भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 327, कुल 978 में से

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पृष्ठ 327

षोडश खण्ड

—: ० :—
आत्मयज्ञोपासना

पुत्रायुष उपासनमुक्तं जपञ्च ।<br>अथेदानीमात्मनो दीर्घजीवना-<br>येदमुपासनं जपं च विदधदाह ।<br>जीवन्हि स्वयं पुत्रादिफलेन<br>युज्यते, नान्यथा । इत्यत आ-<br>त्मानं यज्ञं संपादयति पुरुषः—पुत्रकी आयुके लिये उपासना<br>और जप कहे गये । अब अपनी<br>दीर्घायुके लिये इस जप और<br>उपासनाका विधान करता हुआ<br>वेद कहता है। पुरुष स्वयं जीवित<br>रहनेपर ही पुत्रादि फलसे युक्त<br>होता है, और किसी प्रकार नहीं;<br>इसीसे वह अपनेको यज्ञरूपसे<br>निष्पन्न करता है—

पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विंशतिवर्षाणि तत्प्रातःसवनं चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीदँसर्वं वासयन्ति ॥ १ ॥

निश्चय पुरुष ही यज्ञ है। उसके (उसकी आयुके) जो चौबीस वर्ष हैं, वे प्रातः सवन हैं। गायत्री चौबीस अक्षरोंवाली है; और प्रातःसवन गायत्री छन्दसे सम्बद्ध है। उस इस प्रातःसवनके वसुगण अनुगत हैं। प्राण ही वसु हैं, क्योंकि ये ही इस सबको बसाये हुए हैं ॥ १ ॥

पुरुषो जीवनविशिष्टः कार्य-<br>करणसंघातो यथाप्रसिद्ध एव ।<br>वावशव्दोऽवधारणार्थः । पुरुषजीवनसे युक्त देह और इन्द्रियोंका<br>संघात, जैसा कि प्रसिद्ध है, वही<br>‘पुरुष’ है। ‘वाव’ शब्द निश्चयार्थक<br>है। अतः तात्पर्य यह है कि पुरुष

छा० उ० ११—