छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ३
| भूरादीन्प्रपद्य इति तदवोचम् ।<br><br>अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्य-<br><br>ग्न्यादीन्प्रपद्य इति तदवोचम् ।<br><br>अथ यदवोचं स्वः प्रपद्य इत्यृ-<br><br>ग्वेदादीन्प्रपद्य इत्येव तदवोच-<br><br>मिति । उपरिष्टान्मन्त्राञ्जपेत्ततः<br><br>पूर्वोक्तमजरं कोशं सदिग्वत्सं<br><br>यथावद्ध्यात्वा । द्विर्वचनमादरा-<br><br>र्थम् ॥ ४-७ ॥ | की शरण हूँ' उससे यही कहा गया कि मैं पृथिवी आदि तीन लोकोंकी शरण हूँ । तथा मैंने जो कहा कि 'मैं भुवःकी शरण हूँ' उससे यही कहा गया है कि मैं अग्नि आदिकी शरण हूँ । और ऐसा जो कहा है कि 'मैं स्वःकी शरण हूँ' इससे यही कहा गया है कि मैं ऋग्वेदादिकी शरण हूँ । तत्पश्चात् उपर्युक्त अजर कोशका दिशाओंके वत्सके सहित विधिपूर्वक ध्यान कर ऊपरके मन्त्रों-को जपे । 'तदवोचं तदवोचम्' यह द्विरुक्ति आदरके लिये है ॥४-७॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥