छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 715, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 715
खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ७११
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अथवा सोपानारोहणवत्स्थूलादारभ्य सूक्ष्मं सूक्ष्मतरं च बुद्धिविषयं ज्ञापयित्वा तदतिरिक्ते स्वाराज्येऽभिषेक्ष्यामीति नामादीनि निर्दिदिक्षति ।<br><br>अथवा नामाद्युत्तरोत्तरविशिष्टानि तत्त्वान्यतितरां च तेषाम्युत्कृष्टतमं भूमाख्यं तत्त्वमिति तत्स्तुत्यर्थं नामादीनां क्रमेणोपन्यासः । | अथवा सीढ़ियोंपर चढ़नेके समान स्थूलसे आरम्भ करके बुद्धिके सूक्ष्म और सूक्ष्मतर विषयका ज्ञान कराकर अधिकारीको उससे अतिरिक्त स्वाराज्यपर अभिषिक्त करूँगी- इस अभिप्रायसे वह नामादिका निर्देश करना चाहती है ।<br><br>अथवा नामादि उत्तरोत्तर विशिष्ट तत्त्व हैं; उन सबकी अपेक्षा भूमासंज्ञक तत्त्व अत्यन्त उत्कृष्ट है—इस प्रकार उसकी स्तुतिके लिये नामादिका क्रमशः उल्लेख किया गया है । |
| आख्यायिका तु परविद्यास्तुत्यर्था । कथम् ? नारदो देवर्षिः कृतकर्तव्यसर्वविद्योऽपि सन्नात्मज्ञत्वाच्छुशोचैव किमु वक्तव्यमन्योऽल्पविज्जन्तुरकृतपुण्यातिशयोऽकृतार्थ इति । (आख्यायिका-प्रयोजनम्)<br><br>अथवा नान्यदात्मज्ञानान्निरतिशयश्रेयःसाधनमस्तीत्येतत्प्रदर्शनार्थं सनत्कुमारनारदाख्या- | यहाँ जो आख्यायिका है वह तो परा विद्याकी स्तुतिके लिये है । किस प्रकार ? जो अपने सारे कर्तव्य पूर्ण कर चुके थे और सर्वविद्यासम्पन्न थे उन देवर्षि नारदको भी अनात्मज्ञ होनेके कारण शोक हुआ ही, फिर जिसने अत्यन्त पुण्यसम्पादन नहीं किया और जो अकृतार्थ है ऐसे किसी अन्य अल्पज्ञ जीवकी तो बात ही क्या है ?<br><br>अथवा आत्मज्ञानसे बढ़कर और कोई कल्याणका साधन नहीं है—यह • प्रदर्शित करनेके लिये सनत्कुमार - नारद - आख्यायिकाका |