छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७७
| बवेला तस्मिन्काले यत्सावित्रं रूपं स आदिर्भक्तिविशेष ओङ्कारस्तदस्य वयांसि पक्षिणोऽन्वायत्तानि ।<br><br>यत एवं तस्मात्तानि वयांस्यन्तरिक्षेऽनारम्बणान्यनालम्बनान्यात्मानमादायात्मानमेवालम्बनत्वेन गृहीत्वा परिपतन्ति गच्छन्त्यत आकारसामान्यादादिभक्तिभाजीनि ह्येतस्य साम्नः ॥ ४ ॥ | कहते हैं, उस कालमें सूर्यदेवका जो रूप होता है वह आदि—भक्तिविशेष ओङ्कार है । उसके उस रूपके अनुगामी पक्षिगण हैं ।<br><br>क्योंकि ऐसा है इसलिये वे पक्षिगण आकाशमें अनारम्बण—बिना आश्रयके ही अपनेको आलम्बनरूपसे ग्रहण कर सब ओर जाते हैं । अतः [ 'आदायात्मानं परिपतन्ति' इसके आरम्भमें ] आकाररूप सादृश्य होनेके कारण वे इस सामकी आदि-संज्ञक भक्तिके भागी हैं ॥ ४ ॥ |
अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने स उद्गीथस्तदस्य देवा अन्वायत्तास्तस्मात्ते सत्तमाः प्राजापत्यानामुद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ५ ॥
तथा अब जो मध्यदिवसमें आदित्यका रूप होता है वह उद्गीथ है । इसके उस रूपके देवतालोग अनुगत हैं । इसीसे वे प्रजापतिसे उत्पन्न हुए प्राणियोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे इस सामकी उद्गीथभक्तिके भागी हैं ॥ ५ ॥
| अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिन ऋजुमध्यन्दिन इत्यर्थः । स उद्गीथभक्तिस्तदस्य देवा अन्वा- | तथा अब जो सम्प्रति मध्यन्दिनमें अर्थात् ठीक मध्याह्नमें [ आदित्यका रूप होता ] है वह उद्गीथभक्ति है; उसके उस रूपके अनुगामी देवता- |