भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 299

खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २९५

संवेद्यं विश्रुतत्वम् । व्युष्टिः कान्तिर्देहगतं लावण्यम् । ततश्च कीर्तिसंभवात्कीर्तिश्चेति । समानमन्यत् ॥ ४ ॥इन्द्रियोंसे गृहीत की जा सकती है उसे यश कहते हैं। व्युष्टि—कान्ति यानी देहगत सुन्दरताको कहते हैं। उससे भी कीर्तिकी उत्पत्ति होती है अतः वह भी कीर्ति ही है। शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ ४ ॥

—: ० :—

हृदयान्तर्गत ऊर्ध्वसुषिभूत उदानकी उपासना

अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायुः स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्युपासीतौजस्वी महस्वान्भवति य एवं वेद ॥ ५ ॥

तथा इसका जो ऊर्ध्व छिद्र है वह उदान है, वह वायु है, वह आकाश है और वही यह ओज और महः है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो इस प्रकार जानता है वह ओजस्वी (बलवान्) और महस्वान् (तेजस्वी) होता है ॥ ५ ॥

अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदान आ पादतलादारभ्योर्ध्वमुत्क्रमणादुत्कर्षार्थं च कर्म कुर्वन्ननितीत्युदानः स वायुस्तदाधारश्चाकाशः। तदेतद् वाय्वाकाशयोरोजोहेतुत्वादोजो बलं महत्त्वाच्च मह इति समानमन्यत् ॥५॥तथा इसका जो ऊर्ध्व-छिद्र है वह उदान है। पैरके तलुएसे लेकर ऊपरकी ओर उत्क्रमण करनेके कारण और उत्कर्षके लिये कर्म करता हुआ चेष्टा करता है—इसलिये वह 'उदान' है। वही वायु और उसका आधारभूत आकाश भी है। वायु और आकाश ओजके हेतु हैं अतः यह (उदानसंज्ञक ब्रह्म) ही ओज—बल है और महत्ताके कारण महः भी है। शेष अर्थ पूर्ववत् है॥५॥