भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 714

सप्तम अध्याय

प्रथम खण्ड

नारदके प्रति सनत्कुमारका उपदेश

[वक्ष्यमाणग्रन्थारम्भप्रयोजनम्]
परमार्थतत्त्वोपदेशप्रधानपरः षष्ठोऽध्यायः सदात्मैकत्वनिर्णयपरतयैवोपयुक्तः, न सतोऽर्वाग्विकारलक्षणानि तत्त्वानि निर्दिष्टानीत्यतस्तानि नामादीनि क्रमेण निर्दिश्य तद्वारेणापि भूमाख्यं निरतिशयं तत्त्वं निर्देश्यामीति शाखाचन्द्रदर्शनवदितीमं सप्तमं प्रपाठकमारभते । अनिर्दिष्टेषु हि सतोऽर्वाक्तत्त्वेषु सन्मात्रे च निर्दिष्टेऽन्यदप्यविज्ञातं स्यादित्याशङ्का कस्यचित्स्यात्सा मा भूदिति वा तानि निर्दिदिक्षति ।प्रधानतया परमार्थतत्त्वका उपदेश करनेवाला छठा अध्याय सत् (ब्रह्म) और आत्माका एकत्व-निर्णय करनेके कारण ही उपयोगी है। उसमें सत्से निम्नतर विकाररूप तत्त्वोंका निर्देश नहीं किया गया। अतः उन नामादि तत्त्वोंका क्रमशः निरूपण कर उनके द्वारा भी शाखाचन्द्र दर्शनके समान भूमासंज्ञक निरतिशय तत्त्वका निर्देश करूँगी—इस अभिप्रायसे श्रुति यह सातवाँ प्रपाठक आरम्भ करती है। अथवा सत्से निम्नतर तत्त्वोंका निर्देश न होनेपर और केवल सन्मात्रका ही निरूपण किया जानेपर किसीको ऐसी आशङ्का हो सकती है कि अभी कुछ और भी अविज्ञात है, वह आशङ्का न हो—इस आशयसे श्रुति उनका निर्देश करना चाहती है।