छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 190, कुल 978 में से
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| १८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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आप्नोति हादित्यस्य जयं परो हास्यादित्यजया-
जयो भवति य एतदेवं विद्वानात्मसंमितमतिमृत्यु
सप्तविधᳵसामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥
[वह पुरुष] आदित्यलोककी जय प्राप्त करता है तथा उसे आदित्य-विजयसे भी उत्कृष्ट जय प्राप्त होती है, जो इस उपासनाको इस प्रकार जाननेवाला होकर आत्मसम्मित और मृत्युसे अतीत सप्तविध सामकी उपासना करता है—सामकी उपासना करता है ॥ ६ ॥
| एकविंशतिसंख्ययादित्यस्य जयमाप्नोति । परो हास्यैवंविद आदित्यजयान्मृत्युगोचरात्परो जयो भवति द्वाविंशत्यक्षरसंख्ययेत्यर्थः । य एतदेवं विद्वानित्याद्युक्तार्थम् । तस्यैतद्यथोक्तं फलमिति । द्विरभ्यासः सप्तविध्यसमाप्त्यर्थः ॥ ६ ॥ | इक्कीसवीं अक्षर-संख्याके द्वारा आदित्यलोककी जय प्राप्त करता है; अतः तात्पर्य यह है कि इस प्रकार जाननेवाले इस उपासकको बाईसवीं अक्षर-संख्याके द्वारा इस मृत्युगोचर आदित्यजयकी अपेक्षा भी उत्कृष्ट जय प्राप्त होती है । 'य एतदेवं विद्वान्' इत्यादि वाक्यका अर्थ पहले कहा जा चुका है; उसे यह उपर्युक्त फल प्राप्त होता है । 'सामोपास्ते-सामोपास्ते' यह द्विरुक्ति उपासनाकी सप्तविधताकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ ६ ॥ |
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इति च्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये दशमखण्ड-भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥
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एकादश खण्ड
गायत्रसामकी उपासना
| विना नामग्रहणं पञ्चविधस्य सप्तविधस्य च साम्न उपासनमु- | [यहाँतक] बिना नाम लिये पञ्चविध एवं सप्तविध सामकी उपासनाका |