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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

३२२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ३

३२२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ३


| भूरादीन्प्रपद्य इति तदवोचम् ।<br><br>अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्य-<br><br>ग्न्यादीन्प्रपद्य इति तदवोचम् ।<br><br>अथ यदवोचं स्वः प्रपद्य इत्यृ-<br><br>ग्वेदादीन्प्रपद्य इत्येव तदवोच-<br><br>मिति । उपरिष्टान्मन्त्राञ्जपेत्ततः<br><br>पूर्वोक्तमजरं कोशं सदिग्वत्सं<br><br>यथावद्ध्यात्वा । द्विर्वचनमादरा-<br><br>र्थम् ॥ ४-७ ॥ | की शरण हूँ' उससे यही कहा गया कि मैं पृथिवी आदि तीन लोकोंकी शरण हूँ । तथा मैंने जो कहा कि 'मैं भुवःकी शरण हूँ' उससे यही कहा गया है कि मैं अग्नि आदिकी शरण हूँ । और ऐसा जो कहा है कि 'मैं स्वःकी शरण हूँ' इससे यही कहा गया है कि मैं ऋग्वेदादिकी शरण हूँ । तत्पश्चात् उपर्युक्त अजर कोशका दिशाओंके वत्सके सहित विधिपूर्वक ध्यान कर ऊपरके मन्त्रों-को जपे । 'तदवोचं तदवोचम्' यह द्विरुक्ति आदरके लिये है ॥४-७॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥

षोडश खण्ड

—: ० :—
आत्मयज्ञोपासना

पुत्रायुष उपासनमुक्तं जपञ्च ।<br>अथेदानीमात्मनो दीर्घजीवना-<br>येदमुपासनं जपं च विदधदाह ।<br>जीवन्हि स्वयं पुत्रादिफलेन<br>युज्यते, नान्यथा । इत्यत आ-<br>त्मानं यज्ञं संपादयति पुरुषः—पुत्रकी आयुके लिये उपासना<br>और जप कहे गये । अब अपनी<br>दीर्घायुके लिये इस जप और<br>उपासनाका विधान करता हुआ<br>वेद कहता है। पुरुष स्वयं जीवित<br>रहनेपर ही पुत्रादि फलसे युक्त<br>होता है, और किसी प्रकार नहीं;<br>इसीसे वह अपनेको यज्ञरूपसे<br>निष्पन्न करता है—

पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विंशतिवर्षाणि तत्प्रातःसवनं चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीदँसर्वं वासयन्ति ॥ १ ॥

निश्चय पुरुष ही यज्ञ है। उसके (उसकी आयुके) जो चौबीस वर्ष हैं, वे प्रातः सवन हैं। गायत्री चौबीस अक्षरोंवाली है; और प्रातःसवन गायत्री छन्दसे सम्बद्ध है। उस इस प्रातःसवनके वसुगण अनुगत हैं। प्राण ही वसु हैं, क्योंकि ये ही इस सबको बसाये हुए हैं ॥ १ ॥

पुरुषो जीवनविशिष्टः कार्य-<br>करणसंघातो यथाप्रसिद्ध एव ।<br>वावशव्दोऽवधारणार्थः । पुरुषजीवनसे युक्त देह और इन्द्रियोंका<br>संघात, जैसा कि प्रसिद्ध है, वही<br>‘पुरुष’ है। ‘वाव’ शब्द निश्चयार्थक<br>है। अतः तात्पर्य यह है कि पुरुष

छा० उ० ११—

३९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३


संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
एव यज्ञ इत्यर्थः । तथा हि सामान्यैः संपादयति यज्ञत्वम् । कथम् ? तस्य पुरुषस्य यानि चतुर्विंशतिवर्षाण्यायुषस्तत्प्रातःसवनं पुरुषाख्यस्य यज्ञस्य ।ही यज्ञ है । अब श्रुति सदृशता दिखलाकर पुरुषकी यज्ञरूपता सिद्ध करती है । किस प्रकार ? (सो बतलाते हैं—) उस पुरुषकी आयुके जो चौबीस वर्ष हैं, वे उस पुरुषसंज्ञक यज्ञके प्रातःसवन हैं ।
केन सामान्येन ? इत्याह—चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री छन्दो गायत्रं गायत्रीछन्दस्कं हि विधियज्ञस्य प्रातःसवनम् । अतः प्रातःसवनसंपन्नेन चतुर्विंशतिवर्षायुषा युक्तः पुरुषः अतो विधियज्ञसादृश्याद्यज्ञः । तथोत्तरयोरप्यायुषोः सवनद्वयसंपत्तिस्त्रिष्टुब्जगत्यक्षरसंख्यासामान्यतो वाच्या ।वे किस समताके कारण प्रातःसवन हैं ? सो बतलाते हैं—गायत्री छन्द चौबीस अक्षरोंवाला है और विधियज्ञका प्रातःसवन भी गायत्र—गायत्रीछन्दवाला है । अतः पुरुष प्रातःसवनरूपसे निष्पन्न हुई चौबीस वर्षकी आयुसे युक्त है । इसीसे विधियज्ञसे सदृशता होनेके कारण वह यज्ञ है । इसी प्रकार पीछेकी दोनों आयुओंसे त्रिष्टुप् और जगती छन्दके अक्षरोंकी संख्यामें समानता होनेके कारण उनके द्वारा अन्य दोनों सवनोंकी निष्पत्ति बतलानी चाहिये ।
किं च तदस्य पुरुषयज्ञस्य प्रातःसवनं विधियज्ञस्येव वसवो देवा अन्वायत्ता अनुगताः, सवनदेवतात्वेन स्वामिन इत्यर्थः। पुरुषयज्ञेऽपि विधियज्ञ इवाग्न्यादयो वसवो देवाः प्राणा इत्यतोतथा विधियज्ञके समान इस पुरुषयज्ञके प्रातःसवनके भी वसु देवता अनुगत हैं । तात्पर्य यह है कि सवनदेवतारूपसे वे उसके स्वामी हैं । [इस कथनसे] विधियज्ञके समान पुरुषयज्ञमें भी अग्नि आदि ही वसुदेवता निश्चित होते हैं; अतः

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२५


| विशिनष्टि । प्राणा वाव वसवो वागादयो वायवश्च; ते हि यस्मादिदं पुरुषादिप्राणिजातमेते वासयन्ति । प्राणेषु हि देहे वसत्सु सर्वमिदं वसति, नान्यथा; इत्यतो वसनाद्वासनाच्च वसवः ॥१॥ | श्रुति उनकी विशेषता ( विभिन्नता ) बतलाती है । [ पुरुषयज्ञमें ] वाक् आदि इन्द्रियाँ और प्राण आदि वायु ही वसु हैं, क्योंकि वे ही इस पुरुष आदि प्राणिसमुदायको वासित किये हुए हैं । देहमें प्राणोंके रहते हुए ही यह सब बसा हुआ है, और किसी प्रकार नहीं; अतः देहमें बसने अथवा उसे बसानेके कारण प्राण वसु हैं ॥ १ ॥ |

<br>

तं चेदेतस्मिन्वयसि किञ्चिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा वसव इदं मे प्रातःसवनं माध्यन्दिनꣳसवनमनुसंतनु- तेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्यु- द्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ २ ॥

यदि इस प्रातःसवनसम्पन्न आयुमें उसे कोई रोग आदि कष्ट पहुँचावे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राणरूप वसुगण ! मेरे इस प्रातःसवनको माध्यन्दिनसवनके साथ एकरूप कर दो; यज्ञस्वरूप मैं आप प्राणरूप वसुओंके मध्यमें विलुप्त ( नष्ट ) न होऊँ' तब उस कष्टसे मुक्त होकर वह नीरोग हो जाता है ॥ २ ॥

| तं चेद्यज्ञसंपादिनमेतस्मिन्प्रातःसवनसंपन्ने वयसि किञ्चिद्गदाध्यादि मरणशङ्काकारणमुपतपेद्दुःखमुत्पादयेत्स तदा यज्ञसंपादी | उस यज्ञसम्पादकको यदि प्रातःसवनरूपसे निष्पन्न हुई इस आयुमें मरणकी शङ्काकी कारणभूत कोई व्याधि आदि कष्ट पहुँचावे तो वह यज्ञसम्पादन करनेवाला पुरुष |

३२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३२६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| पुरुष आत्मानं यज्ञं मन्यमानो ब्रूयाज्जपेदित्यर्थ इमं मन्त्रम्— | अपनेको यज्ञ मानते हुए कहे—अर्थात् इस मन्त्रको जपे— | | हे प्राणा वसव इदं मे प्रातःसवनं मम यज्ञस्य वर्तते तन्माध्यन्दिनं सवनमनुसंतनुतेति माध्यन्दिनेन सवनेनायुषा सहितमेकीभूतं संततं कुरुतेत्यर्थः । माहं यज्ञो युष्माकं प्राणानां वसूनां प्रातःसवनेशानां मध्ये विलोप्सीय विलुप्येय विच्छिद्येयेत्यर्थः । इतिशब्दो मन्त्रपरिसमाप्त्यर्थः । स तेन जपेन ध्यानेन च ततस्तस्मादुपतापादुदेत्युद्गच्छति । उद्गम्य विमुक्तः सन्नगदो ह्यनुपतापो भवत्येव ॥२॥ | 'हे प्राणरूप वसुगण ! यह मेरे यज्ञका प्रातःसवन विद्यमान है; इसे माध्यन्दिनसवनरूपसे अनुसंतत करो; अर्थात् इसे माध्यन्दिनसवनरूप मेरी आयुके साथ एकीभूत कर दो । यज्ञस्वरूप मैं प्रातःसवनके अधिष्ठाता आप प्राणरूप वसुओंके मध्यमें विलुप्त अर्थात्-विच्छिन्न न होऊँ । मूलमें 'इति' शब्द मन्त्रकी समाप्तिके लिये है । उस जप और ध्यानके द्वारा वह उस कष्टसे छूट जाता है और उससे छूटकर अगद—संताप-शून्य ही हो जाता है ॥ २ ॥ |

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अथ यानि चतुश्चत्वारिग्ंशद्वर्षाणि तन्माध्यन्दिनग्ंसवनं चतुश्चत्वारिग्ंशदक्षरा त्रिष्टुप्त्रैष्टुभं माध्यन्दिनग्ंसवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव रुद्रा एते हीदग्ंसर्वग्ंरोदयन्ति ॥३॥ तं चेदेतस्मिन्वयसि किञ्चिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा रुद्रा इदं मे माध्यन्दिनग्ंसवनं तृतीयसवनमनुसंतनुतेति माहं प्राणानाग्ंरुद्राणां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ ४ ॥

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्याथ ३२७

इसके पश्चात् जो चौवालीस वर्ष हैं, वे माध्यन्दिनसवन हैं। त्रिष्टुप् छन्द चौवालीस अक्षरोंवाला है और माध्यन्दिनसवन त्रिष्टुप् छन्दसे सम्बद्ध है। उस माध्यन्दिनसवनके रुद्रगण अनुगत हैं। प्राण ही रुद्र हैं, क्योंकि ये ही इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायको रुलाते हैं। यदि उस यज्ञकर्ताको इस आयुमें कोई [रोगादि] संतप्त करे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राणरूप रुद्रगण! मेरे इस मध्याह्नकालिक सवनको तृतीय सवनके साथ एकीभूत कर दो। यज्ञस्वरूप मैं प्राणरूप रुद्रोंके मध्यमें कभी विच्छिन्न (नष्ट) न होऊँ।' ऐसा कहनेसे वह उस कष्टसे छूट जाता है और नीरोग हो जाता है ॥ ३-४ ॥

| अथ यानि चतुश्चत्वारिंशद्व-<br><br>र्षाणीत्यादि समानम्। रुदन्ति<br><br>रोदयन्तीति प्राणा रुद्राः क्रूरा<br><br>हि ते मध्यमे वयस्यतो रुद्राः<br><br>॥ ३-४ ॥ | 'अथ यानि चतुश्चत्वारिंशद्वर्षाणि'<br>इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है।<br>रोते अथवा रुलाते हैं, इसलिये<br>प्राण 'रुद्र' हैं। वे (प्राण) मध्यम<br>आयुमें क्रूर होते हैं, इसलिये रुद्र<br>कहलाते हैं ॥ ३-४ ॥ |

अथ यान्यष्टाचत्वारिंशद्वर्षाणि तत्तृतीयसवन- मष्टाचत्वारिंशदक्षरा जगती जागतं तृतीयसवनं तदस्यादित्या अन्वायत्ताः प्राणा वावादित्या एते हीदꣳसर्वमाददते ॥ ५ ॥ तं चेदेतस्मिन्वयसि किञ्चि- दुपतपेत्स ब्रूयात् प्राणा आदित्या इदं मे तृतीयसवन- मायुरनुसंतनुतेति माहं प्राणानामादित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो हैव भवति ॥ ६ ॥

इसके पश्चात् जो अड़तालीस वर्ष हैं, वे तृतीय सवन हैं। जगती छन्द अड़तालीस अक्षरोंवाला है तथा तृतीय सवन जगती छन्दसे सम्बद्ध

३२८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३२८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

रखता है। इस सवनके आदित्यगण अनुगत हैं। प्राण ही आदित्य हैं, क्योंकि ये ही इस सम्पूर्ण शब्दादि विषयसमूहको ग्रहण करते हैं। उस उपासकको यदि इस आयुमें कोई [रोगादि] संतप्त करे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राणरूप आदित्यगण! मेरे इस तृतीय सवनको आयुके साथ एकीभूत कर दो। यज्ञस्वरूप मैं प्राणरूप आदित्योंके मध्यमें विनष्ट न होऊँ।' ऐसा कहनेसे वह उस कष्टसे मुक्त होकर नीरोग हो जाता है॥ ५-६॥

| तथादित्याः प्राणाः। ते हीदं शब्दादिजातमाददतेऽत आदित्याः। तृतीयसवनमायुः षोडशोत्तरवर्षशतं समापयतानुसंतनुत यज्ञं समापयतेत्यर्थः। समानमन्यत्॥ ५-६॥ | इसी प्रकार प्राण ही आदित्य हैं। वे इस शब्दादि विषयसमूहका आदान (ग्रहण) करते हैं, इसलिये आदित्य हैं। [हे प्राणरूप आदित्यगण!] तृतीयसवनको आयुरूपसे अनुसंतत करो अर्थात् एक सौ सोलह वर्ष तक पूर्ण करो यानी इस यज्ञको समाप्त करो। शेष सब पूर्ववत् है॥ ५-६॥ |

—: ० :—

| निश्चिता हि विद्या फलायेत्येतद्दर्शयन्नुदाहरति— | निश्चिता विद्या अवश्य फलवती होती है—इस बातको प्रदर्शित करती हुई श्रुति उदाहरण देती है— |

एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स किं म एतदुपतपसि योऽहमनेन न प्रेष्यामीति स ह षोडशं वर्षशतमजीवत्प्र ह षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद ॥ ७ ॥

इस प्रसिद्ध विद्याको जाननेवाले ऐतरेय महिदासने कहा था—'[अरे रोग!] तू मुझे क्यों कष्ट देता है, जो मैं कि इस रोगद्वारा

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३२९


मृत्युको प्राप्त नहीं हो सकता।' वह एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहा था; जो इस प्रकार जानता है वह एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहता है ॥ ७ ॥

एतद्यज्ञदर्शनं ह स्म वै किल तद्विद्वानाह महिदासो नामतः, इतराया अपत्यमैतरेयः। किं कस्मान्मे ममैतदुपतपनमुपतपसि स त्वं हे रोग; योऽहं यज्ञोऽनेन त्वत्कृतेनोपतापेन न प्रेष्यामि न मरिष्याम्यतो वृथा तव श्रम इत्यर्थः। इत्येवमाह स्मेति पूर्वेण संबन्धः। स एवंनिश्चयः सन् षोडशं वर्षशतमजीवत्। अन्योऽप्येवंनिश्चयः षोडशं वर्षशतं प्रजीवति य एवं यथोक्तं यज्ञसंपादनं वेद जानाति, स इत्यर्थः ॥ ७ ॥इस प्रसिद्ध यज्ञदर्शनको जाननेवाले महिदासनामक इतराके पुत्र ऐतरेयने 'हे रोग ! तू मुझे यह संताप क्यों देता है ? जो यज्ञरूप मैं तेरे इस संतापसे मृत्युको प्राप्त नहीं होऊँगा—नहीं मरूँगा; तात्पर्य यह है कि इसलिये तेरा यह श्रम वृथा ही है—इस प्रकार कहा था—इसका पूर्वसे सम्बन्ध है। ऐसे निश्चयवाला होकर वह एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहा। ऐसे ही निश्चयवाला दूसरा पुरुष भी, जो इस प्रकार पूर्वोक्त यज्ञसम्पादनको जानता है, एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहता है ॥ ७ ॥

—: ० :—

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥

सप्तदश खण्ड

अक्षयादि फल देनेवाली आत्मयज्ञोपासना

स यदशिशिषति यत्पिपासति यन्न रमते ता अस्य दीक्षाः ॥ १ ॥

वह [ पुरुष ] जो भोजन करनेकी इच्छा करता है, जो पीनेकी इच्छा करता है और जो रममाण ( प्रसन्न ) नहीं होता—वही इसकी दीक्षा है ॥ १ ॥

| स यदशिशिषतीत्यादियज्ञ-सामान्यनिर्देशः पुरुषस्य पूर्वेणैव संबध्यते । यदशिशिषत्यशितुमिच्छति, तथा पिपासति पातुमिच्छति, यन्न रमत इष्टाद्यप्राप्तिनिमित्तम्, यदेवंजातीयकं दुःखमनुभवति ता अस्य दीक्षाः, दुःखसामान्याद्विधियज्ञस्येव ।१। | 'वह जो भोजन करनेकी इच्छा करता है' इत्यादि पुरुषका यज्ञसे सादृश्यनिरूपण पूर्वग्रन्थसे ही सम्बन्ध रखता है । जो 'अशिशिषति'—खानेकी इच्छा करता है, तथा 'पिपासति' पीनेकी इच्छा करता है, तथा जो इष्ट पदार्थोंकी अप्राप्तिके कारण रममाण नहीं होता अर्थात् जो इस प्रकारके दुःखका अनुभव करता है, वह, दुःखमें सदृशता होनेके कारण विधियज्ञकी दीक्षाके समान, इसकी दीक्षा है॥१॥ |

—: ० :—

अथ यदश्नाति यत्पिबति यद्रमते तदुपसदैरेति ॥२॥

फिर वह जो खाता है, जो पीता है और जो रतिका अनुभव करता है—वह उपसदोंकी सदृशताको प्राप्त होता है ॥ २ ॥

खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३१


| अथ यदश्नाति यत्पिबति यद्रमते रतिं चानुभवतीष्टादि-संयोगात्तदुपसदैः समानतामेति। उपसदां च पयोव्रतत्वनिमित्तं सुखमस्ति। अल्पभोजनीयानि चाहान्यासन्नानीति प्रत्यासो-ऽतोऽशनादीनामुपसदां च सामान्यम् ॥ २ ॥ | फिर वह जो भोजन करता है, पीता है और इष्ट पदार्थादिके संयोग-से रतिका अनुभव करता है—वह सब उपसदोंकी समानताको प्राप्त होता है । उपसदोंको पयोव्रतत्व ( केवल दुग्धपान ) सम्बन्धी सुख प्राप्त होता है । जिन दिनोंमें स्वल्प आहार प्राप्त हो सकता है वे समीप ही हैं—यह देखकर यज्ञकर्ताको आश्वासन होता है। अतः भोजनादि-की उपसदोंसे सदृशता है ॥ २ ॥ |


अथ यद्धसति यज्जक्षति यन्मैथुनं चरति स्तुतशस्त्रैरेव तदेति ॥ ३ ॥

तथा वह जो हँसता है, जो भक्षण करता है और जो मैथुन करता है—वे सब स्तुत शस्त्रकी ही समानताको प्राप्त होते हैं ॥३॥

| अथ यद्धसति यज्जक्षति भक्षयति यन्मैथुनं चरति स्तुतशस्त्रैरेव तत्समानतामेति; शब्दवत्त्वसामान्यात् ॥ ३ ॥ | तथा वह जो हँसता है, जो भक्षण करता है और जो मैथुन करता है वह स्तुतशस्त्रकी समानताको प्राप्त होता है; क्योंकि शब्दयुक्त होनेमें उनमें समानता है ॥ ३ ॥ |


अथ यत्तपो दानमार्जवमहिꣳसा सत्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणाः ॥ ४ ॥

तथा जो तप, दान, आर्जव ( सरलता ), अहिंसा और सत्यवचन हैं, वे ही इसकी दक्षिणा हैं ॥ ४ ॥

३३२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३

३३२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३


अथ यत्तपो दानमार्जवमहिंसासत्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणाः; धर्मपुष्टिकरत्वसामान्यात् ॥ ४ ॥तथा पुरुषके जो तप, दान, आर्जव, अहिंसा और सत्यभाषण [ आदि गुण ] हैं, वे ही इसकी दक्षिणा हैं; क्योंकि धर्मकी पुष्टि करनेमें [ दक्षिणाके साथ ] उनकी तुल्यता है ॥ ४ ॥

—: ० :—

यस्माच्च यज्ञः पुरुषः—क्योंकि पुरुष यज्ञ है—

तस्मादाहुः सोष्यत्यसोष्टेति पुनरुत्पादनमेवास्य तन्मरणमेवावभृथः ॥ ५ ॥

इसीसे कहते हैं कि 'प्रसूता होगी' अथवा 'प्रसूता हुई' वह इसका पुनर्जन्म ही है; तथा मरण ही अवभृथस्नान है ॥ ५ ॥

तस्मात्तं जनयिष्यति माता यदा, तदाहुरन्ये सोष्यतीति तस्य मातरम् यदा च प्रसूता भवति, तदाऽसोष्ट पूर्तिकेति, विधियज्ञ इव सोष्यति सोमं देवदत्तोऽसोष्ट सोमं यज्ञदत्त इति, अतः शब्दसामान्याद्वा पुरुषो यज्ञः। पुनरुत्पादनमेवास्य तत्पुरुषाख्यस्य यज्ञस्य यत्सोष्यत्यसोष्टेतिशब्द-इसीसे जब माता उसे जन्म देनेवाली होती है, तब दूसरे लोग उसकी माताके विषयमें कहते हैं कि 'यह प्रसूता होगी' और जब वह प्रसूता होती है तो 'यह प्रसूता हुई अर्थात् पूर्णिका हुई' ऐसा कहते हैं, जैसे कि विधियज्ञमें 'देवदत्त सोमाभिषव (सोमरसका पान या साधन) करेगा' अथवा 'यज्ञदत्तने सोमाभिषव किया' ऐसा कहते हैं। इस प्रकार 'सोष्यति' तथा 'असोष्ट' शब्दोंमें समानता होनेके कारण पुरुष यज्ञ है। विधियज्ञके समान इस पुरुषसंज्ञक यज्ञका जो 'सोष्यति' और 'असोष्ट' इन शब्दोंसे सम्बद्ध होना है वह पुनरुत्पादन

खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३३


| संबन्धित्वं विधियज्ञस्येव ।<br>किं च तन्मरणमेवास्य पुरुष-<br>यज्ञस्यावभृथः; समाप्तिसामा-<br>न्यात् ॥ ५ ॥ | ही है; तथा मरण ही इस पुरुषसंज्ञक<br>यज्ञका अवभृथस्नान है, क्योंकि<br>समाप्तिमें इन (मरण और अवभृथ-<br>स्नान) दोनोंकी तुल्यता है ॥ ५ ॥ |


— : ० : —

तद्धैतद्घोर आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायो-<br>क्त्वोवाचापिपास एव स बभूव सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं<br>प्रतिपद्ये ताक्षितमस्यच्युतमसि प्राणसंशितमसीति<br>तत्रैते द्वे ऋचौ भवतः ॥ ६ ॥

घोर आङ्गिरस ऋषिने देवकीपुत्र कृष्णको यह यज्ञदर्शन सुनाकर, जिससे कि वह अन्य विद्याओंके विषयमें तृष्णाहीन हो गया था, कहा—'उसे अन्तकालमें इन तीन मन्त्रोंका जप करना चाहिये ( १ ) तू अक्षित (अक्षय) है, ( २ ) अच्युत (अविनाशी) है और ( ३ ) अतिसूक्ष्म प्राण है।' तथा इसके विषयमें ये दो ऋचाएँ हैं ॥ ६ ॥

| तद्धैतद्यज्ञदर्शनं घोरो नामत<br>आङ्गिरसो गोत्रतः कृष्णाय<br>देवकीपुत्राय शिष्यायोक्त्वोवाच<br>तदेतत्त्रयमित्यादिव्यवहितेन सं-<br>बन्धः । स चैतद्दर्शनं श्रुत्वापि-<br>पास एवान्याभ्यो विद्याभ्यो<br>बभूव । इत्थं च विशिष्टेयं विद्या<br>यत्कृष्णस्य देवकीपुत्रस्यान्यां | इस यज्ञदर्शनको आङ्गिरस गोत्र-<br>वाले घोरनामक ऋषिने अपने शिष्य<br>देवकीपुत्र कृष्णके प्रति कहकर फिर<br>कहा। इस वाक्यका 'तदेतत्त्रयम्'<br>इस व्यवधानयुक्त वाक्यसे सम्बन्ध<br>है। तथा वह कृष्ण तो इस यज्ञ-<br>दर्शनका श्रवण कर फिर अन्य<br>विद्याओंके प्रति तृणारहित हो<br>गया। 'यह विद्या ऐसी विशिष्ट<br>गुणसम्पन्ना है कि यह अन्य विद्याओं-<br>के प्रति देवकीपुत्र कृष्णकी तृष्णा- |

३३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३३४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३

| विद्यां प्रति तृड्विच्छेदकरीति पुरुषयज्ञविद्यां स्तौति । | का छेदन करनेवाली हुई' —ऐसा कहकर श्रुति पुरुषयज्ञविद्याकी स्तुति करती है । | | घोर आङ्गिरसः कृष्णायोक्त्वेमां विद्यां किमुवाच ? इति तदाहस एवं यथोक्तयज्ञविदन्तवेलायां मरणकाल एतन्मन्त्रत्रयं प्रतिपद्येत जपेदित्यर्थः । | घोर आङ्गिरसने कृष्णके प्रति यह विद्या कहकर क्या कहा—यह बतलाते हैं—पूर्वोक्त यज्ञविद्याको जाननेवाला वह पुरुष अन्तिम समय-मरणकाल उपस्थित होनेपर इन तीन मन्त्रोंको प्रतिपन्न हो अर्थात् इनका जप करे । वह मन्त्र कौन-से हैं ? | | किं तत् ? अक्षितमक्षीणमक्षतं वासीत्येकं यजुः । सामर्थ्यादित्यस्थं प्राणं चैकीकृत्याह— तथा तमेवाहाच्युतं स्वरूपादप्रच्युतमसीति द्वितीयं यजुः । | 'तू अक्षित—अक्षीण अथवा अक्षय है' यह एक यजु है । प्रसङ्गके सामर्थ्यसे यह कथन आदित्यस्थ पुरुष और प्राणकी एकता करके किया गया है। तथा उसीके प्रति श्रुति कहती है—'तू अच्युत—स्वरूपसे च्युत न होनेवाला है—यह दूसरा यजु है । | | प्राणसंशितं प्राणश्च स संशितं सम्यक्तनूकृतं च सूक्ष्मं तत्त्वमसीति तृतीयं यजुः । तत्रैतस्मिन्नर्थे विद्यास्तुतिपरे द्वे ऋचौ मन्त्रौ भवतः, न जपार्थे, त्रयं प्रतिपद्येतेति त्रित्वसंख्याबाध- | 'तू प्राणसंशित—जो प्राण संशित—सम्यक् प्रकारसे तनु यानी सूक्ष्म किया गया है वह तू है'—यह तीसरा यजु है । इस अर्थमें इस विद्याकी स्तुति करनेवाली दो ऋचाएँ यानी दो मन्त्र हैं, किंतु वे जपके लिये नहीं हैं, क्योंकि पहले जो 'त्रयं प्रतिपद्येत' ( तीनका जप करे ) ऐसी विधि की गयी है उसकी 'तीन संख्याका बाध हो |

खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्य ३३५


नात्; पञ्चसंख्या हि तदा स्यात् ॥ ६ ॥जायगा और तब 'पाँच' संख्या हो जायगी ॥ ६ ॥

आदित्प्रत्नस्य रेतसः । उद्वयं तमसस्परि ज्योतिः पश्यन्त उत्तरꣳस्वः पश्यन्त उत्तरं देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तममिति ज्योतिरुत्तममिति ॥ ७ ॥

[ 'आदित्प्रत्नस्य रेतसः' यह एक मन्त्र है और 'उद्वयं तमसस्परि' इत्यादि दूसरा है। इनमें पहला मन्त्र इस प्रकार है—'आदित्प्रत्नस्य रेतसो ज्योतिः पश्यन्ति वासरम् । परो यदिध्यते दिवि'* इसका अर्थ यह है—] पुरातन कारणका प्रकाश देखते हैं; यह सर्वत्र व्याप्त प्रकाश, जो परब्रह्ममें स्थित परम तेज देदीप्यमान है, उसका है। [ अब 'उद्वयं तमसस्परि' इत्यादि दूसरे मन्त्रका अर्थ करते हैं—] अज्ञानरूप अन्धकारसे अतीत उत्कृष्ट ज्योतिको देखते हुए तथा आत्मीय उत्कृष्ट तेजको देखते हुए हम सम्पूर्ण देवोंमें प्रकाशमान सर्वोत्तम ज्योतिःस्वरूप सूर्यको प्राप्त हुए ॥ ७ ॥


आदितित्यत्राकारस्यानुबन्धस्तकारोऽनर्थक इच्छब्दश्च। प्रत्नस्य चिरन्तनस्य पुराणस्येत्यर्थः, रेतसः कारणस्य बीजभूतस्य जगतः सदाख्यस्य ज्योतिः प्रकाशं पश्यन्ति । आशब्द उत्सृष्टानुबन्धः पश्यन्तीत्यनेन संबध्यते । किं तज्ज्योतिः'आत् इत्' इसमें आकारके पीछेका तकार और 'इत्' शब्द अर्थरहित हैं। 'प्रत्नस्य'—चिरन्तन यानी पुरातन 'रेतसः' कारणके अर्थात् जगत्‌के बीजभूत सत्-संज्ञक ब्रह्मके 'ज्योतिः'—प्रकाशको देखते हैं। अपने अनुबन्ध तकारसे रहित 'आ' शब्द 'पश्यन्ति' इस क्रियासे सम्बद्ध है । उस किस ज्योतिको देखते हैं ? इसपर श्रुति

* आनन्दगिरिकृत टीकासे ।

३३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३

३३६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ३
पश्यन्ति ? वासरमहरहरिव तत्सर्वतो व्याप्तं ब्रह्मणो ज्योतिः।कहती है—] वासर अर्थात् दिनके समान सर्वत्र व्याप्त उस ब्रह्मकी ज्योतिको देखते हैं ।
निवृत्तचक्षुषो ब्रह्मविदो ब्रह्मचर्यादिनिवृत्तिसाधनैः शुद्धान्तःकरणा आ समन्ततो ज्योतिः पश्यन्तीत्यर्थः । परः परमिति लिङ्गव्यत्ययेन, ज्योतिष्परत्वात्; यदिष्यते दीप्यते दिवि द्योतनवति परस्मिन्ब्रह्मणि वर्तमानम्, तेन ज्योतिषेद्धः सविता तपति चन्द्रमा भाति विद्युद्विद्योतते ग्रहतारागणा विभासन्ते ।तात्पर्य यह है कि जिनकी इन्द्रियाँ विषयोंसे निवृत्त हो गयी हैं वे ब्रह्मचर्य आदि निवृत्तिके साधनोंद्वारा शुद्धचित्त हुए ब्रह्मवेत्ता उस ज्योतिको सब ओर देखते हैं । जो ज्योति 'दिवि' द्योतनवान् परब्रह्ममें देदीप्यमान है; तथा जिस ज्योतिसे दीप्त होकर सूर्य तपता है, चन्द्रमा प्रकाशित होता है, बिजली चमकती है तथा ग्रह और तारागण विशेष रूपसे भासते हैं । यहाँ 'परः' यह शब्द [नपुंसकलिङ्ग] 'ज्योतिः'के साथ अन्वित है, इसलिये इसका लिङ्ग बदल कर 'परम्' ऐसा समझना चाहिये ।
किं चान्यो मन्त्रदृगाह यथोक्तं ज्योतिः पश्यन्—उद्वयं तमसोऽज्ञानलक्षणात्परि परस्तादिति शेषः । तमसो वापनेद्यज्ज्योतिरुत्तरमादित्यस्थं परिपश्यन्तो वयमुदगन्मेति व्यवहितेन संबन्धः । तज्ज्योतिः स्वः स्वमात्मीयमस्मद्धृदि स्थितम्,तथा उपर्युक्त ज्योतिको देखनेवाला एक दूसरा मन्त्रद्रष्टा कहता है—अज्ञानरूप अन्धकारसे अतीत [ जो परम तेज है ] अथवा अन्धकारकी निवृत्ति करनेवाला जो सूर्यमण्डलस्थ उत्कृष्ट तेज है उसे देखते हुए हम प्राप्त हुए—इस प्रकार इसका व्यवधानयुक्त क्रियासे सम्बन्ध है । वह ज्योति 'स्व'—आत्मीय अर्थात् हमारे
खण्ड १७ ]शाङ्करभाष्यार्थ३३७

आदित्यस्थं च तदेकं ज्योतिः। यदुत्तरमुत्कृष्टतरमूर्ध्वतरं वापरं ज्योतिरपेक्ष्य पश्यन्त उदगन्म वयम्।<br><br>कमुदगन्म ? इत्याह—देवं द्योतनवन्तं देवेषु सर्वेषु सूर्य रसानां रश्मीनां प्राणानां च जगत ईरणात्सूर्यस्तमुदगन्म गतवन्तो ज्योतिरुत्तमं सर्वज्योतिर्भ्य उत्कृष्टतममहो प्राप्ता वयमित्यर्थः।<br><br>इदं तज्ज्योतिर्यदृग्भ्यां स्तुतं यद्यजुस्त्रयेण प्रकाशितम्। द्विरभ्यासो यज्ञकल्पनापरिसमाप्त्यर्थः॥ ७ ॥अन्तःकरणमें स्थित तेज और आदित्यमें स्थित तेज एक ही है, जिस अन्य तेजोंकी अपेक्षा उत्तर—उत्कृष्टतर अर्थात् ऊर्ध्वतर तेजको देखते हुए हम प्राप्त हुए।<br><br>किसे प्राप्त हुए—यह श्रुति बतलाती है—समस्त देवताओंमें देव अर्थात् द्योतनवान् सूर्यको प्राप्त हुए; जो रस, किरण और संसारके प्राणोंको प्रेरित करनेके कारण सूर्य कहलाता है उस उत्तम ज्योतिको—सम्पूर्ण ज्योतियोंमें उत्कृष्टतम ज्योतिको प्राप्त हुए; अहो! [आश्चर्य है कि ] हम उसे प्राप्त हुए—ऐसा इसका तात्पर्य है। यही वह ज्योति है जिसकी दो ऋचाओंने स्तुति की है तथा जो उपर्युक्त तीन यजुःश्रुतियोंद्वारा प्रकाशित है। 'ज्योतिरुत्तमं ज्योतिरुत्तमम्' यह द्विरुक्ति यज्ञकल्पनाकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ ७ ॥
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये<br>सप्तदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १७ ॥

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अष्टादश खण्ड

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मन आदि दृष्टिसे अध्यात्म और आधिदैविक ब्रह्मोपासना

मनोमय ईश्वर उक्त आकाशात्मेति च ब्रह्मणो गुणैकदेशत्वेन। अथेदानीं मनआकाशयोः समस्तब्रह्मदृष्टिविधानार्थ आरम्भो मनो ब्रह्मेत्यादि—[चतुर्दश खण्डके द्वितीय मन्त्रमें] ईश्वरके गुणोंके एकदेशको लेकर उसे मनोमय और आकाशात्मा कहा गया है। अब इससे आगे मन और आकाशमें समस्त ब्रह्मदृष्टिका विधान करनेके लिये 'मनो ब्रह्म' इत्यादि [अष्टादश खण्ड] का आरम्भ किया जाता है—

मनो ब्रह्मेत्युपासीतेत्यध्यात्ममथाधिदैवतमाकाशो ब्रह्मेत्युभयमादिष्टं भवत्यध्यात्मं चाधिदैवतं च ॥१॥

'मन ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करे। यह अध्यात्मदृष्टि है। तथा 'आकाश ब्रह्म है' यह अधिदैवतदृष्टि है। इस प्रकार अध्यात्म और अधिदैवत दोनोंका उपदेश किया गया ॥ १ ॥

मनो मनुतेऽनेनेत्यन्तःकरणं तद्ब्रह्म परमित्युपासीतेति, एतदात्मविषयं दर्शनमध्यात्मम्। अथाधिदैवतं देवताविषयमिदं वक्ष्यामः। आकाशो ब्रह्मेत्युपासीत। एवमुभयमध्यात्ममधि-मन—जिससे प्राणी मनन करता है उस अन्तःकरणको मन कहते हैं। वह परब्रह्म है—ऐसी उपासना करे। यह आत्मविषयक दर्शन अध्यात्म है। अब यह अधिदैवत—देवताविषयक दर्शन कहते हैं। आकाश ब्रह्म है—ऐसी उपासना करे। इस प्रकार अध्यात्म और

खण्ड १८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३९


| दैवतं चोभयं ब्रह्मदृष्टिविषयमादिष्टमुपदिष्टं भवति, आकाशमनसोः सूक्ष्मत्वात् मनसोपलभ्यत्वाच्च ब्रह्मणो योग्यं मनो ब्रह्मदृष्टेः । आकाशश्च, सर्वगतत्वात्सूक्ष्मत्वादुपाधिहीनत्वाच्च ॥१॥ | अधिदैवत दोनों प्रकारकी ब्रह्मदृष्टिके विषयमें आदेश—उपदेश किया जाता है; क्योंकि आकाश और मन दोनों ही सूक्ष्म हैं। इसके सिवा, ब्रह्म मनसे उपलब्ध किया जा सकता है, इसलिये भी मन ब्रह्मदृष्टिके योग्य है, तथा सर्वगत, सूक्ष्म और उपाधिहीन होनेके कारण आकाश भी ब्रह्मदृष्टिके योग्य है ॥१॥ |


तदेतच्चतुष्पाद्ब्रह्म । वाक्पादः प्राणः पादश्चक्षुः पादः श्रोत्रं पाद इत्यध्यात्मम् । अथाधिदैवतमग्निः पादो वायुः पाद आदित्यः पादो दिशः पाद इत्युभयमेवादिष्टं भवत्यध्यात्मं चैवाधिदैवतं च ॥ २ ॥

वह यह (मनःसंज्ञक) ब्रह्म चार पादोंवाला है। वाक् पाद है, प्राण पाद है, चक्षु पाद है और श्रोत्र पाद है। यह अध्यात्म है। अब अधिदैवत कहते हैं—अग्नि पाद है, वायु पाद है, आदित्य पाद है और दिशाएँ पाद हैं। इस प्रकार अध्यात्म और अधिदैवत दोनोंका उपदेश किया गया ॥ २ ॥

| तदेतन्मनआख्यं चतुष्पाद्ब्रह्म, चत्वारः पादा अस्येति । कथं चतुष्पात्त्वं मनसो ब्रह्मणः ? इत्याह—वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्र- | वह यह मनसंज्ञक ब्रह्म चतुष्पाद् है। जिसके चार पाद हों उसे चतुष्पाद् कहते हैं। यह मनोब्रह्म चतुष्पाद् किस प्रकार है ? यह श्रुति बतलाती है—वाक्, प्राण, चक्षु और श्रोत्र—ये इसके पाद हैं। यह अध्यात्म- |

३४० | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ३

३४०छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय ३

| मित्येते पादा इत्यध्यात्मम् । अथाधिदैवतमाकाशस्य ब्रह्मणोऽग्निर्वायुरादित्यो दिश इत्येते । एवमुभयमेव चतुष्पाद्ब्रह्मादिष्टं भवत्यध्यात्मं चैवाधिदैवतं च ॥ २ ॥ | दृष्टि है । अब अधिदैवत बतलाते हैं—आकाशसंज्ञक ब्रह्मके अग्नि, वायु, आदित्य और दिशाएँ ये पाद हैं । इस प्रकार अध्यात्म और अधिदैवत दोनों प्रकारके चतुष्पाद् ब्रह्मका आदेश किया गया ॥ २ ॥ |


तत्र—उनमें—

वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । सोऽग्निना ज्योतिषा भाति च तपति च। भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ३ ॥

वाक् ही ब्रह्मका चौथा पाद है; वह अग्निरूप ज्योतिसे दीप्त होता है और तपता है। जो ऐसा जानता है वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजके कारण देदीप्यमान होता और तपता है ॥ ३ ॥

| वागेव मनसो ब्रह्मणश्चतुर्थः पाद इतरपादत्रयापेक्षया । वाचा हि पादेनेव गवादि वक्तव्यविषयं प्रति तिष्ठति । अतो मनसः पाद इव वाक् । तथा प्राणो घ्राणः पादः । तेनापि गन्धविषयं प्रति च क्रामति । तथा चक्षुः पादः श्रोत्रं पाद | वाक् ही मनरूप ब्रह्मका, अन्य तीन पादोंकी अपेक्षा चौथा पाद है । जिस प्रकार गौ आदि जीव पादद्वारा इष्ट स्थानपर जाकर उपस्थित होते हैं उसी प्रकार वाणीसे ही मन वक्तव्य विषयपर ठहरता है। अतः वाक् मनके पादके समान है। इसी प्रकार प्राण—घ्राण भी उसका पाद है । उसके द्वारा भी वह गन्धरूप विषयके प्रति जाता है । ऐसे ही चक्षु पाद है और श्रोत्र भी पाद है । इस प्रकार यह |

खण्ड १८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४१


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
इत्येवमध्यात्मं चतुष्पात्त्वं मनसो ब्रह्मणः ।मनरूप ब्रह्मका अध्यात्म चतुष्पात्त्व है।
अथाधिदैवतमग्निवाय्वादित्यदिश आकाशस्य ब्रह्मण उदर इव गोः पादा वि लग्ना उपलभ्यन्ते । तेन तस्याकाशस्याग्न्यादयः पादा उच्यन्ते । एवमुभयमध्यात्मं चैवाधिदैवतं चतुष्पाद्दिष्टं भवति । तत्र वागेव मनसो ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः । सोऽग्निनाधिदैवतेन ज्योतिषा भाति च दीप्यते तपति च संतापं चौष्ण्यं करोति ।तथा अधिदैवतदृष्टि इस प्रकार है—जिस तरह गौके उदरसे पैर जुड़े रहते हैं उसी प्रकार आकाशरूप ब्रह्मके उदरमें अग्नि, वायु, आदित्य और दिशाएँ—ये दिखायी देते हैं । इसलिये ये अग्नि आदि उस आकाशरूप ब्रह्मके पाद कहे जाते हैं । इस प्रकार अध्यात्म और अधिदैवत दोनों प्रकारके चतुष्पाद् ब्रह्मका उपदेश किया जाता है । उनमें वाक् ही उस मनरूप ब्रह्मका चौथा पाद है। वह अग्निरूप अधिदैवत ज्योतिसे भासित—दीप्त होता और तपता अर्थात् संताप यानी उष्णता करता है ।
अथवा तैलघृताद्याग्नेयाशनेनेद्धा वाग्भाति च तपति च वदनायोत्साहवती स्यादित्यर्थः।अथवा तैल और घृत आदि आग्नेय (तेजोमय) पदार्थोंके भक्षणसे दीप्त हुई वाक् प्रकाशित होती और तपती है; अर्थात् बोलनेके लिये उत्साहयुक्त होती है । इस प्रकारकी उपासना करनेवालेको
विद्वत्फलम्—भाति च तपति चप्राप्त होनेवाला फल—जो पूर्वोक्त