छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 177, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 177
नवम खण्ड
आदित्यविषयिणी सात प्रकारकी सामोपासना
अथ खल्वमुमादित्यंसप्तविधꣳसामोपासीत सर्वदा समस्तेन साम मां प्रति मां प्रतीति सर्वेण समस्तेन साम ॥ १ ॥
अब उस आदित्यके रूपमें सप्तविध सामकी उपासना करनी चाहिए। आदित्य सर्वदा सम है, इसलिये वह साम है। मेरे प्रति, मेरे प्रति ऐसा अनुभूत होनेके कारण वह सबके प्रति सम है, इसलिये साम है ॥१॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| अवयवमात्रे साम्न्यादित्यदृष्टिः पञ्चविधेषूक्ता प्रथमे चाध्याये । अथेदानीं खल्वमुमादित्यं समस्ते साम्न्यवयवविभागशोऽध्यस्य सप्तविधं सामोपासीत । कथं पुनः सामत्वमादित्यस्य ? इत्युच्यते— <br><br> उद्गीथत्वे हेतुवदादित्यस्य सामत्वे हेतुः । कोऽसौ ? सर्वदा समो वृद्धिक्षयाभावात्तेन हेतुना सामादित्यो मां प्रति मां प्रतीति | पञ्चविध सामोपासनाओंके प्रसङ्गमें तथा प्रथम अध्यायमें केवल अवयवमात्र साममें आदित्यदृष्टि बतलायी गयी है। उसके बाद अब यह बताया जाता है कि उस आदित्यको समस्त साममें उसके अवयवविभागके अनुसार आरोपित कर सप्तविध सामकी उपासना करे । तो फिर आदित्यकी सामरूपता किस प्रकार है ? यह बतलाया जाता है— <br><br> आदित्यके उद्गीथरूप होनेमें जिस प्रकार हेतु है उसी प्रकार उसके सामरूप होनेमें भी है। वह हेतु क्या है ? वृद्धि और क्षयका अभाव होनेके कारण आदित्य सर्वदा सम है इसी कारणसे वह साम है। वह 'मेरे प्रति, मेरे प्रति' इस प्रकार |