भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 180
१७६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

तथा सूर्यके पहले-पहल उदित होनेपर जो रूप होता है वह प्रस्ताव है । उसके उस रूपके मनुष्य अनुगामी हैं, अतः वे प्रस्तुति [प्रत्यक्षस्तुति] और प्रशंसा [ परोक्षस्तुति ] की इच्छावाले हैं, क्योंकि वे इस सामकी प्रस्तावभक्तिका सेवन करनेवाले हैं ॥ ३ ॥

अथ यत्प्रथमोदिते सवितृ- <br><br> रूपं तदस्यादित्याख्यस्य साम्नः <br><br> प्रस्तावस्तदस्य मनुष्या अन्वा- <br><br> यत्ताः पूर्ववत् । तस्मात्ते प्रस्तुतिं <br><br> प्रशंसां कामयन्ते। यस्मात्प्रस्ता- <br><br> वभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ३ ॥तथा सूर्यके पहले-पहल उदित होनेपर जो उसका रूप होता है वह इस आदित्यसंज्ञक सामका प्रस्ताव है; पूर्ववत् [ अर्थात् पशुओं-के समान ] उसके उस रूपके मनुष्य अनुगामी हैं । इसीसे वे प्रस्तुति और प्रशंसाकी इच्छा करते हैं, क्योंकि वे इस सामके प्रस्तावका भजन करनेवाले हैं ॥ ३ ॥

अथ यत्सङ्गववेलायाँ१स आदिस्तदस्य वयाँ१स्य-<br>न्वायत्तानि तस्मात्तान्यन्तरिक्षेऽनारम्बणान्यादायात्मानं<br>परिपतन्त्यादिभाजीनि ह्येतस्य साम्नः ॥ ४ ॥

तत्पश्चात् आदित्यका जो रूप सङ्गववेलामें ( सूर्योदयके तीन मुहूर्त्त पश्चात् कालमें ) रहता है वह आदि है । उसके उस रूपके अनुगत पक्षिगण हैं; क्योंकि वे इस सामके आदिका भजन करनेवाले हैं, इसलिये वे अन्तरिक्षमें अपनेको निराधाररूपसे सब ओर ले जाते हैं ॥ ४ ॥

अथ यत्सङ्गववेलायां गवां <br><br> रश्मीनां सङ्गमनं सङ्गमो यस्यां <br><br> वेलायां गवां वा वत्सैः सा सङ्ग-तत्पश्चात् सङ्गववेलामें—जिस वेलामें गो यानी सूर्यकिरणोंका सङ्गम होता है अथवा जिसमें गौओंका बछड़ोंसे सङ्गम होता है उसे सङ्गववेला