छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७९
अथ यदूर्ध्वमपराह्नात्प्रागस्तमयात्स उपद्रवस्तद-
स्यारण्या अन्वायत्तास्तस्मात्ते पुरुषं दृष्ट्वा कक्षꣳश्व-
भ्रमित्युपद्रवन्त्युपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ७ ॥
तथा आदित्यका जो रूप अपराह्नके पश्चात् और सूर्यास्तसे पूर्व होता है वह उपद्रव है। उसके उस रूपके अनुगामी वन्य पशु हैं। इसीसे वे पुरुषको देखकर भयवश अरण्य अथवा गुहामें भाग जाते हैं, क्योंकि वे इस सामकी उपद्रवभक्तिके भागी हैं ॥ ७ ॥
| अथ यदूर्ध्वमपराह्नात्प्रागस्तमयात्स उपद्रवस्तदस्यारण्याः पशवोऽन्वायत्ताः । तस्मात्ते पुरुषं दृष्ट्वा भीताः कक्षमरण्यं श्वभ्रं भयशून्यमित्युपद्रवन्त्युपगच्छन्ति; दृष्ट्रोपद्रावणादुपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥७॥ | तथा आदित्यका जो रूप अपराह्नके पश्चात् और सूर्यास्तके पूर्व होता है वह उपद्रव है। उसके उस रूपके अनुगामी वन्य पशु हैं। इसीसे वे पुरुषको देखकर भयभीत हो कक्ष—वनमें अथवा भयशून्य गुहामें भाग जाते हैं। इस प्रकार देखकर भागनेके कारण वे इस सामकी उपद्रवभक्तिके भागी हैं ॥७॥ |
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अथ यत्प्रथमास्तमिते तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वा-
यत्तास्तस्मान्निदधति निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्न
एवं खल्वमुमादित्यꣳसप्तविधꣳसामोपास्ते ॥ ८ ॥
तथा आदित्यका जो रूप सूर्यास्तसे पूर्व होता है वह निधन है। उसके उस रूपके अनुगत पितृगण हैं; इसीसे [श्राद्धकालमें] उन्हें [पितृ-पितामह आदिरूपसे दर्भपर] स्थापित करते हैं, क्योंकि वे पितृ-गण निश्चय ही इस सामकी निधनभक्तिके पात्र हैं। इसी प्रकार इस आदित्यरूप सप्तविध सामकी उपासना करते हैं ॥ ८ ॥