भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 978 में से

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पृष्ठ 298

१६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३


हृदयान्तर्गत उत्तरसुषिभूत समानकी उपासना

अथ योऽस्योदङ् सुषिः स समानस्तन्मनः स पर्जन्यस्तदेतत्कीर्तिश्च व्युष्टिश्चेत्युपासीत कीर्तिमान्व्युष्टिमान् भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥

तथा इसका जो उत्तरीय छिद्र है वह समान है, वह मन है, वह मेघ है और वही यह कीर्ति और व्युष्टि (देहका लावण्य) है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो इस प्रकार जानता है वह कीर्तिमान् और व्युष्टिमान् होता है ॥ ४ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अथ योऽस्योदङ् सुषिरुदग्गतः सुषिस्तत्स्थो वायुविशेषः सोऽशितपीते समं नयतीति समानः। तत्संबद्धं मनोऽन्तःकरणं स पर्जन्यो वृष्ट्यात्मको देवः पर्जन्यनिमित्ताश्चाप इति, "मनसा सृष्टा आपश्च वरुणश्च" इति श्रुतेः।तथा इसका जो उदङ् सुषि—उत्तरवर्ती छिद्र है, उसमें स्थित हुआ जो वायुविशेष है वह खाये-पिये अन्न-जलको समानरूपसे [सम्पूर्ण शरीरमें] ले जाता है, इसलिये 'समान' है। उसीसे सम्बन्ध रखनेवाला मन—अन्तःकरण और वह पर्जन्य यानी वृष्टिरूप देव है, क्योंकि "[विराट् पुरुषके] मनसे अप् और वरुण रचे गये हैं" इस श्रुतिके अनुसार अप् (जल) मेघहीसे होनेवाले हैं।
तदेतत्कीर्तिश्च, मनसो ज्ञानस्य कीर्तिहेतुत्वात्; आत्मपरोक्षं विश्रुतत्वं कीर्तिः; यशः स्वकरण-तथा यह (समाननामक ब्रह्म) ही कीर्ति है, क्योंकि मन यानी ज्ञान ही कीर्तिका हेतु है। अपने पीछे जो विख्यात होती है उसे कीर्ति कहते हैं। जो ख्याति अपनी