानुसार उसके उपजीव्य रूपसे अन्वायत्त — अनुगत हैं—ऐसा जाने । वे किस प्रकार अनुगत हैं ? [ यह बतलाते हैं—] उस आदित्यका उदयसे पहले जो धर्मरूप ( धर्मानुष्ठानका प्रेरक स्वरूप) है वह हिंकारभक्ति है। उस धर्मरूपमें यही सादृश्य है कि वह उस ( आदित्यसंज्ञक साम ) का हिंकारभक्तिरूप है । | | तदस्यादित्यस्य साम्नः पशवो गवाद्योऽन्वायत्ता अनुगतास्तद्भक्तिरूपमुपजीवन्तीत्यर्थः । यस्मादेवं तस्मात्ते हिंकुर्वन्ति पशवः प्रागुदयात् । तस्माद्धिंकारभाजिनो ह्येतस्यादित्याख्यस्य साम्नः तद्भक्तिभजनशीलत्वाद्वि त एवं वर्तन्ते ॥ २ ॥ | उस इस आदित्यरूप सामके गौ आदि पशु अन्वायत्त—अनुगत हैं; अर्थात् उस हिंकारभक्तिरूपसे उसमें उपजीवी हैं । क्योंकि ऐसा है इसीलिये वे पशु सूर्योदयसे पूर्व हिंकार-शब्द करते हैं । अतः वे इस आदित्यसंज्ञक सामके हिंकारपात्र हैं । उस हिंकारभक्तिके सेवनमें तत्पर रहनेसे ही वे इस प्रकार बर्ताव करते हैं [ अर्थात् सूर्योदयसे पूर्व हिंकार करते हैं ] ॥ २ ॥ |

—: ० :—

अथ यत्प्रथमोदिते स प्रस्तावस्तदस्य मनुष्या अन्वायत्तास्तस्मात्ते प्रस्तुतिकामाः प्रशꣳसाकामाः प्रस्तावभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ३ ॥